'सड़क हादसों से एक लाख करोड़ रूपए का नुकसान'

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Image caption विशेषज्ञ मानते हैं कि पूरी दुनिया के 20 फीसदी सड़क हादसे भारत में ही होते है.

अंतरराष्ट्रीय सड़क महासंघ के अनुसार भारत में सड़क दुर्घटनाओं से सरकार को हर साल एक लाख करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है.

महासंघ ने आरोप लगाया है कि सड़क हादसों की समस्या से निजात पाने के लिए भारत में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है.

समाचार एजेंसी आईएएनएस के मुताबिक संस्था के अध्यक्ष केके कपिला ने कहा, ''दुख की बात है कि ये आंकड़े खुद सरकारी दस्तावेज़ों में मौजूद हैं इसके बावजूद भी सरकार का रुख़ इसके प्रति उदासीन है.''

अंतरराष्ट्रीय सड़क महासंघ (आईआरएफ) एक गैरलाभकारी संस्था है जो सड़क व्यवस्था संबंधी मामलों की देखरेख करता है.

'सरकार का रवैया उदासीन'

योजना आयोग की ओर से साल 2001-2003 में कराए गए एक शोध में पता चला था कि वर्ष 1999-2000 में हुई सड़क दुर्घटनाओं में 55 हज़ार करोड़ रूपए का नुकसान हुआ था. आईआरएफ के आंकड़ों की माने तो ये आंकड़ा पिछले 10 सालों में लगभग दोगुना हो गया है.

केके कपिला का कहना है कि सड़क हादसे रोकने के लिए नशे में वाहन नहीं चलाने के नियमों का सख्त़ी से पालन होना चाहिए.

उन्होंने कहा, ''शराब पीकर गाड़ी चलाने वालों के खिलाफ नए कानून काफी अच्छे है, लेकिन हमें इसे लागू भी करना चाहिए.''

साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि सड़कों पर दूसरे राहगीरों के खिलाफ आक्रोशपूर्ण रवैया रखना अच्छी बात नहीं है.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के मुताबिक भारत में अकेले साल 2010 में हुए सड़क हादसों में एक लाख 30 हज़ार लोगों की मौत हो गई थी.

सड़क सुरक्षा पर हाल ही में हुए एक सम्मेलन के दौरान दिल्ली के संयु्क्त पुलिस आयुक्त (यातायात) सत्येंद्र गर्ग ने माना था कि साल 1988 के मोटर गाड़ी कानून के तहत जुर्माने के प्रावधान काफी अप्रभावशाली है.

'अराईव सेफ़' नाम की एक गैरसरकारी संस्था का भी कहना है कि यातायात नियमों की अनदेखी पर मामूली जुर्माना लगाना उसे बढ़ावा देने जैसा है.

आइएनएस के अनुसार इसी गैरसरकारी संस्था से सदस्य हरमन सिंह सिद्धू ने कहा, "संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2011-2012 को 'सड़क सुरक्षा के लिए कदम उठाने का साल' घोषित किया था इसके बावजूद भारत में इसपर कोई ध्यान नहीं दिया गया. ये इस मुद्दे पर हमारी गंभीरता को दर्शाता है."

हरमन सिंह सिद्धू का कहना है कि पूरी दुनिया में होने वाले सड़क हादसों के मामलों का भारत 10 फीसदी हिस्सेदार है. ये हाल तब है जब दुनियाभर के कुल गाड़ियों का सिर्फ एक फीसदी हिस्सा भारत में है.

सिद्धू के अनुसार वियतनाम, कंबोडिया और युगांडा जैसे देशों ने भी वैश्विक हेल्मेट टीका अभियान को अपनाया है लेकिन भारत की राजनीतिक इच्छाशक्ति के कारण भारत अब तक इससे दूर है.

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