'गांधी से सबक़ लें अन्ना'

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Image caption अन्ना हज़ारे के अचानक अपना आंदोलन खत्म करने की घोषणा पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं.

अन्ना हज़ारे ने इस बार अपना अनशन बीच में ही ख़त्म करने का ऐलान कर दिया, इतना ही नहीं उन्होंने जेल भरो आंदोलन को भी फ़िलहाल स्थगित कर दिया... इसके कई मायने निकाले जा सकते हैं.

अन्ना के इस फ़ैसले में उनकी सेहत का ख़राब होना मुख्य वजह है, क्योंकि डॉक्टरों ने भी उन्हें अनशन करने से मना किया था, लेकिन इस आंदोलन को बीच में रोकने के पीछे कहीं ना कहीं अपेक्षित जनसमर्थन ना मिलना भी एक कारण रहा होगा. क्या अन्ना हज़ारे को गांधी जी से सबक लेना चाहिए? अपने विचार रखें.

किसी भी आंदोलन में जनसमर्थन का मिलना बहुत ज़रुरी होता है और ये आंदोलन की शुरुआत या चढ़ाव के दिनों में आसानी से मिल जाता है बनिस्बत बाद के दिनों में जब ये तय करना मुश्किल होता है कि कहाँ रुकना है और कहाँ क़दम खींचना है.

मुझे लगता है कि अन्ना के आंदोलन को इस बार इसी मुश्किल का सामना करना पड़ा है और जो फ़ैसला थोड़ा पहले लिया जा सकता था उसे लेने में थोड़ी देर हो गई. इस तरह अचानक से आंदोलन स्थगित करने का पहला कारण कहीं ना कहीं अन्ना का स्वास्थ्य रहा होगा, जिसे लेकर कल से ही चिंता जताई जा रही थी.

वैसे इसका दूसरा पक्ष ये है कि इससे उन्हें वो मौक़ा मिला जिसकी उन्हें ज़रुरत थी और वो ज़रुरत थी आंदोलन को एक ब्रेक देने की क्योंकि इस आंदोलन को अपेक्षित जनसमर्थन नहीं मिल रहा था.

इसके अलावा संसद में जिस तरह से लोकपाल बिल को लेकर तेज़ी से गतिविधियाँ चल रहीं है और लगातार बदल रही हैं उस पर प्रतिक्रिया देने का भी अन्ना समूह को समय नहीं मिल पा रहा था.

इतिहास कभी दोहराता नहीं

ऐसे में अन्ना आंदोलन के भीतर लोगों में ये अहसास जगा कि अगस्त में जो आंदोलन हुआ था उसे दोहराया नहीं जा सकता. राजनीति में पुनरावृत्ति की चाह बहुत ज़्यादा रहती है, लेकिन अगर इतिहास पलट कर देखा जाए तो ऐसा कभी नहीं हुआ है कि किसी ऐतिहासिक घटना को दोहराया जा सका हो... और इसका एहसास कहीं ना कहीं टीम अन्ना के सदस्यों को हो गया होगा. योगेन्द्र यादव के साथ पूरी बातचीत सुनने के लिए यहां क्लिक करें...

मैं समझता हूँ ऐसे किसी भी आंदोलन को मिले जनसमर्थन को दो स्तर पर देखा जाना चाहिए. एक वो जो नज़र आता है, यानि रामलीला मैदान, मुंबई के एमएमआरडीए के मैदान या फिर सड़कों पर अन्ना के समर्थन में उतरे लोगों की भीड़.

दूसरा वो जो लोगों के मन में होता है लोग घर पर ही रहते हैं लेकिन उनके मन में एक एहसास होता है कि जो काम हो रहा है वो सही है.

ये हम कह सकते हैं कि जो ज़ाहिर होने वाला समर्थन है वो घटा है, लेकिन लोगों के मन में जो आदर और सम्मान की भावना अन्ना के लिए थी वो कितनी घटी या बढ़ी है उसके बारे में हमें नहीं पता.

जो जो बाहरी समर्थन घटा है उसकी वजह ये है कि इस तरह के जन-आंदोलनों को जो स्वत:स्फूर्त समर्थन मिलता है वो एक बार ही मिलता है बार-बार नहीं. उसके बाद संगठन को संगठित करके उसकी शक्ति के सहारे ही आंदोलन को जारी रखा जाता है क्योंकि कहीं ना कहीं एक थकान आ जाती है.

