'बीबीसी पर हम भरोसा कर सकते हैं'

बीबीसी
Image caption पिछले 80 सालों से बीबीसी वर्ल्ड सर्विस पूरी दुनिया के लोगों को सच्ची और सटीक ख़बरें दे रहा है

बीबीसी वर्ल्ड सर्विस की शुरुआत आज ही के दिन यानी 29 फ़रवरी को अस्सी साल पहले 1932 में हुई थी. आज जब पूरी दुनिया में एफएम, डिजिटल रेडियो और इंटरनेट की धूम है, तब ऐसे में शॉर्टवेव रेडियो धीरे-धीरे ख़त्म हो रहा है. लेकिन आज भी ऐसे लाखों लोग हैं जिनके लिए शॉर्टवेव रेडियो किसी जीवन-रेखा से कम नहीं है.

शॉर्टवेव सुनने वाले अपने रेडियो सेट के ज़रिए ऐसी ध्वनि तरंगों को पकड़ने की कोशिश करते हैं जो अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं को लांघती हुई हज़ारों किलोमीटर की यात्रा कर अपने श्रोताओं तक पहुंचती हैं. इस क्रम में इन तरंगों को कभी-कभी पृथ्वी से हज़ारों किलोमीटर उपर आयनमंडल से छूटने वाले उपद्रवी गैस को भी पार करना होता है.

ये तरंगे काफी अस्थिर स्वभाव की होती हैं जिन्हें कई तरह की बाधाओं का सामना करना पड़ता है. ये बाधा बिजली की तरंगों से लेकर वातावरण में होने वाली उठापटक भी हो सकती हैं.

इन सभी बाधाओं के बीच भी शॉर्टवेव पिछले 80 सालों से अपने श्रोताओं तक लगातार ख़बरें पहुंचाने का काम सफलतापूर्व कर रहा है.

ऐसे ही कुछ श्रोताओं के अनुभव आपके सामने हैं.

अनीता

Image caption नक्सल प्रभावित इलाकों में रेडियो ही जानकारी देने का इकलौता साधन है

अनीता अपनी दो सहयोगियों के साथ बैठकर बीबीसी का हिंदी प्रसारण सुन रही है.

ये तीनों ही नक्सली हैं, जिन्हें माओवादी भी कहा जाता है.

जिन दिनों ये तस्वीर खींची गई, वे उड़ीसा के कंधमाल और गंजाम जिले में किसी स्थान पर एक ऊँची पहाड़ी पर टेंट में बैठी हुई हैं. ये तीनों ही लड़कियाँ उस दस्ते का हिस्सा हैं जो उड़ीसा में नक्सलियों के सचिव सव्यसाची पांडा की सुरक्षा के लिए तैनात की गई हैं.

नक्सली सरकार के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष कर रहे हैं. पुलिस और अर्धसैनिक बल लगातार उनकी तलाश में लगे रहते हैं. वे एक जगह ठहर कर नहीं रहते. कभी घने जंगलों में तो कभी पहाड़ों पर. एक दिन यहाँ तो एक दिन वहाँ.

अनीता का असली नाम अनीता नहीं है. कुछ और है, लेकिन नक्सली दल में वे इसी नाम से जानी जाती हैं.

अनीता और उनका दल सुबह और शाम बीबीसी वर्ल्ड सर्विस की तीन भाषाओं के प्रसारण सुनते हैं. हिंदी, उर्दू और बांग्ला. वे कहती हैं, "हमें अखबार तो इन जंगलों और पहाड़ों पर मिल नहीं सकता इसलिए दुनिया से जुड़ने के लिए रेडियो की सहारा है."

लेकिन बीबीसी ही क्यों, इस सवाल पर थोड़े अचरज से देखती हैं, और कहती हैं, "सरकार का रेडियो तो वही झूठ बोलता है, जो सरकार बुलवाना चाहती है. बीबीसी पर हम भरोसा कर सकते हैं. वह सरकार पर एकतरफा भरोसा नहीं करता, हमारी बात भी लोगों तक पहुँचाता है."

