ईरान-ब्रिटेन रिश्तों के उतार चढ़ाव

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Image caption ईरान में ब्रितानी दूतावास पर प्रदर्शनकारियों का हंगामा

वर्ष 1979 से ही ब्रिटेन और ईरान के संबंधों में कई बार उतार-चढ़ाव आए हैं.

ब्रिटेन के ईरान पर प्रतिबंध लगाने के बाद राजधानी तेहरान में प्रदर्शनकारियों के ब्रितानी दूतावास पर हमले के साथ ही दोनों देशों के संबंध एक बार फिर से काफ़ी ख़राब हो गए हैं. एक नज़र उन हालात पर जिस कारण दोनों देशों के संबंधों पर पिछले कुछ सालों में असर पड़ा है.

29 नवंबर 2011. ईरान की राजधानी तेहरान में प्रदर्शनकारियों ने ब्रितानी दूतावास में पत्थर और बम फेंके और दस्तावेज़ों में आग लगाई. ये लोग ईरान पर लगाए गए ब्रितानी प्रतिबंधों से नाराज़ थे.

27 नवंबर 2011. ईरान की संसद ने मतदान के ज़रिए ब्रिटेन के राजदूत डॉमिनिक चिलकॉट को तेहरान से निष्कासित करने का फ़ैसला किया, जिसके साथ ही दोनों देशों के आर्थिक और व्यापारिक रिश्तों में और ज़्यादा गिरावट आ गई.

21नवंबर 2011. संयुक्त राष्ट्र की संस्था आईएईए द्वारा जारी रिपोर्ट में ईरान के परमाणु कार्यक्रमों की जानकारी दिए जाने के बाद ब्रिटेन के वित्त मंत्री जॉर्ज ऑसबॉर्न ने ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगाते हुए ईरान के सभी बैंको के साथ व्यापारिक संबंध ख़त्म करने की घोषणा कर दी.

नवंबर 2010. ईरान के सरकारी अंग्रेज़ी न्यूज़ चैनल प्रेस टीवी ने ब्रिटेन से संबंध रखने वाले चार चरमपंथियों की गिरफ़्तारी की सूचना दी, जिसका ब्रितानी विदेश मंत्रालय ने खंडन करते हुए इसे ईरान की तरफ़ से लगाया गया झूठा आरोप बताया.

सितंबर 2009.

ईरान पूरे विश्व समुदाय के सामने ये स्वीकार करता है कि वो परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में काम करते हुए 'क़ॉम' के पास एक यूरेनियम संवर्धन संयंत्र बना रहा है. हालांकि वो ज़ोर देकर कहता है कि ये संयंत्र शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए बनाया जा रहा है. इस संयंत्र के उदघाटन में ब्रिटेन भी शामिल हुआ.

19 जून 2009 . राष्ट्रपति चुनाव में महमूद अहमदीनिजाद के दोबारा राष्ट्रपति चुने जाने के खिलाफ़ लोगों ने विरोध प्रदर्शन करना शुरू कर दिया, लोगों ने चुनाव की पूरी प्रक्रिया को धोखा क़रार दिया. इस दौरान ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली ख़मेनेई ने अमरीका, ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देशों को अभिमानी कहते हुए इन पर लोगों के इस विरोध में उनका साथ देने का आरोप लगाया. इस दौरान ब्रितानी मीडिया भी निशाने पर रही.

जनवरी 2009. इस बीच ईरान में वर्ष 1961 से रुक-रुक कर काम कर रही ब्रितानी काउंसिल ने ये कहते हुए अपनी सेवाएं स्थगित कर दीं कि उनके कर्मचारियों पर दबाव डाला जा रहा है.

दिसंबर 2008. राष्ट्रपति महमूद अहमदीनिजाद ने क्रिसमस के मौके पर ब्रिटेन को चैनल फ़ोर का संदेश पढ़कर सुनाते हैं.

