अफ़गानिस्तान में शरण की गुहार

Image caption आमिर हम्ज़ा कई वर्ष पूर्व अपना देश ताजीकिस्तान छोड़ कर अफ़गानिस्तान आ गए थे.

मध्य-पूर्व के देशों के सौ से अधिक नागरिक अफ़गानिस्तान में शरण लेने की कोशिश कर रहे हैं. ये तब है जब भारी संख्या में अफ़गान नागरिक ही अपना देश छोड़ अन्य देशों में शरण ले रहे हैं.

क़रीब 100 से ज़्यादा लोगों ने अफ़गानिस्तान में राजनीतिक शरण की गुहार लगाई है. इनमें से कुछ ने सीधे अफ़गान सरकार को संपर्क किया है तो कुछ शरणार्थी 'संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थियों के लिए उच्चायोग' (यूएनएचसीआर) के ज़रिए कोशिश कर रहे हैं.

यूएनएचसीआर के प्रवक्ता नादिर फ़रहाद ने बीबीसी को बताया कि कुछ लोगों को शरण दे दी गई है, कुछ की दरख़्वास्त ख़ारिज कर दी गई है और कई मामलों पर अब भी विचार किया जा रहा है.

अफ़गानिस्तान में ये स्थिति इसलिए आश्चर्यचकित करती है क्योंकि 30 लाख अफ़गानी नागरिक ही 75 देशों में शरणार्थियों के तौर पर रह रहे हैं.

यूएनएचसीआर के वर्ष 2011 के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक दुनिया के हर 10 में से तीन शरणार्थी अफ़गानिस्तान से आते हैं.

हिंसा और अस्थिरता के बीच उम्मीद

अफ़गानिस्तान में हर वर्ष सैंकड़ों नागरिक आत्मघाती बम धमाकों, चरमपंथी हमलों, अफ़गानी सेना या नेटो के हमलों में मारे जाते हैं.

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Image caption 26 जनवरी को दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान के लश्कर गाह शहर में एक आत्मघाती कार बम हमले में तीन लोग मारे गए और दर्जनों घायल हुए थे.

इसके बावजूद कुछ लोगों के लिए ये हालात उनके अपने देश से बेहतर हैं.

ताजिकिस्तान के नागरिक आमिर हम्ज़ा कई वर्ष पूर्व अफ़गानिस्तान आए थे और अब वहां की नागरिकता पाने के लिए कोशिश कर रहे हैं.

1990 के दशक में ताजिकिस्तान में गृह युद्ध के चलते तत्कालीन सत्ता के कई राजनीतिक प्रतिद्वंदी अफ़गानिस्तान में शरण लेने आ गए.

इस दौर के गुज़रने के बाद इनमें से ज़्यादातर वापस लौट गए लेकिन कुछ यहीं रह गए.

लेकिन अफ़गानिस्तान में रह रहे शरणार्थियों का अनुभव अच्छा ही रहा हो, ऐसा नहीं है.

पहले 1992-1996 के दौरान गृह युद्ध और फिर 1996-2001 में तालिबान का बढ़ता नियंत्रण. फिर कुछ वर्षों की शांति के बाद वर्ष 2011 में एक बार फिर तालिबान के संगठित होने से अस्थिरता का माहौल बढ़ा है.

लेकिन हम्ज़ा अब यहीं रहना चाहते हैं. उन्होंने बीबीसी को बताया कि इतने वर्षों में आखिरकार उन्हें ताजीकिस्तान की नागरिकता छोड़नी पड़ी.

फ़िलहाल हम्ज़ा जैसे शरणार्थियों के अधिकारों के लिए अफ़गानिस्तान में कोई क़ानून नहीं है लेकिन वो फिर भी सरकार से मदद की उम्मीद में हैं.

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