'एशिया में होगा वॉलस्ट्रीट'

Image caption भारत और चीन की अर्थव्यवस्था में तेज़ी से विकास हो रहा है

इसमें कोई दो राय नहीं कि आर्थिक गतिविधियों का केंद्र विकासशील देश बनते जा रहे हैं.

बीसवीं सदी के पहले पचास वर्षों में पश्चिमी देश साथ आए क्योंकि वे ही विकास की प्रक्रिया का नेतृत्व कर रहे थे. लेकिन अब एक आमूलचूल बदलाव आ गया है.

अब से ठीक दस वर्ष पहले ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन को एक मज़बूत आर्थिक शक्ति के तौर पर ‘ब्रिक्स’ शब्द से अंतरराष्ट्रीय संस्था गोलेडमैन सैक्स ने पहचान दी थी.

अब उसी संस्था का कहना है कि वर्ष 2050 तक ‘ब्रिक्स’ देशों (जिसमें अब दक्षिण अफ़्रीका भी शामिल है) का कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी), जापान सहित सभी विकसित अर्थव्यवस्थाओं को पीछे छोड़ देगा.

अभी भी दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं से भारत की तुलना अगर 'इंक्रिमेन्टल जीडीपी' के आधार पर की जाए तो वो जर्मनी को पीछे छोड़ चुका है.

अर्थव्यवस्था की कुशलता को बेहतर तरीके से नापने के लिए 'इंक्रिमेन्टल जीडीपी' दस वर्ष की अवधि के दौरान जीडीपी में आए बदलाव पर निर्धारित किया जाता है.

इसके आधार पर चीन वैश्विक अर्थव्यवस्था को अमरीका से भी ज़्यादा 'इंक्रिमेन्टल जीडीपी' दे रहा है.

जी-20 देशों के पिछले सम्मेलन में यूरोपीय देशों ने अपने आर्थिक संकट से उबरने के लिए भारत और चीन से मदद मांगी.

तीस वर्ष पहले इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी लेकिन अब ये एक अपरिहार्य बदलाव की ओर इशारा कर रहा है.

व्यापार का मज़बूत जोड़

व्यापार एक ऐसा बड़ा कारक है जो विभिन्न संस्कृतियों को जोड़ता है. इसलिए ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन का एक समूह बनाना स्वाभाविक था.

‘ब्रिक्स’ समूह के दो देश, भारत और चीन, ऊर्जा के बड़े आयातक हैं और अन्य दो, रूस और ब्राज़ील, संसाधनों के बड़े निर्यातक.

रूस के पास तेल और गैस है और ब्राज़ील के पास लौह अयस्क समेत कई और धातुओं के बड़े स्रोत हैं.

इसलिए इन आयातकों और निर्यातकों के पास, विकास की गति बढ़ाने के लिए मिलकर काम करने के अलावा और कोई चारा ही नहीं था.

सेवा क्षेत्र में भारत और उत्पादन क्षेत्र में चीन के एक बड़ी शक्ति समझे जाने की वजह से वे ख़ास तरीक़े से एक दूसरे पर निर्भर भी हैं.

पिछले 15 वर्षों में अमरीका और जापान के साथ भारत के व्यापार में जहां ना के बराबर वृद्धि हुई है वहीं चीन के साथ भारत का व्यापार हर चार वर्षों में चौगुना होता गया है.

वर्ष 2013 तक इसके क़रीब 100 अरब डॉलर पहुँचने की संभावना है.

अगले पांच वर्षों में भारत को एक लाख मेगावॉट ऊर्जा की ज़रूरत होगी और इसके लिए ज़रूरी उपकरणों का 20 फीसदी चीन से ही ख़रीदा जा रहा है.

प्रतिस्पर्धा और सहयोग

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Image caption जी-20 देशों के सम्मेलन में 'ब्रिक्स' सदस्य देशों से मदद मांगी गई थी.

सवाल ये भी है कि ‘ब्रिक्स’ के सदस्य देशों के बीच राजनीतिक तनाव से क्या उनके आर्थिक रिश्तों पर कोई फ़र्क पड़ता है?