अन्ना के आंदोलन में शुरु से कुछ कमज़ोरियां रहीं हैं और उन कमज़ोरियों की तरफ़ ध्यान नहीं दिया गया लेकिन मुझे नहीं लगता कि फ़िलहाल उन कमज़ोरियों की तरफ़ लोगों में ग़ुस्सा था. पर लोगों के मन में ये भाव ज़रूर जगने लगा था कि ये आंदोलन न सिर्फ़ व्यवस्था के विरुद्ध था बल्कि किसी एक पार्टी के ख़िलाफ़ खड़ा होता जा रहा था शायद उससे नुक़सान हुआ हो.

अन्ना का विधानसभा चुनाव में पाँच राज्यों में जाकर पार्टियों के खिलाफ़ चुनाव प्रचार करने की घोषणा, आंदोलन से भटकना नहीं है क्योंकि अगर आप किसी राजनीतिक व्यवस्था से कुछ करवाना चाहते हैं तो ये आंदोलन की ही एक परिणति होगी कि आप चुनाव के मैदान में जाकर उसे चुनौती दें.

अन्ना आंदोलन के सामने दिक्कत ये है कि वो किस के ख़िलाफ़ खड़े होंगे, एक या दो दल के ख़िलाफ़ या तमाम दल के ख़िलाफ़, अगर एक-दो दल तो कौन से दल.

कल संसद में जो हुआ उससे तो मुझे ये लगता है कि कोई भी दल ये नहीं चाहता था कि ये बिल संसद में पास हो और साथ में वो ये भी चाहते थे कि बिल पास ना होने का इल्ज़ाम उनके सिर ना आए.

चुनावी राजनीति के दंगल में राजनीतिक दलों को चित्त करना बहुत टेढ़ी खीर है उसके लिए जो संगठन, कौशल और रणनीति चाहिए वो शायद अभी अन्ना की टीम में नहीं है. ये एक बिल्कुल नए तरह का खेल है जिसके दाँव-पेंच समझना अभी इनके बस में नहीं है.

अन्ना ने भले ही चुनाव प्रचार की घोषणा कर दी हो लेकिन ये कितना प्रभावी होगा इसको लेकर मेरे मन में संदेह है.

संसद की कार्यवाही के दौरान जब लोकपाल पर बहस जारी हो, इस दौरान अनशन करने के फ़ैसले पर भी मुझे कुछ अजीब नहीं लगता.

संसद के सत्र के दौरान दिल्ली शहर में ना जाने कितनी रैलियाँ और प्रदर्शन होते हैं, सही समय पर अपनी बात रखना, संसद को चेतावनी देना कि जनता आपसे नाराज़ हो सकती है ये लोकतंत्र के न्यूनतम क़ायदे का ही एक हिस्सा है. फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि कुछ लोग लॉबीज़ में जाकर प्रदर्शन करते हैं, कुछ लोगों को सीधा नॉर्थ और साउथ ब्लॉक में जाने दिया जाता है और कुछ लोग सड़कों पर उतर आते हैं, रामलीला मैदान चले जाते हैं. संसद के सत्र के दौरान राजधानी की सड़कों का भरा होना, रामलीला मैदान का भरा होना लोकतंत्र की अच्छी समझ की निशानी है.

गांधी से सीखें

अन्ना हज़ारे को गांधी जी से कुछ सीखना चाहिए, गांधी जी ने जब भी किसी नए मुद्दे को उठाया उसमें सांकेतिक विजय मिलने के साथ ही एक नई ज़मीन की तलाश की... कभी भी किसी आंदोलन को उसकी अंतिम परिणती तक घसीटा नहीं, अपने आपको उससे दो इंच अलग करके रखा.

अन्ना के आंदोलन को अगस्त में ये सफलता मिल चुकी थी, देश में ये मान्यता मिल चुकी थी कि लोकपाल नाम की चीज़ देश में होनी चाहिए. देश की लाखों जनता के मन ये बात बैठ चुकी थी कि वो बेचारी प्रजा ना होकर, सशक्त नागरिक हैं. ये आंदोलन की बड़ी सफलता थी उसके बाद इन्हें नई ज़मीन तलाश करनी चाहिए थी.

इस आंदोलन को लोकपाल में मीन-मेख निकालने के बजाए उन्हें एक दीर्घकालिक दिशा देखनी होगी. ये दीर्घकालिक दिशा होगी देश के राजनीतिक ढाँचे में बदलाव की, इस देश में एक वैकल्पिक किस्म की राजनीति की शुरुआत करने की.

जब तक अन्ना का आंदोलन इस तरफ नहीं बढ़ेगा तब तक वे स्थापित राजनीति के स्थापित दांव पेंच और फिसलन भरी ज़मीन पर रहेगा जिसमें गिरने और चोट खाने की गुंजाइश काफ़ी ज़्यादा है.

(बीबीसी संवाददाता अमरेश द्विवेदी से बातचीत पर आधारित)

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