तेल समृद्ध नाइजीरिया में बढ़ रही ग़रीबी

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Image caption विश्लेषक मानते हैं कि नाइजीरिया में अमीरों और ग़रीबों के बीच बढ़ती खाई की वजह भ्रष्टाचार है.

ताज़ा आंकड़े दिखाते हैं कि नाइजीरिया में ग़रीबी बढ़ गई है और अफ़्रीका की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में मज़बूत आर्थिक विकास के बावजूद लगभग दस करोड़ लोग प्रतिदिन एक डॉलर से भी कम की आमदनी पर जीवन बिता रहे हैं.

राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो का कहना है कि वर्ष 2010 में देश में केवल भोजन, रहने की जगह और कपड़े की बुनियादी ज़रूरतें ही पूरी कर सकने वाले लोगों की दर बढ़कर लगभग 61 प्रतिशत हो गई जबकि छह साल पहले तक ये 55 प्रतिशत से कम थी.

नाइजीरिया की राजधानी लागोस से बीबीसी संवाददाता मार्क लोबेल के मुताबिक वहां पिछले साल पूर्ण ग़रीबी में रह रही आधी से ज़्यादा आबादी में छह फ़ीसदी से ज़्यादा आबादी और जुड़ गई. विश्लेषकों का मानना है कि ये हालात और भी बिगड़ेंगे.

राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो के अनुसार बाकी देश की तुलना में उत्तर में ग़रीबी सबसे ज़्यादा है और सोकोटो राज्य में सबसे ज्यादा लगभग 90 प्रतिशत ग़रीबी दर है. इस तेल समृद्ध राज्य में प्रतिदिन एक डॉलर से कम की आमदनी पर जीवन बिताने के ग़रीबी के मापदंड के अलावा भी लोगों से पूछा गया कि क्या वे ख़ुद को ग़रीब मानते हैं. इस सवाल के जवाब में 94 प्रतिशत लोगों ने ख़ुद को ग़रीब कहा जबकि छह साल पहले 75 प्रतिशत लोग ही ख़ुद को ग़रीब मानते थे.

बढ़ती खाई

बीबीसी अफ़्रीका संपादक रिचर्ड हैमिलटन कहते हैं कि ब्यूरो ने माना कि नाइजीरिया में बड़ा विरोधाभास है. तेल उत्पादन की वजह से वहां की अर्थव्यवस्था मज़बूत होती जा रही है लेकिन आबादी और ज़्यादा ग़रीब. इसका जवाब है भ्रष्टाचार.

नाइजीरिया अफ़्रीका का सबसे बड़ा तेल उत्पादक और दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है.

कई दशकों से नाइजीरिया का राजनीतिक वर्ग देश के तेल निर्यात की आमदनी से आधारभूत ढांचा या नौकरियों के अवसर बढ़ाने की जगह अपनी जेबें भरने में लगा रहा है.

विश्लेषक कहते हैं कि ज़्यादातर नाइजीरियाई लोग अपनी ग़रीबी के बारे में जानते हैं. लेकिन इस बार नई बात ये है कि एक सरकारी संस्था ने इस सच्चाई को छुपाने या नकारने की जगह पहली बार उसे उजागर किया है.

विश्लेषकों का ये भी कहना है कि नाइजीरियाई अर्थव्यवस्था का विकास तो जारी रहेगा लेकिन जिस तरह से अमीरों और ग़रीबों के बीच की खाई बढ़ रही है, वहां ग़रीबी और भी बदतर होती जाएगी.

इसलिए इसमें कोई हैरानी नहीं है कि देश के उत्तरी क्षेत्रों में, जहां सबसे ज़्यादा ग़रीबी है, वहां बोको हरम जैसे चरमपंथी गुटों की लोकप्रियता जारी है.

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