पुरुष मित्रों का साथ 'शर्तों' पर क्यों ?

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Image caption भारत में अब रिश्तों को लेकर काफी खुलापन आया है

पिछले हफ्ते की शुरुआत टीवी पर दिनभर कुछ परेशान कर देने वाली तस्वीरों के साथ हुई.

राजधानी दिल्ली से सटे गाज़ियाबाद में एक महिला थानाध्यक्ष ने पार्कों में छापा मारकर प्रेमी जोड़ों को ना सिर्फ बेइज्ज़त किया बल्कि उन्हें टीवी कैमरों के सामने उठक-बैठक भी करवाया.

अलका पांडे नाम की इस महिला थानाध्यक्ष का कहना था कि ऑपरेशन मजनूं नाम का उनका ये अभियान ईव-टीज़िंग के खिलाफ़ है और वो सीधी-साधी लड़कियों को चालाक लड़कों के चंगुल से बचाना चाहती हैं

लेकिन सवाल ये उठता कि अलका पांडे को ये अधिकार दिया किसने? हालांकि बाद में अलका पांडे को निलंबित कर दिया गया लेकिन उन्हें लोगों को जितना बेइज्जत करना था वो कर चुकी थीं.

अभी ज़्यादा दिन नहीं हुए है जब मुंबई में अपनी दोस्त को छेड़खानी से बचाने वाले दो भाइयों कीनन और रुबीन को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा, कुछ दिन पहले एक लड़की को उसके द्वारा ठुकराये प्रेमी ने दिल्ली के भीड़भाड़ इलाके में मार डाला लेकिन ना तो वहां पुलिस कुछ कर पाई ना जनता.

छोटे शहरों में परेशानी

छोटे शहरों की हालत तो और भी खराब है, अगर हम इन शहरों में अपने किसी पुरुष दोस्त के साथ सार्वजनिक जगह पर बैठ कर बात भी करते हैं तो कई दुश्वारियां पैदा हो जाती है.

मुझे याद है एक बार पढा़ई के दौरान जब मैं अपने एक पुरुष साथी के साथ रेस्त्रां में बैठी हुई थी तब अचानक वहां ज़िले के डीएम ने छापा मारा, चूंकि ये रेस्त्रां बहुत ही छोटी सी जगह में बना हुआ था और हर टेबल एक-दूसरे से सटे हुए थे तो उन्हें झीने परदों से बांट दिया गया था.

हमसे कड़ी पूछताछ करने के बाद ही हमें घर जाने दिया गया.

ऐसा नहीं कि ये शहर बदल नहीं रहे, यहां भी आए दिन फैशन-शो, टैलेंट हंट जैसे कार्यक्रम होते रहते हैं, जहां के छोटे-छोटे दफ्तरों में महिलाओं की भागीदारी भी काफी बढ़ी है.

स्कूल-कॉलेजों में भी मौजूदगी बढ़ी ही है, लेकिन समस्याएं हर जगह है भले ही वो चाय की दुकान हो या फिर सिनेमा हॉल.

कुछ ऐसा ही वाकया हुआ था मेरी दोस्त वर्षा के साथ जो अपने कुछ दोस्तों के साथ पिकनिक पर गईं थी लेकिन वहां अचानक पुलिस का छापा पड़ने से उन्हें अपनी जान बचाकर भागना पड़ा.

नमिता के अनुभव तो और भी बुरे हैं, वो कहती हैं कि वो अपने दोस्त के साथ देश के एक बड़े इंजीनियरिंग कॉलेज के ग्राउंड में बैठ कर कुछ बातें कर रहीं थी, और उन दोनों को रजिस्ट्रार के कमरे में पेश कर दिया गया.

इतना ही नहीं उसके घर फोन कर उसके माता-पिता को भी पूरे मामले की जानकारी दी गई.

ज़िम्मेदारी का एहसास

अब ये हर्गिज़ ज़रूरी नहीं कि हर युवा लड़का और लड़की के बीच प्रेमसंबंध हो, ना ही ये कि वे अश्लील हरकत ही कर रहे हो.

आमतौर हम जैसे बालिग लोग खुद के प्रति और समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को बखूबी समझते हैं, रहा सवाल हमारा पुरुष साथियों के वक्त बिताने का तो वो हमारी निजी पसंद भी है और ज़रुरत भी.

आप ये नहीं कह सकते कि लड़कियां स्कूल-कॉलेज जाएं तो सिर्फ किताबी ज्ञान हासिल कर लौट आएं, ना ही आप ये कह सकते हैं कि ऑफिस में जाइए काम कीजिए और लौट आइये, क्योंकि इस तरह की प्रोग्रामिंग एक कंप्यूटर या रोबोट को दी जा सकती है इंसानों को नहीं.

महिलाओं और पुरुषों का संबंध एक पूरा पैकेज है जिसे हम हिस्सों में नहीं बांट सकते, इसलिए अगर हमें उनकी ज़रुरत पति, भाई या पिता के रुप में है तो पुरुष मित्र भी हमारे सामाजिक जीवन का एक सामान्य हिस्सा हैं.

अलका पांडे जिस विभाग में नौकरी करती हैं वहां पुरुषों का राज रहा है, क्या वो दावे से ये कह सकती हैं कि ऑफिस में उनका अपने सभी सहयोगियों के साथ सिर्फ कामकाजी संबंध हैं, या वो उनसे फोन पर बात नहीं करतीं या उनके घर नहीं जाती।

पुलिस का काम समाज में सुरक्षा प्रदान करना है ना कि हमारे निजी ज़िंदगी में दखल देना.

और निजी जिंदगी का अर्थ घर की चारदीवारी नहीं होती.

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