आशंकाओं और पाकिस्तान के बिना अफ़गानिस्तान सम्मेलन

 सोमवार, 5 दिसंबर, 2011 को 08:41 IST तक के समाचार

अफ़गानिस्तान के शहर अभी भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं.

अफ़गानिस्तान के भविष्य को लेकर जर्मनी के बॉन शहर में सोमवार से एक महत्वपूर्ण सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है लेकिन पाकिस्ता ने इसका बहिष्कार करने की घोषणा की है.

अफ़गानिस्तान पर दस साल पहले बॉन में ही उस समय सम्मेलन हुआ था जब तालेबान को सत्ता से हटाया गया था.

आयोजकों का कहना है कि इस सम्मेलन का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अफ़गानिस्तान के साथ संबंधों को बढ़ाना और सुरक्षा बहाल करना है.

लख़दर ब्राहिमी

"हमें ये देखना होगा कि तालेबान क्या कर रहे हैं और वो क्या सोच रहे हैं और अगर उनकी रुचि है तो हमें देखना होगा कि क्या हम उनके लिए जगह बना सकते हैं"

अफ़गानिस्तान की सुरक्षा और खुशहाली के लिए पड़ोसी देश पाकिस्तान को महत्वपूर्ण माना जाता है लेकिन पाकिस्तान ने 26 नवंबर को पाकिस्तानी चेकपोस्ट पर हुए नैटो के एक हमले के बाद कड़ा रवैय्या अपना रखा है.

हालांकि नैटो ने इस हमले के लिए माफी मांगी है और यहां तक कि अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा ने भी इस घटना पर खेद जताया है लेकिन पाकिस्तान का कड़ा रुख बरकरार है.

अमरीका और अन्य पश्चिमी देशों को लंबे समय से संदेह है कि पाकिस्तान तालेबान और हक्कानी नेटवर्क जैसे अन्य चरमपंथी गुटों को प्रश्रय देता रहा है.

बॉन में हो रहे इस सम्मेलन का कई लोगों ने विरोध भी किया है.

कई पर्यवेक्षकों का मानना है कि लंबे समय में अफ़गानिस्तान को मदद दिया जाना अत्यंत ज़रुरी है क्योंकि पश्चिमी देशों की योजना 2014 में अफ़गानिस्तान से हटने की है.

सोमवार से शुर हो रहे इस महत्वपूर्ण सम्मेलन में सौ देशों और संगठनों के 1000 से अधिक प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं.

अमरीकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन समेत अमरीका के कई वरिष्ठ मंत्री भी इसमें शामिल होंगे.

पाकिस्तान से सटी अफ़गानिस्तान की सीमा पर पिछले एक दशक से ज़बर्दस्त संघर्ष चलता आ रहा है. अफ़गानिस्तान में पिछले इस वर्ष अब तक नैटो के 500 सैनिक मारे जा चुके हैं.

जर्मनी के विदेश मंत्री गुइडो वेस्टरविले का कहना था, ‘‘हमारा उद्देश्य एक शांतिपूर्ण अफ़गानिस्तान बनाना है ताकि वो फिर से कभी अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का अड्डा न बन सके.’’

अफ़गानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र के पूर्व दूत लखदर ब्राहिमी का कहना था कि उन्होंने दस वर्ष पहले भी यही बात कही थी कि तालेबान के साथ बातचीत करनी चाहिए.

ब्राहिमी ने बीबीसी से बातचीत में कहा, ‘‘ हमें ये देखना होगा कि तालेबान क्या कर रहे हैं और वो क्या सोच रहे हैं और अगर उनकी रुचि है तो हमें देखना होगा कि क्या हम उनके लिए जगह बना सकते हैं.’’

तालेबान के साथ बातचीत की कोशिशें लंबे समय से चल रही हैं लेकिन अभी तक इसका कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आ पाया है.

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