तनाव तो लाज़मी है क्योंकि एक समूह बनाने का काम सरकारों ने योजनाबद्ध तरीके से नहीं किया, बल्कि ये वैश्वीकरण और बाज़ार के प्रभाव का नतीजा है.

भारत और चीन को अपने क्षेत्र में दो प्रतिस्पर्धात्मक अर्थव्यवस्थाओं की तरह देखा जाता है लेकिन इसके साथ ही उन्हें कई मुद्दों पर एक दूसरे का सहयोग भी करना पड़ता है.

दोनों देशों ने विश्व व्यापार संगठन(डब्ल्यूटीओ) जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर कई बार साथ काम किया है.

एक जैसी सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे भारत और चीन, विकसित देशों से समझौते करने में अक्सर एक ही सुर में बात करते हैं.

इसीलिए उनके रिश्ते को प्रतिस्पर्धा और सहयोग का मिला जुला रूप समझा जाता है.

अमरीका से असमंजस

बाज़ार के प्रभाव के चलते कई देशों ने भारत और चीन के साथ व्यापार बढ़ाया है. लेकिन ये देश सुरक्षा ज़रूरतों की वजह से अमरीका पर भी निर्भर हैं. इससे दुनिया में एक नई भू-राजनीतिक स्थिति बन गई है.

‘ब्रिक्स’ समूह के सदस्यों में आपसी व्यापारिक सहयोग तो बना ही है, साथ ही वे दक्षिण कोरिया, इंडोनेशिया और वियतनाम जैसी पूर्वी अर्थव्यवस्थाओं और जापान के साथ भी आर्थिक रिश्ते मज़बूत कर रहे हैं.

लेकिन ये सभी छोटे देश भारत-प्रशांत क्षेत्र में एक नई सुरक्षा व्यवस्था बनाने के लिए अमरीका की मदद लेना चाहते हैं.

भारत के संदर्भ में देखें तो, दो वर्ष पहले ही चीन के साथ उसका व्यापार अमरीका के साथ उसके व्यापार से कहीं आगे निकल गया था.

लेकिन नागरिक परमाणु सहयोग और भारत और प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा के मुद्दों पर भारत का रुझान अमरीका की तरफ ही है.

आखिरकार इसी क्षेत्र में ऊर्जा के लेन-देन और कई सामान और सेवाओं के आयात के रास्ते हैं.

वॉल स्ट्रीट से एशिया

‘ब्रिक्स’ देशों में विश्व की 40 फीसदी जनता बसती है और पर्चेज़-पावर-पैरिटी के आधार पर वैश्विक जीडीपी का 25 फीसदी इन्हीं देशों से आता है.

जहां एक तरफ यूरोप और अमरीका में जनता की औसत उम्र आने वाले दशकों में बढ़ेगी वहीं ‘ब्रिक्स’ देशों में युवाओं की संख्या ज़्यादा होने की वजह से उनके बाज़ारों में उपभोक्ताओं की संख्या बढ़ती रहेगी.

यकीनन, आने वाले वर्षों में भारत और चीन वैश्विक वित्तीय बाज़ारों में बड़ी पैठ रखेंगे. जिसके फलस्वरूप तेल, खनिज और धातु जैसे पदार्थ जिनके दाम अभी अमरीका के वॉलस्ट्रीट पर तय होते हैं, वो एशिया में होंगे. और ये एक बहुत बड़ा बदलाव होगा.

लेकिन इसको सच करने के लिए, भारत और चीन को अपनी अर्थव्यवस्थाएं और खोलनी होंगी साथ ही उन्हें पूंजी खाते में परिवर्तनीयता लानी होगी ताकि वित्तीय परिसंपत्ति में आदान-प्रदान बाज़ार के निर्धारित दामों पर आसानी से किया जा सके.

दोनों देशों को मज़बूत वैश्विक वित्तीय संस्थाएं भी विकसित करनी होंगी ताकि दुनिया की अर्थव्यवस्था में ये बदलाव आ सके.

(बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य के साथ बातचीत पर आधारित)

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