भारत लैंगिक समानता सूचकांक में नीचे गिरा

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Image caption ब्रिक्स समूह के देशों में भी भारत का स्थान सूचकांक में सबसे नीचे है

विश्व आर्थिक मंच की ताज़ा रिपोर्ट में सामने आया है कि लैंगिक समानता सूचकांक में भारत का स्थान पिछले साल के मुक़ाबले एक स्तर नीचे गिर गया है.

जहां पिछले साल इस सूचकांक में भारत का स्थान 112वाँ था, वहीं 2011 में भारत गिर कर 113वें स्थान पर पहुंच गया है.

हालांकि पिछले साल इस सूचकांक में 134 देशों को आंका गया था, जबकि इस साल 135 देशों के आंकड़े प्रकाशित किए गए हैं.

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2006 के लैंगिक समानता सूचकांक में भारत 115 देशों में से 98वें स्थान पर था.

इस सूचकांक में आइसलैंड पहले स्थान पर है, जिसके बाद नॉर्वे, फ़िनलैंड और स्वीडन है.

सूचकांक में यमन सबसे नीचे है जबकि भारत नीचे से 23वें स्थान पर है. जहां तक पड़ोसी देश पाकिस्तान और नेपाल की बात है, तो वो नीचे से तीसरे व दसवें स्थान पर हैं.

विश्व आर्थिक मंच यानि वर्ल्ड इकॉनॉमिक फ़ोरम का सूचकांक देशों की उस क्षमता को मापता है कि उसने पुरुषों और महिलाओं को बराबर संसाधन और अवसर देने के लिए कितना प्रयास किया.

राजनीतिक सशक्तिकरण में सुधार

इस सूचकांक को चार श्रेणियों में बांटा गया है – आर्थिक भागीदारी और अवसर, शिक्षा, स्वास्थ्य और राजनीतिक सशक्तिकरण.

इन चारों श्रेणियों में से केवल आख़िरी श्रेणी में भारत की थोड़ी सकारात्मक तस्वीर उभर कर आई है और वो है राजनीतिक सशक्तिकरण.

राजनीतिक सशक्तिकरण के मामले में भारत को 20 सबसे अच्छे देशों में से 19वें स्थान पर रखा गया है.

लेकिन बाकी सभी श्रेणियों में भारत की तस्वीर निराशाजनक ही है. रिपोर्ट में लिखा है कि स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव, आर्थिक भागीदारी में बढ़ता अंतर भारत के विकास के आड़े आ सकता है.

ब्राज़ील, रूस, चीन और भारत यानी ब्रिक्स समूह के देशों में भी देखा जाए, तो भारत इन तीनों देशों के मुक़ाबले सूचकांक में सबसे नीचे है.

रिपोर्ट की सह-लेखक सादिया ज़ाहिदी ने कहा, “लैंगिक समानता का सीधा संबंध बढ़ती हुई आर्थिक प्रतिस्पर्धा से है. विश्व का ध्यान ज़्यादा से ज़्यादा नौकरियों के अवसर उतपन्न करने पर है और ऐसे में लैंगिक समानता एक अहम मुद्दा है.”

वैश्विक स्थिति की बात की जाए तो रिपोर्ट में कहा गया है कि 85 प्रतिशत देशों ने पिछले छह सालों में लिंग समानता अनुपात में सुधार किया है, लेकिन बाकी 15 प्रतिशत देशों में स्थिति और ख़राब हुई है.

अफ्रीका और उत्तरी अमरीका में ख़ासतौर पर पिछले छह सालों में स्थिति लगातार ख़राब हुई है.

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