इतिहास के पन्नों में जनवरी 21

आज ही के दिन साल 1981 में ईरान में साल भर से ज़्यादा समय से बंधक रहे 52 अमरीकी नागरिक छूट कर जर्मनी पहुंचे. ये अमरीकी नागरिक करीब 14 महीने बाद घर वापसी कर रहे थे. इसी दिन साल 1950 में बड़े ब्रितानी लेखक जॉर्ज ऑरवेल की मृत्यु हुई थी.

1981 : तेहरान से अमरीकी बंधकों की वापसी

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Image caption ईरान में लोग अमरीका से उसके ईरान के अपदस्थ शाह के समर्थन को लेकर नाराज़ थे.

इन 52 लोगों में अमरीकी कूटनयिक और तेहरान में अमरीकी दूतावास के कर्मचारी थे. नवम्बर 1979 में ईरानी युवा छात्रों के एक दल ने जबरन अमरीकी दूतवास में घुस कर वहां मौजूद सभी अमरीकियों को बंधक बना लिया था.

इन छात्रों में मन में अमरीका के पार्टी इस बात पर गुस्सा था की उसने ईरान के शाह का सदा समर्थन किया था.

ईरान के शाह ने जनवरी 1979 में मुल्क छोड़ दिया था. शाह अक्टूबर के महीने में अरीका कैसर के इलाज के लिए पहुंचे थे. इन छात्रों की मांग थी की शाह ईरान वापस आयें और उनके ऊपर जिन अपराधों के आरोप लगे थे उन अपराधों से जुड़े मुकदमों का सामना करें.

इन छात्रों को ईरान की सरकार का समर्थन तो हासिल था ही साथ ही उन्हें ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह खुमैनी का वरदहस्त भी प्राप्त था.

ईरान द्वारा अपने लोगों को बंधक बनाए जाने के विरोध में गुस्साए अमरीका ने ईरान के ऊपर तमाम किस्म के प्रतिबंध लगा दीए.

अमरीकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने अप्रेल 1980 में एक बंधकों को छुड़ाने के लिए सैन्य अभियान को अनुमति दी लेकिन यह अभियान भी असफल रहा.

जिमी कार्टर के चुनाव में हटने बाद रोनाल्ड रीगन ने उनकी जगह ली और ईरान से नए सिरे से बातचीत शुरू हुई. रीगन ने ईरान की संपत्तियों पर लगे प्रतिबंध उठा लिए और बदले में ईरान अमरीकी बंधकों को छोड़ने के लिए राजी हो गया.

1950 : चर्चित लेखक जॉर्ज ऑरवेल की मौत

Image caption जॉर्ज ऑरवेल की किताबें दुनिया में आज भी मशहूर हैं. खास तौर पर उनकी एनिमल फार्म और 1984 .

तपेदिक से तीन साल की लम्बी लडाई के बाद जॉर्ज ऑरवेल मृत्यु हो गयी. उनके अंत तक उनके स्वास्थ्य को लेकर समाचार सकारात्मक थे और और जिस दिन उनकी मृत्यु हुई उस दिन सुबह उनकी उनके मित्रों से बढ़िया बातचीत हुई.

जॉर्ज ऑरवेल की किताबें दुनिया में आज भी मशहूर हैं. खास तौर पर उनकी एनिमल फार्म और 1984.

उनकी अंतिम पुस्तक जो प्रकाशित हुई उसका नाम था 1984. यह किताब ऑरवेल ने बीबीसी वर्ल्ड सर्विस की नौकरी छोड़ने के बाद लिखना शुरू की थी. ऑरवेल बीबीसी में भारत के लिए समाचार कार्यक्रम का निर्माण करते थे.

ऑरवेल ने दुसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रितानी सरकार के समाचारों को सेंसर करने के रुख से तंग आ कर अपनी नौकरी छोड़ दी थी.

जॉर्ज ऑरवेल का जन्म के समय नाम ऑर्थर ब्लेयर था और उनके परिवार के लोग ऊँचे सरकारी ओहदों पर भारत में काम करते थे.

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