'ईरान पर दबाव का असर भारत पर भी दिखेगा'

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ईरान से तेल ख़रीद के ऊपर यूरोपीय संघ द्वारा नए प्रतिबंधों की बात ने भारत में तेल व्यवसाय के जानकारों की चिंताओं को बढ़ा दिया है. भारत ईरान से अपनी ज़रुरत का 10 फ़ीसदी से ज़्यादा तेल आयात करता है.

हालाँकि भारत के ईरान से तेल ख़रीदने और यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों के बीच सीधा रिश्ता नहीं है लेकिन ऊर्जा मामलों के जानकार नरेंद्र तनेजा कहते हैं कि इससे भारत भी प्रभावित होगा.

बीबीसी संवाददाता अविनाश दत्त के साथ बातचीत में तनेजा ने भारत-ईरान के बीच तेल के व्यापार और इन रिश्तों की कूटनीतिक पेचीदगियों पर बात की.

क्या यूरोपीय प्रतिबंधों का भारत पर भी कोई असर पड़ेगा?

असर इस हिसाब से पड़ेगा कि यूरोपीय संघ अगर ईरान से तेल लेना बंद करता है तो यह भारत के लिए भी यह एक कड़ा संदेश होगा कि वो भी ऐसा ही करे. अगर भारत इसे नज़रंदाज़ करता है तो ऐसा भी हो सकता है कि जो भारतीय या पश्चिमी कम्पनियाँ ईरान और भारत में काम करती हैं वो भी प्रभावित हों.

उदहारण के तौर पर जब अमरीका ने ईरान के ऊपर प्रतिबंध लगाए थे तब भारत की सबसे बड़ी निजी कंपनी रिलायंस, जो कि ईरान में व्यापार कर रही थी उसको अमरीकी सख़्ती के बाद ईरान में अपना काम-काज बंद करना पड़ा.

दूसरी बात भारत इस हद तक जाएगा नहीं कि पश्चिम को नाराज़ करके ईरान के साथ संबध रखे.

भारत और ईरान के अच्छे संबंध रहे हैं और अब भी दोनों देशों के बीच रिश्ते बुरे नहीं है. क्या भारत पश्चिमी देशों और ईरान के बीच किसी तरह से तनाव कम करने की दिशा में काम कर सकता है?

भारत ने यह कोशिश भी की थी. भारत के विदेश मंत्री भी ईरान के दौरे पर गए थे और भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ख़ुद मध्यस्थता के प्रयासों में शामिल थे. लेकिन कोई रास्ता नहीं निकला. भारत ने ईरान को समझाने की कोशिश की लेकिन अभी तक कोई सफलता हाथ नहीं लगी.

दरअसल ईरान में दो तरह के गुट मायने रखते हैं. एक नरमपंथी हैं जो भारत के साथ ख़ास तौर पर आर्थिक मामलों में अच्छे संबंध चाहते हैं लेकिन दूसरे कट्टरपंथी हैं जो मानते हैं कि भारत पश्चिम का पिछलग्गू है और हमें इससे दूर रहना चाहिए.

भारत ईरान के बीच कुछ दिनों पहले तेल के भुगतान को लेकर तनाव था. तमाम प्रतिबंधों के बाद भारत किस तरह से ईरान को पैसे देता है?

ईरान को भुगतान करना भारत के लिए एक बड़ी दिक्कत है. मूलतः यह भुगतान डॉलर में होता था लेकिन अमरीका के दबाव में यह बंद हो गया. फिर भारत ने जर्मनी के रास्ते से यूरो में भुगतान किया पर अमरीकी दबाव ने वह रास्ता भी बंद कर दिया.

भारत ने इसी तरह से दुबई और तुर्की के रास्ते भी ईरान को पैसे दिए. भारत के प्रधानमंत्री ने हाल के रूस के दौरे में रूस के रास्ते भी ईरान को पैसे भेजने की बात की. लेकिन बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते ऐसा लगता नहीं कि यह भी ज़्यादा दिन चल पाएगा. इसके अलावा अंतिम रास्ता यह है कि ईरान रुपयों में भुगतान लेना शुरू कर दे.

केवल चीन के रास्ते ऐसा संभव है लेकिन भारत ऐसा कतई नहीं करना चाहता. अब केवल एक रास्ता है कि ईरान भारत से बदले में चीज़ें ले या भारत को अपने यहाँ आधारभूत ढाँचे के भुगतान का काम दे जो भारत तेल के बदले में कर दे.

अगर ईरान से तेल लेना बहुत ही मुश्किल हो जाता है तो भारत के लिए क्या रास्ते हैं ?

ऐसा माना जा रहा है कि सऊदी अरब अपने तेल का उत्पादन बढ़ा देगा और भारत पश्चिम को नाराज़ करने और तमाम अंतरराष्ट्रीय संधियाँ लाँघने की जगह सऊदी अरब से तेल लेना पसंद करेगा.

क्या भारत और ईरान के बीच कुछ और भी मसले हैं. भारत संयुक्त राष्ट्र में ईरान के खिलाफ़ मत डाल चुका है, क्या वो केवल अमरीकी दबाव में था ?

भारत कतई नहीं चाहता कि ईरान परमाणु हथियार विकसित करे क्योंकि अगर ईरान ऐसा करेगा तो मध्य पूर्व की पूरी राजनीति बदल जाएगी और उसका प्रभाव अफ़गानिस्तान और फिर हमारे चारों तरफ़ पड़ेगा.

दूसरा अगर ईरान ने परमाणु हथियार हासिल किए तो सऊदी अरब, सीरिया भी करेंगे और भारत के चारों तरफ़ परमाणु हथियारों का एक जाल फैल जाएगा जो कि भारत कतई नहीं चाहता.

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