अब समुद्र से मछली पकड़ने की हिम्मत नहीं..

मछुआरे
Image caption पाकिस्तान सरकार ने रविवार को 179 भारतीय मछुआरों को रिहा कर दिया है

भारत के गुजरात निवासी हिम्मत सिंह पेशे से मछुआरे हैं लेकिन जिस काम को करके वो अब तक अपनी रोज़ी-रोटी कमाते रहे हैं, अब उसी पेशे में वो दोबारा नहीं जाना चाहते हैं.

हिम्मत सिंह कहते हैं कि अब उनमें समुद्र से मछली पकड़ने की हिम्मत नहीं रही.

गुजरात के जूनागढ़ निवासी हिम्मत सिंह पाकिस्तानी जलसीमा का उल्लंघन करने के आरोप में पिछले 13 महीनों से कराची के लाढी जेल में क़ैद थे.

13 महीने की क़ैद के बाद अब हिम्मत सिंह उन 180 भारतीय मछुआरों में से एक हैं जिनको नए साल के मौके पर पाकिस्तान सरकार ने रिहा करने की घोषणा की थी.

पाकिस्तान के जेल अधिकारियों ने शनिवार को 180 भारतीय मछुआरों और एक आम नागरिक को रिहा कर दिया है. इन सभी भारतीय नागरिकों को रविवार को वाघा सीमा पर भारतीय अधिकारियों को सौंप दिया जाएगा.

लाढी जेल में बीबीसी से बातचीत करते हुए हिम्मत सिंह ने कहा कि,"मुझ में हिम्मत है तभी मैं 13 महीने जेल में बिता पाया हूँ और अब जेल से छूट रहा हूँ तो मुझे इसकी बहुत ख़ुशी हो रही है".

लेकिन हिम्मत ये भी कहते हैं कि भारत पहुंचने के बाद वो फिर से मछली नहीं पकड़ेंगे और खेतीबाड़ी करके अपने बच्चों का पेट पालेंगे.

जब मैंने उनसे कहा कि अगली बार मछली पकड़ने के लिए जाएं तो कराची की ओर आने के बजाए मुंबई की ओर चले जाएं, इस पर उन्होंने कहा कि''मैं अब कभी भी मछली नहीं पकड़ूंगा''.

उन्होंने आगे कहा,"मछली पकड़ने के लिए मैं पहली बार समुद्र में उतरा था और चार दिन के बाद ही गिरफ्तार हो गया,अब अगर खुद के खाने के लिए भी मछली पकड़ना पड़े तो भी ये काम कभी नहीं करुंगा".

हिम्मत जैसा डर यहां मौजूद सभी मछुआरों के मन में समाया हुआ था और सभी ने कहा कि देश पहुंचने के बाद अब वो ये काम कभी नहीं करेंगे.

जूनागढ़ के रहने वाले 40 साल के दिनेश को कराची जेल में आए 15 महीने हो चुके हैं और उनका भी कुछ ऐसा ही कहना है. वे कहते हैं, "मैं अब फिर से ये काम कभी नहीं करुंगा क्योंकि मुझे अपनी बाक़ी की ज़िंदगी जेल में नहीं काटनी है,घर पहुंचते ही दूसरा काम-धंधा देखूंगा''.

लेकिन यहां कुछ लोग ऐसे भी हैं जो वापिस अपने देश जाकर फिर से पुराना काम शुरु करना चाहते हैं पर पूरी सावधानी के साथ.

मन में अब भी है डर

प्रमार्थी अर्जुन उन्हीं चंद लोगों में से एक हैं जो कहते हैं,''आज मैं बहुत ही खुश हूँ क्योंकि मुझे रिहाई मिल रही है और मैं कुछ ही दिनों में अपने परिवार से मिल पाऊंगा लेकिन मेरे मन में एक डर भी है,घर पहुंचने में तीन-चार दिनों का समय बाकी है और इन तीन-चार दिनों में कुछ भी हो सकता है''.

Image caption प्रमार्थी अर्जुन उन 179 मछुआरों में से एक हैं जो अपने घरवालों से डेढ़ साल बाद मिलेंगे

प्रमार्थी अर्जुन ने अपनी और अपने साथियों की रिहाई का पूरा श्रेय पाकिस्तान के आंतरिक मामलों के मंत्री रहमान मलिक को दिया है और कहा कि दोनों देशों के संबंधों में आई गर्माहट के कारण ही आज उन्हें आज़ादी नसीब हुई है.

इन्हीं मछुआरों में से एक हैं परशुराम ओखा,जो खुद तो पाकिस्तान जेल से रिहा हो गए हैं लेकिन उन्हें अपने उन साथियों की चिंता खाए जा रही है जो अब भी कराची जेल में बंद हैं.

परशुराम कहते हैं,''मुझे अपनी रिहाई की ख़ुशी तो बहुत है लेकिन अपने उन साथियों की चिंता भी है जो पिछले दो सालों से यहां क़ैद हैं. उनका भी परिवार है जिनके लिए कमाने वाला कोई और नहीं है, बस यही चिंता मुझे परेशान कर रही है''.

इन 180 भारतीय मछुआरों की रिहाई के बाद भी पाकिस्तान के जेलों में अब भी क़रीब 362 मछुआरे क़ैद हैं जिनमें से और 276 मछुआरों को रिहा किए जाने की संभावना है.

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