रुस में चुनावी नतीजे रद्द करने की मांग

रुस
Image caption माना जा रहा है कि ये रुस में अब तक का बड़ा प्रदर्शन है जिसने सरकार को हिला दिया है

मॉस्को शहर के केंद्र में इकट्ठा हुए प्रदर्शनकारियों ने हाल ही में रुस में हुए संसदीय चुनाव के नतीजों को रद्द किए जाने की मांग की.

विपक्षी दलों का कहना है कि प्रधानमंत्री व्लादिमीर पुतिन की यूनाईटेड रशिया पार्टी ने इन चुनाव में जीत धांधली से हासिल की है.

इन प्रदर्शनकारियों की क्रेमलिन के नज़दीक हुई रैली में कुछ सौ लोगों ने भाग लिया.

शनिवार को हज़ारों की संख्या में लोगों ने रुस की सड़कों पर उतर कर चुनाव के नतीजों के विरोध और चुनाव को रद्द किए जाने की मांग को लेकर रैली निकाली थी. इसके बाद रविवार को भी लोग मॉस्को में जमा हुए हैं.

इसके तहत मॉस्को समेत देश के 50 शहरों में विशाल प्रदर्शन हुए थे. इस प्रदर्शन में लोग 'हम दोबारा चुनाव चाहते हैं ' और 'चुनाव में धांधली हुई' के नारे लगा रहे थे.

मॉस्को में मौजूद बीबीसी संवाददाता डेनियल सैंडफ़ोर्ड के अनुसार वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो ये इतना बड़ा प्रदर्शन नहीं था.

पुलिस के अनुसार इसमें 25000 लोगों ने हिस्सा लिया था.

बीबीसी संवाददाता का कहना है कि रुस के लिए 21वीं सदी में हुआ ये प्रदर्शन काफ़ी बड़ा माना जा सकता है और इसने देश के राजनीतिक नेतृत्व को हिला दिया होगा.

खुलेआम धांधली

पिछले 12 सालों में रुस में जब भी प्रदर्शन हुए है लोग उनमें शामिल नहीं हुआ करते थे.

यहाँ लोग राजनीति को कम अहमियत देते थे. केवल उनका मक़सद अपनी जिंदगियों में स्थिरता लाना होता था.यहां लोग सोवियत संघ के विघटन से पहले क्षेत्र को नियंत्रित करने वाली सरकार और नब्बे के दशक की कड़वी यादों को भुला देना चाहते थे.

लेकिन जब इस बार चुनाव हुए तो लोगों ने अपनी सोच बदली. उन्हें लगा कि शासक वर्ग उनकी स्थिति का फ़ायदा उठा रहा है. इस बात को ध्यान में रखते हुए एक बड़ी संख्या ख़ासकर मॉस्को में लोगों ने सत्ताधारी यूनाईटेड राशिया पार्टी के ख़िलाफ़ मतदान किया.

लेकिन जब नतीजे आए तो उन्हें लगा कि उनके साथ धोखा हुआ है.

मॉस्को में हुए प्रदर्शनों के दौरान इन लोगों का कहना था कि इंटरनेट पर दिखाए गए वीडियो में मतपेटियों को भरा जाना,वोटों की चोरी और अधिकारिक नतीज़ो की खुलेआम धांधली को देखकर वे पागल हो गए.

जो लोग प्रदर्शन कर रहे थे उनमें युवा, पढ़े-लिखे और इंटरनेट से जुड़ने वाले लोग शामिल थे.

ये रुस के सोशल नेटवर्किंग का आंदोलन रहा. इस प्रदर्शन के दौरान विपक्षी पार्टियों को पहली बार हज़ारों की संख्या में लोगों से मुख़ातिब होने का मौका मिला.

नया ख़तरा

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Image caption रुस में पहले लोग राजनीति को कम महत्व देते थे

यहाँ लोग ट्विटर, फ़ेसबुक और अन्य नेटवर्किंग साइट की मदद से एक दूसरे से जुड़े थे.

व्लादिमीर पुतिन के सलाहकार ने जस्ट रशिया पार्टी को बनाया था ताकि कम्युनिस्टों के वोटों को पाया जा सके लेकिन अब इस पार्टी के उपनेता ही भ्रष्टाचार से नाराज़ दिखे और इस प्रदर्शन में भाग लेते नज़र आए.

प्रदर्शकारियों की इस भीड़ में कुछ कट्टरपंथी और 1991 के क्रांतिकारी थे जिन्होंने कम्युनिस्ट शासन को बेदखल कर दिया था.

बीबीसी संवाददाता के अनुसार पुतिन को इन लोगों से डर नहीं है. उनकी नई समस्या वे युवा है जो 'आई पैड' इस्तेमाल करने वाली पीढ़ी है यानी जो सोशल नेटवर्किंग साइटों का इस्तेमाल करती है.जिन्होंने पिछले 12 सालों से अपने अभिभावकों को आज़ादी खोने, चुनावी धांधली , भ्रष्टाचार और सरकार नियंत्रित टेलीविज़न के बारे में सुना है.