जुलाई 2008. इसराइल की संसद में भाषण देते हुए ब्रितानी प्रधानमंत्री साफ़-साफ़ कहते हैं कि या तो ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम छोड़कर हमारे साथ हो जाए या फिर इसे जारी रखते हुए पूरी दुनिया में अलग-थलग पड़ जाए.

मार्च 2007. ईरान ने अपने और इराक़ के बीच बहने वाले जलमार्ग शत-अल-अरब में गश्त कर रहे ब्रितानी नौसेना के 15 कर्मचारियों को ये कहकर गिरफ्तार कर लिया कि ये लोग उसके जलक्षेत्र में चले आए थे.

जिसके बाद दोनों देशों के बीच एक कूटनीतिक झगड़ा शुरू हो गया था, हालांकि चार अप्रैल को इन सभी ब्रितानी नागरिकों को छोड़ दिया गया था.

जून 2004. ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस जैसे देश आईएईए में एक प्रस्ताव लाते हैं जिसमें ईरान पर उसके परमाणु कार्यक्रमों के निरीक्षण में असहयोग का आरोप लगाया जाता है. इसी दौरान आठ ब्रितानी नाविकों को ईरान की सीमा में तीन दिनों तक रोक कर रखा गया.

मई 2004. इराक में शियाओं के धार्मिक शहर के पास युद्ध में अमरीकी और ब्रितानी सेना के शामिल होने को लेकर ईरान की राजधानी तेहरान में ब्रितानी दूतावास के बाहर प्रदर्शन होता है.

सितंबर 2003.

आईएईए 18 सालों में पहली बार ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अपनी रिपोर्ट जारी करता है.

ईरान कहता है कि उसके परमाणु कार्यक्रम असैनिक उद्देश्यों के लिए है लेकिन अमरीका और ब्रिटेन को लगता है कि ईरान चोरी-छुपे परमाणु हथियार बनाने में लगा है. हालांकि नवंबर 2003 में ईरान एक बार फिर से अपने परमाणु कार्यक्रम की विस्तृत जांच करवाने को तैयार हो जाता है.

फरवरी 2002. तेहरान अपने यहां नियुक्त किए गए ब्रिटेन के राजदूत डेविड रेडवे पर जासूसी का आरोप लगाकर उनकी नियुक्ति को ख़ारिज कर देता है.

21सितंबर 2001. जैक-स्ट्रॉ ईरान की यात्रा पर पहुंचे. इस्लामी क्रांति के बाद से ऐसा करने वाले वो ब्रिटेन के पहले विदेश मंत्री थे, उनकी यात्रा को अफ़ग़ानिस्तान के तालिबान के ख़िलाफ़ एकजुटता बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देखा गया.

फरवरी 2001. ईरान की यात्रा पर आए ब्रिटेन के मंत्री मो मोलम नशीले पदार्थों की अफ़ग़ानिस्तान से होने वाली तस्करी के खिलाफ़ ईरान की लड़ाई में उसका साथ देने का भरोसा देते हैं.

1999. 1979 की क्रांति के बाद से ईरान और ब्रिटेन ने पहली बार एक-दूसरे के देशों में अपने राजदूतों की नियुक्ति की.

Image caption ब्रिटेन द्वारा ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों के खिलाफ़ विरोध बढ़ गया है

सितंबर 1998. लेखक सलमान रश्दी के ख़िलाफ़ जारी किए गए फ़तवे को वापस लेने के बाद ईरान और ब्रिटेन के संबंधों में सुधार आता है, हालांकि ईरान इस बात पर क़ायम रहा कि रश्दी की किताब 'द सैटेनिक वर्सेज़' इस्लाम के ख़िलाफ़ है. 1992. सलमान रश्दी की हत्या की साज़िश रचने वाले तीन ईरानी नागरिकों को ब्रिटेन निष्कासित कर देता है, जिसके बाद ईरान ब्रिटेन के एक राजनयिक को देश से निकाल देता है. ब्रिटेन ने भी बदले की कार्रवाई में एक ईरानी राजनयिक को देश से बाहर निकाल दिया.

