विश्वनाथ,मलईया और चुनावी गपशप

विश्वनाथ मंदिर
Image caption बनारस में विश्वनाथ मंदिर के इर्द गिर्द का इलाका शहर की चेतना का भी केंद्र है

वाराणसी शहर के किसी भी कोने में निकल जाइये, बातचीत के हर मुद्दे में कहीं न कहीं चुनावी बात जरूर आ जाती है. चुनाव प्रचार थम चुका है और एक अजीब से शांति दिख रही है सोमवार शाम से.

सुबह सुबह मैं काशी विशावानाथ मंदिर की तरफ निकला. शहर में ट्रैफिक इतना ज़्यादा रहता है कि यह बताना अनिवार्य है कि यहाँ पहुँचने के बाद से मेरी रिपोर्टिंग रिक्शे पर ही हो रही है. रिक्शे वाले से बात करते हुए मंदिर पहुँचने ही वाला था कि एकाएक वो बोल बैठा, क्या आप भी चुनाव में काम करने वाले प्रभारी है? जवाब देने से पहले ही वो खुद ही समझ गया और बोला, "वैसे प्रभारी होते तो हमारे रिक्शे पर कहे बैठे होते."

बात में दम था. बहराल मंदिर की गली से पहले से ही एक लंबी कतार लग चुकी थी, और सबसे दिलचस्प बात यह थी कि ज़्यादातर लोग एक दूसरे को जानते थे.

मेरे आगे वाले सज्जन बोले कल वोट देने जाओगे? मैंने कहा मैं तो पत्रकार हूँ, बाहर से आया हूँ, आप जाएँगे क्या? बोले, "इस बार तो वोट देने जाऊँगा. और सही व्यक्ति को ही वोट दूंगा."

वैसे सुबह के श्रद्धालुओं में तमाम पुलिसकर्मी और बाहर से आए सुरक्षा बलों के जवान भी थे जो इस चुनावी ड्यूटी का पूरा फायदा उठा लेना चाहते हैं!

मलईया और कचौड़ी

Image caption बनारस जितना अपने धार्मिक स्थानों के जाना जाता उतना ही अपने खाने के लिए भी मशहूर है

वाराणसी के आठ विधान सभा छेत्रों में करीब डेड सौ उम्मीदवार मैदान में हैं. शहर की बात करें तो यहाँ सुबह बहुत जल्दी होती है. लेकिन सुबह से रात होने तो एक चीज़ निरंतर जारी रहती है वो है शहर की मशहूर कचौड़ी की दुकानें और मलईया के ठीहे. इन्ही अड्डों अपर बैठ कर आम बनारसी एक-आधा अखब़ार के साथ सियासी चटर-पटर में लगे रहते हैं.

इनमे से ज्यादातर ऊँगली पर गिना सकते है कि अभी तक कौन बड़ा नेता आया है वाराणसी में चुनाव प्रचार के लिए. सुबह का मुद्दा था भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी का चंदौली दौरा.

एक मसखरे ने तो यहाँ तक कहा, "गडकरी जी तो बनारसिये लगते हैं".

शाम होते ही लोगबाग मलईया के कुल्हड़ लिए नजर आते हैं एक दुकानदार ने मुझसे कहा कि बनारस कि मलईया लखनऊ की माखन-मलाई से सस्ती भी और ज़्यादा स्वादिष्ट भी.

मंगलवार सुबह संकटमोचन मंदिर के पास एक कचौड़ी की दुकान में बेडवियाँ छानते हुए एक हलवाई ने मुझे बताया कि कल सबको कुछ घंटे की छुट्टी मिलेगी मतदान के लिए.

मैंने पूछा दिन भर कि क्यों नहीं? जवाब मिला, "फिर कचौड़ी कौन छानेगा. चुनाव हों या न हों यह काम नहीं रुकता इस शहर में".

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