उनके दल में तीन लोगों के पास ट्रांजिस्टर सेट है. उनका कहना है कि कई बार सिग्नल नहीं मिलता तो उन्हें पेड़ पर तक चढ़ना पड़ता है. कभी इधर-उधर चलकर जाना पड़ता है, लेकिन उनके पास बाकी दुनिया से जुड़ने का और कोई रास्ता नहीं.

इन लड़कियों को बहुत से संवाददाताओं के नाम मालूम हैं और वे पिछले दिनों खबरों का जिक्र भी करती हैं.

ऐसा नहीं है कि उड़ीसा के नक्सली ही बीबीसी के रेडियो समाचार सुनते हैं. वे बस्तर और आंध्र के जंगलों में भी दुनिया से इसी माध्यम से जुड़ते हैं.

रॉबर्ट मुलवानेव

रॉबर्ट मुलवानेव ग्लेशियर विशेषज्ञ हैं जो अंटार्टिका में रह कर मौसम के बदलावों पर काम करते हैं. रॉबर्ट को अपने काम के सिलसिले में कभी-कभार 80 दिनों तक टेंट में रहना पड़ता है.

वो कहते हैं कि पहले वो अख़बार से वर्ल्ड सर्विस के कार्यक्रमों की पूरे हफ्ते की सूची अपनी डायरी में नोट कर लिया करते थे और उसके अनुसार ही रोज़ शाम का कार्यक्रम नियमित तौर पर सुना करते थे.

वे कहते हैं, ''हम दो लोग एक टेंट में रहते थे, जहां अक्सर ऐसा होता था मैं स्टोव पर खाना पकाते हुए, कानों में हेडफोन लगाकर बीबीसी की खबरों को सुना करता था. मुझे ख़ासतौर पर रात के समय अपने स्लीपिंग बैग पर अधलेटे हुए बीबीसी को सुनना बेहद पसंद था.''

खराब मौसम के दौरान हमें रात के समय अपने टेंट में रहना पड़ता था तब हम बीबीसी नहीं सुन पाते थे, ऐसे मौसम में हम दिन के वक्त समाचार सुनने की कोशिश करते थे लेकिन दिन के समय प्रसारण साफ़ नहीं होता था. शायद सूरज ढलने के बाद आयनमंडल का वातावरण शॉर्टवेव के लिए ज्यादा उपयुक्त होता है.

जब सिग्नल साफ नहीं मिलता था तब इसमें कई तरह की बाधाएं होती थीं, जो हल्की नियमित आवाज़ों से लेकर कठफोड़वा के लकड़ी काटने जैसी तेज़ आवाज़ें भी हुआ करती थीं.

मैं इन सबसे बचने के लिए मैं अपनी सोनी के रेडियो सेट पर तरंगों को अपनाने के लिए अतिरिक्त लंबाई वाले एरियल एंटीना का इस्तेमाल करता था.

यू संदावबाथा

यू संदावबाथा, एक बौद्ध भिक्षु हैं जो बर्मा की राजधानी रंगून में रहते हैं. संदावबाथा का कहना है कि बीबीसी रेडियो उनके जीवन का एक अभिन्न हिस्सा है और पिछले 20 सालों में ऐसा कभी नहीं हुआ है जब उन्होंने बीबीसी का एक भी प्रसारण नहीं सुना हो.

संदावबाथा कहते हैं कि उन्होंने वर्ष 1988 से बीबीसी रेडियो को सुनना शुरु किया था तब बर्मा में एक पार्टी के शासन के खिलाफ़ लोग एकजुट हो रहे थे और 1988 से 2003 तक उन्होंने बीबीसी सेवा से जुड़े सभी नए लोगों के पहले प्रसारण को भी रिकॉर्ड किया है.

Image caption द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान युद्द के मैदान के नज़दीक से रिपोर्टिंग करते हुए एक बीबीसी संवाददाता

संदावबाथा का कहना है, ''बीबीसी का नियमित श्रोता होने के कारण ही मैं एक जानकार बौद्ध भिक्षु था जो नए भिक्षुओं को शिक्षा दे रहा था. उनका कहना है कि बीबीसी उस दौरान जो खबरें देता था वो बिल्कुल सही हुआ करतीं थी.''

