आईआईटी में राहुल-अखिलेश, 'लोकतंत्र रहित' दलों पर चर्चा

आईटीटी छात्र
Image caption आईआईटी कानपुर के छात्र मणिराव कीरो,रवि, सर्वेन्द्र, अनूप

भारत के प्रतिष्ठित आईआईटी कॉलेजों में से एक कानपुर आईआईटी का कैंपस बहुत बड़ा और ख़ूबसूरत है.

यहाँ से गुज़रते उस युवा पीढ़ी को नज़दीक से निहारने का मौक़ा मिला, जो प्रतिभावान हैं, आधुनिक हैं, सब चीज़ें जानने की कोशिश करते हैं, सोशल नेटवर्किंग के दौर का प्रतिनिधित्व करते हैं लेकिन अभी भी राजनीति पर बात करने से कतराते हैं.

कई छात्रों से बात करने की कोशिश की, लेकिन टका सा जवाब मिला- नो पॉलिटिक्स प्लीज. ख़ैर कुछ देर बाद ही सही, चार-पाँच छात्रों का एक गुट हमसे बात करने को राज़ी हुआ.

'केवल मुद्दों पर नज़र'

लेकिन बातचीत में राजनीति को लेकर उनकी उलझन सामने आ गई. समय नहीं है. पढ़ाई का दबाव होता है....इत्यादि, इत्यादि. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि वे देश-दुनिया से बेख़बर हैं.

अनूप कवि मंडल एम (टेक) फ़ाइनल के छात्र हैं. इसलिए उनकी व्यस्तता कुछ ज़्यादा है. कहते हैं, "व्यस्तता के बावजूद कुछ समय निकल ही जाता है. अख़बार पढ़ लेते हैं. इंटरनेट पर देख लेते हैं. क्या चल रहा है, कौन सी पार्टी क्या प्रचार कर रही है, किसका क्या एजेंडा है."

युवा नेताओं की बात आई तो सर्वेंद्र ने अखिलेश को राहुल से ऊपर रखा. सर्वेंद्र कहते हैं कि राहुल को अभी ज़मीनी सच्चाई का आभास नहीं है.

सर्वेंद कहते हैं, "अभी मुझे अखिलेश में कुछ भविष्य दिखता है. राहुल को यूपी की राजनीति की सच्चाई नहीं पता. एक युवा नेता के तौर पर अखिलेश स्थापित हो रहे हैं."

एक और छात्र भुवन तो उन पार्टियों से नाराज़ हैं, जो लोकतंत्र की बात तो करती हैं, लेकिन उनकी पार्टी में ही लोकतंत्र नहीं है.

वे कहते हैं, "कांग्रेस और सपा को देखिए, राहुल गांधी और अखिलेश अपनी-अपनी पार्टियों में सर्वेसर्वा हैं. जो निचले स्तर का कार्यकर्ता है, उसके ऊपर जाने की कम उम्मीद रहती है."

दरअसल भुवन ये बताना चाह रहे थे कि राजनीति में उन लोगों के लिए विकास के अवसर नहीं हैं, जो निचले स्तर पर काम करते हैं. उनकी ये दुविधा कई युवा की दुविधा है, जो राजनीति में प्रगति के कम अवसर को देखते हुए उसमें पड़ना ही नहीं चाहते

इन छात्रों में से एक मणिराव कीरो राजनीति को लेकर बिल्कुल उदासीन दिखे. उन्होंने ये ज़रूर कहा कि अख़बार और टीवी के ज़रिए समाचार ले लेते हैं.

जब मैंने इन छात्रों से ये पूछा कि क्या किसी न किसी राजनीतिक पार्टी की रैली में शामिल हुए हैं, जो सिर्फ़ एक छात्र का जवाब मिला - "हाँ, जी, अटल बिहारी वाजपेयी को सुनने गए थे."

सर्वेंद्र यादव ने तो ये भी मांग कर दी कि ऐसे छात्रों को भी प्रॉक्सी वोटिंग का अधिकार मिलना चाहिए, जो पढ़ाई के कारण अपने-अपने शहरों से दूर हैं.

क्या यूपी में आईआईटी से निकले छात्रों के लिए अवसर हैं, इसके जवाब में अनूप कहते हैं, "ऐसी बात नहीं है कि यूपी में अवसर नहीं है. धीरे-धीरे इंडस्ट्री यहाँ पनप रही है."

लोकतंत्र रहित लोकतांत्रिक दल

सर्वेंद्र नोएडा और ग़ाज़ियाबाद का उदाहरण देते हैं. कहते हैं, "अब कानपुर वो पुराना कानपुर नहीं, जिसे मैनचेस्टर ऑफ़ ईस्ट कहा जाता था. यहाँ उद्योग का काफ़ी नुकसान हुआ है और इसके लिए मैं राजनेताओं को ज़िम्मेदार मानता हूँ."

आईआईटी से निकलने के बाद अवसर के बारे में सबकी एक राय थी कि अवसर बढ़े हैं, लेकिन ये छात्र ये भी मानते हैं कि आर्थिक मंदी के कारण बाहर जाकर नौकरी करने का मौक़ा कम मिल रहा है और स्कॉलरशिप मिलने में परेशानी हो रही है.

आख़िर में अनूप कवि मंडल कहते हैं- "उत्तर प्रदेश की अगर बात करें, तो अभी काफ़ी लंबा सफ़र तय करना पड़ेगा, उन्नति और प्रगति के लिए."

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