इतिहास के पन्नों में 20 नवंबर

इतिहास के पन्नों को पलट कर देख़ें तो आप पाएंगे कि 20 नवंबर के दिन कई महत्वपूर्ण घटनाएं घटीं थीं.

1995: राजकुमारी डायना ने अपने विवाहेतर संबंधों को स्वीकार किया

Image caption राजकुमारी डायना के इस साक्षात्कार के बाद ब्रिटेन के शाही घराने में काफ़ी बवाल मच गया था.

आज ही के दिन 1995 में ब्रिटेन की तत्कालीन राजकुमारी डायना ने पहली बार अपने विवाहेतर संबंधों को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया था.

बीबीसी संवाददाता मार्टिन बशीर को दिए गए एक ख़ास इंटरव्यू में राजकुमारी डायना ने इस बात को मान लिया कि जेम्स हेविट से उनके प्रेम संबंध हैं.

जेम्स हेविट उन्हें घुड़सवारी सिखाते थे.

एक घंटे तक चले इस विशेष साक्षात्कार में उन्होंने अपने पति राजकुमार चार्ल्स के विवाहेतर संबंधों से लेकर उनकी बीमारी, उनके बच्चे, मीडिया और ब्रिटेन में राजशाही के भविष्य तक सभी विषयों पर खुलकर बातचीत की थी.

दुनिया भर में लगभग डेढ़ करोड़ लोगों ने राजकुमारी डायना के इस इंटरव्यू का सीधा प्रसारण देखा था.

बीबीसी संवाददाता मार्टिन बशीर ने जब उनसे हेविट के संबंधों के बारे में पूछा तो डायना ने इस बात को क़बूल किया कि उन दोनों के संबंध एक क़रीबी दोस्त से ज़्यादा हैं.

ग़ौरतलब है कि इससे पहले जेम्स हेविट ने सार्वजनिक तौर पर राजकुमारी से अपने संबंधों का दावा किया था.

जब डायना से ये पूछा गया कि क्या वो अपने पति के प्रति वफ़ादार नहीं थी, उनका जवाब था, ''हां ये सही है. मैं उनसे प्यार करती थी लेकिन मेरे साथ बहुत ग़लत हुआ.''

उनके पति राजकुमार चार्ल्स के पार्कर बोल्स के साथ प्रेम संबंधों के बारे में जानकर उनको जो दुख हुआ उसका ज़िक्र करते हुए डायना ने कहा था, ''इस शादी में हम तीन लोग थे. इसलिए यहां थोड़ी भीड़ थी.''

इसी साक्षात्कार में डायना ने कहा था कि वो ब्रिटेन की महारानी नहीं बनना चाहती थीं. उनके मुताबिक़ वो लोगों के दिलों में रहना चाहती थीं और वो दिलों की महारानी बनना चाहती थीं.

इस इंटरव्यू के एक महीने बाद डायना की सास और ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ ने राजकुमार चार्ल्स और राजकुमारी डायना को ख़त लिखकर दोनों को जल्द से जल्द तलाक़ लेने के लिए कहा था.

आख़िरकार अगस्त 1996 में चार्ल्स और डायना का तलाक़ हो गया. इसके ठीक एक साल बाद 31 अगस्त 1997 को पेरिस में एक कार दुर्घटना में राजकुमारी डायना और उनके साथी डोडी फ़ायेद की मौत हो गई थी.

1945: नाज़ियों की न्यूरेम्बर्ग मुक़दमे की शुरूआत

Image caption युद्धापराध के लिए चलने वाला ये पहले मुक़दमा था.

आज ही के दिन 1945 में जर्मनी के शहर न्यूरेम्बर्ग में 20 नाज़ी नेताओं के ख़िलाफ़ मुक़दमे की सुनवाई शुरू हुई.

उन सभी पर युद्ध अपराध के आरोप लगाए गए थे.

दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद महीनों तक इस बात पर विचार विमर्श होता रहा था कि नाज़ी नेताओं को कैसे सज़ा दी जाए. ब्रिटेन ने नाज़ी नेताओं को पकड़ने के बाद गोली मार देने की सिफ़ारिश की थी लेकिन अमरीका और सोवियत संघ चाहते थे कि उन्हें का़नूनी तौर पर सज़ा दी जाए.

इसके लिए आख़िरकार आठ अगस्त, 1945 को एक अंतरराष्ट्रीय सैन्य न्यायाधिकरण का गठन किया गया जिसमें अमरीका, सोवियत संघ, ब्रिटेन और फ़्रांस के न्यायधीशों को जगह दी गई.

ये सुनवाई अक्तूबर 1946 तक चली जिसके बाद 20 में से 11 नाज़ी नेताओं को फांसी की सज़ा सुनाई गई. तीन लोगों को उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई गई जबकि चार को दस से लेकर 20 साल तक की क़ैद की सज़ा सुनाई गई.

छोटे युद्धा अपराध के लिए पांच और सैन्य न्यायाधिकरण बनाए गए, जिनमें सबसे आख़िरी न्यायाधिकरण की कार्रवाई अप्रैल 1949 में ख़त्म हुई.

1975: स्पेन के तानाशाह फ़्रैंको की मौत

आज ही के दिन 1975 में 39 वर्षों तक स्पेन पर शासन करने वाले तानाशाह जनरल फ़्रैंसिस्को फ़्रैंको की मौत हो गई थी.

डॉक्टरों के मुताबिक़ 82 वर्षीय फ़्रैंको पिछले पांच हफ़्तों से बीमार चल रहे थे और दिल का दौरा पड़ने से उनकी मौत हुई.

1930 के दशक में स्पेन में गृह युद्ध के दौरान जनरल फ़्रैंको ने जर्मनी के हिटलर और इटली के मुसोलिनी की मदद से राष्ट्रवादी सेना का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया था.

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान फ़्रैंको ने हिटलर को स्पेन के नौसैनिक अड्डों को इस्तेमाल करने की इजाज़त दी थी और 1943 में जब लग रहा था कि मित्र देशों की जीत हो रही है, तो फ़्रैंकों ने तटस्थ रहने का फ़ैसला किया था.

यूरोप के कई देशों में उनकी मौत को लेकर मिली जुली प्रतिक्रिया हुई थी.

पश्चिमी यूरोप के किसी भी देश ने अपने राष्ट्राध्यक्ष या शासनाध्यक्ष को उनके अंतिम संस्कार में शामिल होने को नहीं भेजा था.

लेकिन चिली के तत्कालीन राष्ट्रपति पिनोशे और बोलिविया के तत्कालीन राष्ट्रपति बैंज़र फ़्रैंको के अंतिम संस्कार में शामिल हुए थे.

ब्रिटेन ने अपने कुछ सांसदों को भेजा था जिस फ़ैसले की वहां की लेबर पार्टी ने काफ़ी आलोचना की थी.

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