दिल्ली में पहले भी हुए हैं राजनयिकों पर हमले

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Image caption भारत के गृह मंत्री ने कहा है कि सोमवार को हुआ हमला चरमपंथी था.

सोमवार को इसराइल के राजनयिक पर हुआ हमला दिल्ली में हुई इस तरह की पहली घटना नहीं है. भारत की राजधानी में इस तरह की वारदातों का लंबा इतिहास रहा है.

कुछ तीन दशक पहले, साल 1982 के मध्य में, जब भारत में एशियाड खेलों की तैयारी ज़ोरों पर थी; कार में सवार बंदूकधारी ने कुवैत के राजनयिक पर निशाना साधा जिसमें उनकी मौत हो गई.

कुवैत के दिल्ली स्थित दूतावास में प्रथम सचिव के पद पर काम कर रहे, मुस्तफ़ा एम अल-मरज़ुक, अपने दक्षिण दिल्ली स्थित निवास के गेट पर खड़ी कार में सवार हो रहे थे तभी चार गोलियों ने उनके शरीर को भेद दिया.

निशाना काफ़ी पास से लगाया गया था और कुवैत के दूतावास के प्रवक्ता के मुताबिक़ मुस्तफ़ा एम अल-मरज़ुक की मौत अस्पताल पहुंचने से पहले ही हो गई थी.

ख़ून ही ख़ून

उस समय दिल्ली से छपने वाले अंग्रेज़ी अख़बार 'द पेट्रिएट' के संवाददाता पंकज वोहरा ने एक लेख में कहा कि जब वो घटनास्थल पर पहुंचे तो अल-मरज़ुक की काली रंग की मर्सिडीज़ कार के आस-पास हर तरफ़ ख़ून ही ख़ून फैला था.

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने संबंधित जांच एजेंसियों को मामले की तह तक पहुंचने का आदेश जारी किया था.

संदेह व्यक्त किया गया था कि हत्या में फ़लस्तीन की किसी चरमपंथी संगठन का हाथ हो सकता है और इस संबंध में दो छात्रों की गिरफ़्तारी भी हुई थी लेकिन मामला बहुत आगे तक नहीं जा सका.

लेकिन अमरीका से छपने वाले अख़बार न्यूयार्क टाइम्स ने लिखा था कि कुवैत के दुतावास ने हमले और हत्या में किसी भी तरह के राजनीतिक उद्देश्य की बात से इंकार किया है. उनके मुताबिक़ ये आपसी रंजिश का मामला था.

लापता

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Image caption हमले में एक इसराइली राजनयिक घायल हो गईं जिनका इलाज दिल्ली के एक अस्पताल में जारी है.

अभी मुस्तफ़ा एम अल-मरज़ुक की हत्या के मामले की छानबीन किसी नतीजे पहुंची भी नहीं थी कि तीन साल बाद ही, यानी 1985 में, मोटरसाइकिल पर सवार दो लोगों ने सोवियत संघ के राजनयिक की गोली मारकर हत्या कर दी.

दिल्ली के शांति पथ पर मौजूद सोवियत दूतावास के पास किए गए इस हमले में वी ख़ितज़ीचेनको की पत्नी और ड्राइवर घायल हो गए थे.

पुलिस के प्रवक्ता ठाकुर जगदीश सिंह का कहना था कि 48-वर्षीय ख़ितज़ीचेनको और उनकी पत्नी बाज़ार से वापस आ रहे थे कि ऑटोमेटिक पिस्तौल लिए दो मोटर साइकिल सवारों ने उनकी कार में एक के बाद एक छह गोलियां दाग़ दीं.

वी ख़ितज़ीचेनको के पास इंजीनियरिंग की डिग्री थी और वो दूतावास के आर्थिक विभाग में कार्यरत थे.

वी ख़ितज़ीचेनको की हत्या के ठीक पांच दिनों पहले एक सोवियत राजनयिक दिल्ली से रहस्मय ढंग से अचानक लापता हो गए थे.

जासूसी नेटवर्क

पुलिस ने कहा था कि आईगौर गेज़्हा पार्क में जॉगिंग के लिए गए थे जिसके बाद उनका कोई पता ठिकाना नहीं मिल पाया.

अमरीका से छपने वाले समाचारपत्र 'द लॉस एंजेलेस टाइम्स' ने पुलिस के हवाले से कहा था कि दोनों मामले जुड़े हो सकते हैं.

हालांकि सोवियत संघ दूतावास के प्रवक्ता का कहना था कि उन्हें नहीं मालूम कि ये हत्या किन कारणों से की गई.

हमलावरों के बारे में कुछ अधिक पता नहीं था लेकिन पुलिस का कहना था कि वो या तो 'गोरे' या 'गेहुंए' रंग के थे.

इस सिलसिले में दिल्ली पुलिस ने अफग़ानिस्तान के निर्वासित संगठनों से जुड़े काफ़ी लोगों से पूछताछ भी की थी.

सोवियत राजनयिक के लापता होने और क़त्ल की वारदातों से लगभग दो माह पहले एक जासूसी नेटवर्क का भंडाफोड़ हुआ था जिसमें कुछ सरकारी अधिकारी और अन्य लोग विदेशी दूतावासों को सरकारी दस्तावेज़ सप्लाई कर रहे थे.

इस सिलसिले में पुलिस ने 18 लोगों को गिरफ़्तार भी किया था.

'द लॉस एंजेलेस टाइम्स' ने लिखा था कि फ्रांस के अधिकारी को इसके बाद पेरिस वापस बुला लिया गया था.

अख़बार ने अपुष्ट ख़बरों के हवाले से कहा था कि सोवियत संघ, पूर्वी जर्मनी और पौलेंड के राजनयिक भी जासूसी के काम में लगे थे.

अपहरण

हाल के दिनों में जो मामला सबसे अधिक चर्चा में रहा वो था रोमानिया के कार्यवाहक राजदूत लिविया राडू का दिन-दहाड़े अपहरण.

पुलिस का कहना था कि संदिग्ध सिख पृथकतावादियों ने लिविया राडू को तब अगवा कर लिया जब वो अपने घर से दूतावास जाने के लिए निकले ही थे. उन चार लोगों में से एक या दो के हाथों में एके47 राइफ़ल भी थी.

बाद में समाचार एजेंसी पीटीआई में कुलवंत सिंह गुमती नाम के एक शख़्स ने फ़ोन कर दावा किया था कि राजदूत का अपहरण उनके संगठन - लिबरेशन टाइगर्स फोर्स ऑफ़ ख़ालिस्तान ने किया है.

पुलिस का कहना था कि ये अपहरण दो सिख चरमपंथियों की बुख़ारेस्ट में हुई गिरफ़्तारी की जवाबी कार्रवाई है.

इन दोनों लोगों को रोमानिया की राजधानी में भारतीय दूत जिलियो फ्रांसिस रिबेरो पर हमला करने के लिए गिरफ़्तार किया गया था जिसमें भारतीय राजनयिक घायल हो गए थे.

जिलियो फ्रांसिस रिबेरो पहले पंजाब पुलिस प्रमुख थे और उनके समय में सिख चरमपंथियों के ख़िलाफ़ बड़ी कार्रवाइयां हुई थीं.

बाद में ऐसी ख़बरें आई कि रोमानिया के राजनयिक की रिहाई सिख चरमपंथी गुट और उनकी सरकार के बीच हुए एक 'समझौते' के बाद संभव हो पाई.

हालांकि इसकी कोई पुष्टि नहीं हो पाई.

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