क्लस्टर बम पर पाबंदी नहीं चाहते कुछ देश

जिनेवा में क्लस्टर बम के इस्तेमाल को सीमित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र की बातचीत जारी है, लेकिन इस पर अब भी काफ़ी मतभेद क़ायम हैं.

क्लस्टर बम के निर्माण, इसे किसी और को देने और क्लस्टर बम के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाने का समझौता पहले से ही अस्तित्व में है.

पिछले साल इससे संबंधित ओस्लो समझौता लागू हुआ था. जिस पर 111 देशों ने हस्ताक्षर भी किए थे.

लेकिन इस समझौते को उन देशों का समर्थन नहीं हासिल जो क्लस्टर हथियारों का निर्माण करते हैं. इन देशों में प्रमुख हैं अमरीका, रूस और चीन.

इन देशों का कहना है कि नए प्रोटोकॉल से कुछ नियंत्रण स्थापित हो पाएगा, लेकिन निशस्त्रीकरण से जुड़े संगठनों का कहना है कि नए प्रस्ताव कमज़ोर हैं और इससे मौजूदा प्रतिबंध भी बेअसर हो जाएगा.

जिनेवा में जो बातचीत चल रही है, उसका एक प्रमुख प्रस्ताव है 1980 के पहले के क्लस्टर हथियारों पर पाबंदी. अमरीकी प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख फिलिप स्पेक्टर का कहना है कि इससे क्लस्टर हथियारों के भंडार में बड़ी कमी आएगी.

मतभेद

लेकिन मानवाधिकार संगठनों को इस पर संदेह है. उनका कहना है कि जिनके पास 1980 के पहले के क्लस्टर हथियार हैं, वो तो इसे ख़त्म करने को राज़ी हैं और वे अपने भंडार में नए हथियार लाना चाहते हैं.

ये भी चिंता जताई जा रही है कि जिनेवा प्रस्तावों में कुछ क्लस्टर बमों के इस्तेमाल को वैधानिक माना जा सकता है और ये अनिश्चितकाल तक इस्तेमाल हो सकते हैं.

अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस समिति के पीटर हर्बी का कहना है कि ये काफ़ी ख़तरनाक उदाहरण होगा और ये मौजूदा समझौते से काफ़ी कमज़ोर होगा.

ब्रिटेन और जर्मनी समेत संयुक्त राष्ट्र के कई सदस्य देशों का मानना है कि मौजूदा प्रस्ताव काफ़ी कमज़ोर हैं और वे चाहते हैं कि प्रस्तावों में बदलाव लाया जाए, तभी वे इसका समर्थन करेंगे.

अमरीकी राजनयिक इस प्रस्ताव की मंज़ूरी के लिए अपील कर रहे हैं. उनका कहना है कि इस समझौते में मानवीय मूल्यों का बड़ा ध्यान रखा गया है. दूसरी ओर रूस और चीन ने ये संकेत दे दिए हैं कि वे अब आगे इसमें किसी तरह की छूट के लिए तैयार नहीं.

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