माया पर आडवाणी की ख़ामोशी के मायने

आडवाणी, मेरठ में
Image caption भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ देश भर की यात्रा करने वाले आडवाणी ने मायावती के बारे में चुप्पी साध ली.

मैं आगरा से मेरठ यह तय करके चला था कि यहाँ भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी की चुनावी सभा देखूंगा.

शाम क़रीब सात बजे पहुँचा और पहुँचते ही दफ़्तर से फोन आ गया कि आडवाणी जी की सभा से मुझे फ़ोन पर लाइव न्यूज़ देनी है.

मैंने होटल के मैनेजर से लेकर कई कर्मचारियों तक से पूछा कि आज मेरठ में आडवाणी जी की सभा कहाँ है? किसी को नही मालूम था.

बाहर निकलकर सड़क पर एक दो और लोगों से पूछा उन्हें भी नही मालूम था कि आज आडवाणी जी मेरठ आ रहें हैं. वक़्त-वक़्त की बात है.

वापस कमरे में आकर इंटरनेट पर गूगल सर्च किया तो पता चला कि आडवाणी जी की सभा जिमख़ाना मैदान में है.

रास्ते में सड़क के किनारे कांग्रेस की एक नुक्कड़ सभा चल रही थी.

पार करके आगे बढ़ा तो कुछ लोग हाथों में भारतीय जनता पार्टी का झंडा लिए 'चप्पा चप्पा भाजपा' का नारे लगाते हुए जुलूस की शक्ल में जा रहे थे.

शहर के बीच में छोटा सा मैदान है. बीच में पर्दा लगाकर आधे मैदान में पार्किंग बनी थी. बाकी मैदान में कुर्सियां और भाजपा के झंडे सजे थे.

बड़ा सा सुन्दर मंच, जिस पर इस चुनाव का भाजपा का सबसे प्रचलित नारा, “न उगाही, न गुंडई, न भ्रष्टाचार. हम देंगे साफ़ सुथरी सरकार.”

जोश दिलाने के लिए बीच-बीच में मंच से नारे लग रहें थे. सत्रह अठारह साल का एक लड़का ढोल और दूसरा शंख बजाकर लोगों का जोश बढ़ाने की कोशिश कर रहा था.

क़रीब साढ़े आठ बजे आडवाणी जी आए. स्थानीय प्रत्याशियों ने चंद मिनटों में स्वागत किया और आडवाणी जी पहुंच गए माइक पर.

आडवाणी जी इस समय देश के सबसे बुजुर्ग और अनुभवी नेताओं में से एक हैं. इसलिए स्वाभाविक है कि अपने भाषण में उन्होंने देश की आजादी,

भारत विभाजन, कराची से भारत आगमन, सरदार पटेल का नेतृत्व, जनसंघ की स्थापना, अटल बिहारी वाजपेयी और भैरों सिंह शेखावत के साथ काम करने की याद दिलाई.

फिर बेनज़ीर भुट्टो के साथ भोजन पर चर्चा के बहाने भारत के चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को याद करते हुए वह उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव के मुद्दे पर आए.

उन्होंने 1952 से लेकर अब तक सभी चुनावों में अपनी सक्रियता की याद करते हुए प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की इसलिए भर्त्सना की कि आज चुनाव आयोग के अधिकारों में कटौती की बात हो रही है.

आडवाणी ने कहा, ''सरकार के मंत्री चुनाव आयोग और आचार संहिता का उल्लंघन कर रहें हैं. एक मंत्री कांग्रेस को बहुमत न मिलने पर राष्ट्रपति शासन की धमकी दे रहें हैं.''

फिर इमरजेंसी और उसके बाद हुए चुनाव की याद दिलाते हुए आडवाणी अपने समर्थकों से कांग्रेस को हराकर सबक सिखाने की बात करते हैं. “उत्तर प्रदेश में सबक़ सिखाने का अवसर है.” वह कहते हैं.

Image caption आडवाणी की जनसभा में काफ़ी कम लोग आए थे और हर आदमी इसको अलग-अलग तरीक़े से बयान कर रहा है.

वाजपेयी जी की छः साल की सरकार को भ्रष्टाचार से मुक्त और आदर्श सरकार बताते हुए वह कांग्रेस सरकार के घोटालों की याद दिलाते हैं.

मतदाताओं को वोट ज़रुर डालने की याद दिलाते हुए आडवाणी कांग्रेस के परिवारवाद और भ्रष्टाचार पर प्रहार करते हैं , “स्वराज आया पर सुराज नही आया.”

अंत में वह कांग्रेस के साथ-साथ उत्तर प्रदेश में सपा- बसपा सरकारों की याद दिलाते हुए तीनों को हराने की अपील के साथ अपना भाषण समाप्त कर देते हैं और लोगों से नारे लगवाते हैं. 'भारत माता की जय. वंदे मातरम.'

'कई मुद्दों पर ख़ामोशी'

मगर लगा कि जैसे लोग उन्हें और सुनना चाहते थे. क्योंकि अभी तक उन्होंने अपने और भारतीय जनता पार्टी के चिर परिचित मुद्दे छुए ही नही थे. राम मंदिर आंदोलन के हीरो मेरठ में न राम मंदिर पर बोले , न समान नागरिक संहिता पर.

पश्चिम उत्तर प्रदेश में भूमि अधिग्रहण एक बड़ा मुद्दा है. उस पर भी नही बोले. गन्ना किसानों पर भी नही.

और तो और वह उत्तर प्रदेश में मायावती सरकार के पांच साल के कामकाज पर कुछ नही बोले.

और इसलिए आडवाणी का भाषण समाप्त होने पर चर्चा यह नही हुई कि वह क्या बोले, बल्कि इस पर कि भीड़ इतनी कम क्यों की थी और वह मायावती पर चुप क्यों रहें.

भीड़ कम होने के बारे में एक भाजपा समर्थक ने अचानक ठण्ड बढ़ना कारण बताया , जबकि एक पत्रकार का कहना था कि टिकट वितरण को लेकर मेरठ भाजपा में काफ़ी उठापटक और अंतर्विरोध है.

और प्रदेश में चुनाव में माया राज पर ख़ामोशी क्यों?

सदरी पर कमल का बिल्ला लगाए भाजपा कार्यकर्ता आशोक तिवारी बोले, “कुशवाहा कांड की वजह से शायद कुछ नही कहा हो. क्योंकि भ्रष्टाचार हमारे पास बहुत बड़ा मुद्दा है. कुशवाहा प्रकरण की वजह से हम लोगों की जबान बंद है. आम मतदाता इस बात को समझता है.”

फिर उनके साथ खड़े एक व्यक्ति ने कहा, “हो सकता है कहीं गठबंधन की बात चल रही हो. मायावती से गठबंधन वाला क़िस्सा है, कही वह बात न छिपी हो. जैसे कांग्रेस और सपा की बात चल रही है.”

अशोक तिवारी कहते हैं, ''जहाँ तक उत्तर प्रदेश सरकार की बात है भ्रष्टाचार तो हुआ है और जनता यह बात सुनना चाहती है.”

हवा किधर बह रही है?

मेरे इस सवाल पर इन भाजपा समर्थकों का कहना था कि यहाँ किसी की नही बह रही. लेकिन मेरठ नगर की तीनों सीट भाजपा जीतेगी.

भाजपा समर्थकों के आत्मविश्वास की एक वजह यहा है कि मेरठ की राजनीति में चुनाव के समय साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण हो ही जाता है. और भाजपा के लिए मेरठ में यही आशा की किरण है.

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