1991. ईरान के समर्थन वाले लेबनान के एक चरमपंथी संगठन द्वारा पांच सालों तक बंधक रखे जाने के बाद ब्रितानी नागरिक टेरी वेट को रिहा कर दिया जाता है, जिससे दोनों देशों के बीच संबंधों में काफ़ी सुधार आता है.

फरवरी 1989. ईरान ने सलमान रश्दी के विरुद्ध एक फ़तवा जारी किया. दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंध टूट गए और रश्दी को भूमिगत होना पड़ा.

1988. तेहरान में ब्रितानी दूतावास को दोबारा खोल दिया जाता है.

30 अप्रैल- 5 मई 1980.

ख़ोमैनी का विरोध कर रहे छह बंदूकधारियों ने लंदन स्थित ईरानी दूतावास पर कब्ज़ा कर 22 लोगों को बंधक बना लिया था. ब्रितानी सैनिकों के साथ लड़ाई के बाद बंधकों को छुड़ाया जा सका. इस कार्रवाई में 19 बंधकों को सकुशल रिहा करवा लिया गया, लेकिन एक बंधक की मौत हो गई और दो ज़ख्मी. पूरी कार्रवाई में पांच बंदूकधारी मारे गए. 1979. इस्लामी क्रांति के कारण ब्रिटेन ने तेहरान में अपना दूतावास बंद कर दिया था.

1955. बग़दाद पैक्ट के अंदर सेंटो यानि सेंट्रल ट्रीटी का गठन हुआ, जिसमें ब्रिटेन, ईरान, इराक़, पाकिस्तान और तुर्की जैसे देशों ने शामिल होकर इस क्षेत्र से सोवियत संघ के असर को कम करने की ठानी. 1958 में अमरीका भी इन देशों के साथ हो जाता है लेकिन 1979 ये संधि अप्रभावी हो जाती है.

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Image caption इरान का कहना है कि वो नागरिक के हित में परमाणु कार्यक्रम चला रहा है

1953. अमरीकी और ब्रितानी फ़ौज की मदद से प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेघ एक सैनिक कार्रवाई में गिरफ़्तार कर तीन साल के लिए जेल भेज दिए गए. मोसादेघ पर गद्दारी का आरोप लगाया जाता है जिसके बाद वे अंतिम समय तक 1967 में अपने घर पर बंधक बनाकर रखे गए.

1950. अली राज़ामरा की हत्या के बाद मोहम्मद मोसादेघ ईरान के नए प्रधानमंत्री बनते हैं. 1951 में राज़ामरा ने ब्रिटेन की मालिकाना हक़ वाली एक ईरानी तेल कंपनी का राष्ट्रीयकरण करने की कोशिश की. ब्रिटेन इसका विरोध करता है और अमरीका से मदद मांगता है.

1941. द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ईरान घोषणा करता है कि वो इस लड़ाई में निष्पक्ष रहेगा, लेकिन देश के पहले पहलवी शाह रज़ा शाह 1930 से ही जर्मनी के नाज़ी शासकों के साथ अपने व्यापारिक संबंध बढ़ाने में लगे थे.

इससे डरकर और ख़ासकर 1941 में जर्मनी द्वारा सोवियत संघ पर हमले के बाद ब्रिटेन और रूस ने मिलकर ईरान पर क़ब्ज़ा कर रज़ा शाह को गद्दी छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया गया था. जिसके बाद रज़ा शाह की निर्वासन में मौत हो गई.

1946 में अमरीका द्वारा 1942 के अटलांटिक चार्टर की धाराओं के बारे में बताए जाने के बाद ब्रितानी और रूसी सेना ईरान छोड़कर चली गई.

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