इतिहास के पन्नों में 16 जनवरी

इतिहास के पन्नों को पलटें तो पाएंगें कि 16 जनवरी के दिन 1979 ईरान के शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी देश छोड़ भागे थे, तो उधर 28 वर्ष की उम्र में कर्नल मुअम्मार गद्दाफ़ी ने 1970 में सत्तापलट के बाद लीबिया की बागडोर संभाली थी.

1979 : ईरान के शाह देश छोड़ भागे

Image caption मोहम्मद रज़ा पहलवी को पश्चिमी देशों का पिट्ठी माना जाता था.

16 जनवरी 1979 के दिन ईरान के शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी देश छोड़ कर अपनी पत्नी के साथ मिस्र चले गए थे.

सरकारी रिपोर्टों के अनुसार, हालांकि, कहा गया था कि वे ‘छुट्टी मनाने’ मिस्र गए हैं, लेकिन असल में ईरान के नए प्रधानमंत्री ने उन्हें देश छोड़ कर जाने के लिए कहा था.

ईरान में कई महीनों से सुरक्षाबलों और शाह के ख़िलाफ़ हिंसक विरोध प्रदर्शन चल रहे थे.

ये विरोध प्रदर्शन तब शुरू हुए जब ईरान के धर्मगुरु आयतुल्लाह रुहोल्लाह ख़ोमैनी फ्रांस से लौटे और ईरान में एक लोकप्रिय धार्मिक गणतंत्र की स्थापना के लिए देशव्यापी मुहिम चलाई.

आयतुल्लाह के लौटने पर और शाह के निर्वासन में जाने का पूरे ईरान में जश्न मनाया गया.

पश्चिमीकरण का प्रतीक माने जाने वाले ब्रितानी और अमरीकी कर्मचारी भी इसके बाद ईरान छोड़ कर जाने लगे थे.

दरअसल अमरीका, ब्रिटेन और पश्चिमी जर्मनी जैसे देशों ने ईरान के शाह का लगातार समर्थन किया था.

इसके बाद सितंबर में ईरान के कई शहरों में सैन्य क़ानून लागू कर दिया गया था. लेकिन ईरान में तेल कारखानों के कर्मचारियों ने एक हड़ताल शुरू कर दी जिसके बाद पूरे ईरान में दंगे फैल गए और आयतुल्ला के समर्थन में रैलियां होने लगीं.

इसके बाद आयतुल्ला ने जनमतसंग्रह के बूते पर डॉक्टर बख़्तियार की सरकार को गिरा कर ईरान को एक लोकप्रिय धार्मिक गणतंत्र बनाने की घोषणा की.

1970: कर्नल गद्दाफ़ी ने लीबिया की बागडोर संभाली

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Image caption सैन्य तख़्तापलट के बाद 28-वर्षीय कर्नल गद्दाफ़ी ने लीबीया के प्रधानमंत्री का पद लिया

1970 में कर्नल मुअम्मार गद्दाफ़ी ने अहिंसक सत्तापलट के बाद लीबिया के प्रशासन को अपने हाथों में लिया था.

यानि अब राजा इदरिस के शासन का अंत हो चुका था.

सैन्य तख़्तापलट के बाद 28-वर्षीय कर्नल गद्दाफ़ी ने प्रधानमंत्री का पद लिया और अपने काउंसिल में चार लोगों को नियुक्त किया.

इससे पहले कर्नल गद्दाफ़ी ने रक्षा और आंतरिक मंत्रियों द्वारा तख़्तापलट की योजना को नाकाम किया था और दोनों मंत्रालयों को अपने कब्ज़े में कर लिया था.

अरब एकजुटता की हमेशा वकालत करने वाले कर्नल गद्दाफ़ी ने तख़्तापलट के बाद ब्रिटेन को आदेश दिया कि वो लीबिया से अपने सैन्य अड्डों को छोड़ कर वापस लौट जाए.

हालांकि टाइम्स अख़बार को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि पश्चिमी देशों के साथ सैन्य संधियों को स्थगित नहीं किया जाएगा.

लीबिया का शासन संभालने के बाद उन्होंने वहां के वाणिज्य और उद्योग का ‘लीबियाईकरण’ करने की मुहिम शुरू की.

ग़ैर-लीबियाई लोगों को बड़े पदों से हटा दिया गया था और इसका अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ा था क्योंकि कई कुशल कर्मचारियों को देश से निकाल दिया गया था. हालांकि लीबिया के तेल उद्योग पर ख़ासा असर नहीं पड़ा था.

कर्नल गद्दाफ़ी की गिनती विश्व के सबसे बड़े तानाशाहों में होने लगी थी.

2010 में लीबिया में चली लंबी जन-क्रांति के बाद उनकी हत्या कर दी गई थी.

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