हत्या के पीछे नरबलि या पारिवारिक रंजिश

 मंगलवार, 3 जनवरी, 2012 को 20:15 IST तक के समाचार
ललिता तांती

पुलिस ललिता तांती की हत्या को नरबलि की आशंका मान रही है

छत्तीसगढ़ पुलिस को शक है कि राज्य के बीजापुर में सामने आए नरबली के मामले में आपसी पारिवारिक रंज़िश भी हत्या की एक वजह हो सकती है.

पुलिस अधिकारियों का कहना है कि जिन दो लोगों को ललिता तांती नाम की नौ वर्षीया आदिवासी लड़की की बलि चढ़ाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है, उनकी ललिता के पिता बुधराम से पुरानी रंजिश रही है. मामले की जांच कर रहे अधिकारियों का कहना है कि वे घटना के इस पहलू को भी नज़र अंदाज़ नहीं कर सकते हैं.

नक्सल प्रभावित बीजापुर के जेलबाड़ा की रहने वाली ललिता पास के ही पोटा केबिन स्कूल में पढ़ती थीं. बीते साल 21 अक्तूबर को उनका कथित रूप से अपहरण कर लिया गया था.

मंदिर के पास मिली लाश

हफ़्ते भर बाद ही उसकी लाश पास के जंगल से बरामद की गई थी. पुलिस का कहना है कि चूँकि लाश जहाँ से बरामद की गई, वहाँ एक मंदिर भी है, इसलिए आशंका जताई जा रही है कि ललिता की बलि चढ़ा दी गई थी.

पुलिस का कहना है कि लाश बुरी हालत में बरामद की गई और शरीर के कई अंग बाहर निकले हुए थे जिनमें कलेजा भी शामिल है. घटना के बाद ललिता के परिवार वालों ने पड़ोस के ही रहने वाले कुछ लोगों पर शक़ ज़ाहिर किया.

इसके बाद 31 दिसंबर को बीजापुर पुलिस ने इस मामले में दो आरोपियों को गिरफ़्तार किया.

हालांकि पुलिस ने पत्रकारों को अभियुक्तों से बात करने की अनुमति नहीं दी, मगर अधिकारियों का कहना है कि गिरफ़्तार किए गए दोनों व्यक्तियों ने अपना अपराध कथित रूप से स्वीकार कर लिया है.

पुलिस का कहना है कि गिरफ्तार लोगों ने बलि चढ़ाने की बात भी क़ुबूल की है. आशंका व्यक्त की जा रही है कि अच्छी फसल के लिए ही बच्ची की बलि चढ़ाई गई होगी.

मामले की जांच में लगे अधिकारियों का कहना है कि अगर ललिता की बलि चढ़ाई गई है तो इसमें सिर्फ़ दो लोग शामिल नहीं हो सकते. यह काम एक समूह का हो सकता है.

पुलिस का दावा है कि अभियुक्तों से पूछताछ के क्रम में कुछ और लोगों के नाम सामने आए हैं, मगर अभी तक किसी और की गिरफ़्तारी नहीं हो पाई है. गिरफ़्तार किए गए लोग भी आदिवासी समुदाय से हैं.

नरबलि का प्रचलन

बच्चों की बलि या नर बलि का पूर्वी और मध्य भारत के अलावा उत्तर प्रदेश के पश्चिमी इलाकों में ख़ासा प्रचलन रहा है. मगर सरकार का दावा है कि उसने इस प्रथा की रोकथाम के लिए बहुत प्रयास किए हैं जिसकी वजह से इस तरह की घटनाएं अब नहीं होती हैं.

हालांकि मध्य और पूर्वी भारत के झारखंड जैसे राज्यों में समय-समय पर इस तरह के मामले सामने आते रहे हैं.

ख़ासतौर पर मध्य और पूर्वी भारत के सुदूर अंचलों में आदिवासियों के बीच कई और सामाजिक बुराइयाँ प्रचलित हैं, डायन प्रथा जिनमें से एक है. संसाधनों के अभाव में आदिवासी क्षेत्रों के लोग ओझा और तांत्रिकों के चक्कर में पड़ जाते हैं.

ये तांत्रिक ग्रामीण इलाकों में बीमारी और सूखे के लिए इन्हीं औरतों को डायन बताकर उन्हें इन सब के लिए ज़िम्मेदार ठहराते है. कई मामलों में तो उनकी हत्या भी कर दी जाती है.

हाल ही में छत्तीसगढ़ के चांपा-जांजगीर ज़िले में 40 से अधिक वृद्ध महिलाओं को बैगा के कहने पर जड़ी-बूटी का घोल पिलाया गया ताकि यह साबित हो पाए कि वे डायन नहीं हैं. घोल पीने के बाद ये सभी औरतें बीमार पड़ गईं थीं और इस मामले में पुलिस ने एक पुजारी सहित दर्जन भर लोगों को गिरफ़्तार किया.

इससे पहले झारखंड उच्च न्यायालय ने जामतारा के एक तांत्रिक को नरबली का दोषी पाते हुए उसे मौत की सज़ा सुनाई थी.

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