कॉन्क्रीट के गोले रोकेंगे छत पर यात्रा!

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ट्रेन की छत पर यात्रा करने वाले लोगों से केवल भारत सरकार चिंतित नहीं है, इंडोनेशिया की सरकार भी है.

इस समस्या से निपटने के लिए भारत सरकार अब तक कोई ठोस क़दम नहीं उठा पाई है, लेकिन इंडोनेशिया की सरकार ने एक नया तरीक़ा तलाश किया है.

वह रेल पटरियों के ऊपर कॉन्क्रीट के बड़े गोले टंगवा रही है जिससे कि लोगों के ट्रेन की छत पर यात्रा करने से रोका जा सके.

इस तरह के पहले गोले ट्रेन की ऊँचाई से ठीक ऊपर राजधानी जकार्ता में स्टेशन के बाहर टंगवाए जा रहे हैं.

अधिकारियों का कहना है कि अगर दूसरी जगह भी लोग ट्रेन की छत पर बैठकर यात्रा करते हुए दिखे तो वहाँ भी यही उपाय अपनाया जाएगा.

कई प्रयासों के बाद

इससे पहले इंडोनेशिया की सरकार ने लोगों को ट्रेन की छत पर यात्रा करने से रोकने के लिए कई उपाय किए थे.

मसलन ट्रेन की छत पर पेंट डाल देना या तेल डाल देना, संगीतकारों से ट्रेन की छत पर यात्रा न करने की अपील करने वाले गीत तैयार करवाना आदि.

उन्होंने ट्रेनों की छत पर कँटीले तार भी लगवाए लेकिन बात नहीं बनी.

हालांकि वहाँ ऐसी यात्रा करने वालों के लिए जेल की सज़ा का भी प्रावधान है लेकिन संवाददाताओं का कहना है कि इसका यात्रियों पर कोई असर ही नहीं हो रहा था.

अधिकारियों को उम्मीद है कि इस नए उपाय से लोग ट्रेन की छत पर यात्रा करना बंद कर देंगे.

ये गोले ट्रेन की छत से कुछ ही इंचों की ऊँचाई पर लगवाए जा रहे हैं. इन्हें स्टेशन के प्रवेश के समय या बाहर निकलने वाले रास्तों पर लगवाया जा रहा है.

इनके लग जाने के बाद यदि कोई छत पर बैठेगा तो वह इन गोलों से बुरी तरह टकराएगा.

ख़तरनाक यात्रा

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Image caption विश्लेषकों का कहना है कि अपर्याप्त संख्या में ट्रेन भी इसकी एक वजह है

अधिकारियों ने बीबीसी को बताया कि छत पर बैठकर ट्रेन की यात्रा ख़तरनाक ही साबित होती है. उनका कहना है कि वर्ष 2008 में ट्रेन की छत पर बैठकर यात्रा करते हुए 53 लोगों की मौत हुई थी जबकि वर्ष 2011 में 11 लोग मारे गए.

इनमें से ज़्यादातर की मौत ट्रेन के ऊपर लगे बिजली के तारों से लगे करंट की वजह से हुई थी.

बीबीसी की जकार्ता संवाददाता देवी सावित्री का कहना है कि ट्रेन की छत पर यात्रा करने वाले लोगों के सुबह और शाम को देखा जा सकता है.

उनका कहना है कि जकार्ता में हर दिन काम करने के लिए बाहर से क़रीब चार लाख लोग आते हैं और जो ग़रीब होते हैं वही टिकट ख़रीदने से बचने के लिए अक्सर ट्रेन की छत पर यात्रा करते हैं.

संवाददाता का कहना है कि इसके अलावा कई टिकटधारी यात्रियों को भी छत पर बैठकर यात्रा करनी पड़ती है क्योंकि ट्रेनों में इतनी भीड़ होती है कि लोग भीतर ही नहीं जा सकते.

बोगोर से हर दिन काम के लिए जकार्ता आने वाले 27 वर्षीय मूल्यांतो का कहना है, "मैंने जब पहली बार इस योजना के बारे में सुना तो मैं बेहद डर गया था. सुनकर लगता है कि ये ख़तरनाक होगा, लेकिन ये भी ज़्यादा दिन टिक नहीं सकता."

विश्लेषकों का कहना है कि इंडोनेशिया सरकार तब तक इस समस्या को हल नहीं कर सकती जब तक ट्रेनों की संख्या पर्याप्त नहीं होगी और उन्हें समय पर चलाया जाएगा.

इंडोनेशिया में पुर्तगालियों ने ट्रेन की पटरियाँ बिछाईं थीं लेकिन 60 साल पहले उनके चले जाने के बाद से उनकी देखरेख ठीक ढंग से नहीं होती.

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