संदावबाथा के मुताबिक, ''अपनी सटीक रिपोर्टिंग के कारण बीबीसी रेडियों को बर्मा के सैन्य अधिकारी नापसंद करते थे इसलिए हमें अपने घरों में छुपकर प्रसारण सुनना होता था, जहां ये साफ सुनाई नहीं पड़ता था लेकिन मैं अपने मठ में रहता था जहां ये घरों की तुलना में ज्य़ादा साफ सुनाई पड़ता था, फिरं कुछ समय के लिए भारत चला गया और वहां भी बीबीसी सेवा सुनता रहा.''

वो आगे कहते हैं, ''जब मैं वापस बर्मा लौटा तब वहां शहर से सटे एक मठ में रहने लगा. उस समय राजधानी रंगून में देश के सैन्यशासन के खिलाफ़ लोग सक्रीय होने लगे थे, हर जगह अविश्वास का माहौल था, ऐसे हालात में मठ के अन्य भिक्षुओं का मेरा बीबीसी सुनना पसंद नहीं था.''

''इन लोगों का लगता था कि मैं विदेशी प्रसारकों के लिए जासूसी करता हूं और इन्होंने मेरा नाम 'रिपोर्टर भिक्षु' रख दिया था.''

''इस सब के बाद मैं ज्य़ादा सावधानी बरतने लगा लेकिन बीबीसी सुनना नहीं छोड़ा. मैं अपना ट्रांजिस्टर रेडियो लेकर मठ के दूसरे कोने में चला जाया करता था जहां दूसरे भिक्षु नहीं होते थे और वहां रेडियो प्रसारण सुनता था.''

''मेरे दिन की शुरुआत रेडियो के सुबह के कार्यक्रम के साथ शुरु होती थी और रात की प्रार्थणा शाम के प्रसारण के बाद होती थी, मैं ये ध्यान रखता था कि प्रसारण शुरु होने से कुछ मिनट पहले ही रेडियो चालू कर लूं ताकि कुछ छूट ना जाए. कुछ लोगों को एक बौद्ध भिक्षु का बीबीसी सुनना नागवार गुज़रता है लेकिन मैं मानता हूं कि इससे मेरी ज़िंदगी ज़्यादा समृद्ध हुई है.''

हसन नूर

हसन नूर सोमालिया में मोगादिशु से 90 किलोमीटर उत्तर की दिशा में बसे जाउहर कस्बे में रहते हैं. इस इलाके में फिलहाल अलकायदा के जुड़े संगठन अल-शबाब का नियंत्रण है.

हसन नूर बीबीसी वर्ल्ड सर्विस की अंग्रेज़ी सेवा और बीबीसी सोमाली सर्विस की सुबह और शाम के प्रसारण के नियमित श्रोता हैं.

वो कहते हैं कि सुबह सिग्नल पकड़ने में काफी दिक्कत होती है लेकिन शाम के वक्त ये काफी साफ होता है. साफ सिग्नल के लिए वो अपने बड़े से रेडियो सेट के लिए अतिरिक्त एरियल एंटेना का इस्तेमाल करते हैं.

नूर कहते हैं, ''मैं 36 साल का हूं और पिछले 15 सालों से लगातार बीबीसी रेडियो सुन रहा हूं. मुझे बीबीसी सुनना इसलिए भी पसंद है क्योंकि ये ब्रेकिंग न्यूज़ सुनाता है, ये अफ्रीका और पूरी दुनिया में हो रहे सभी राजनैतिक उथल-पुथल को बहुत ही बढ़िया से बयां करता है.''

''बीबीसी दुनिया के कोने-कोने में बसे समाज को सूचित रखता है.''

मैरी रॉवन्सले

गैरी रॉवन्सले लीड्स यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संवाद के प्रोफेसर हैं. उन्होंने बीबीसे से जुड़े अपने अनुभवों के बारे में हमें ये बताया.

''मैंने 1984 से बीबीसी सुनना शुरु किया था, मेरे पिता एक ट्रक ड्राइवर थे और अपने काम के सिलसिले में सुबह तीन से चार बजे तक उठ जाया करते थे, स्कूल की छुट्टियों के दौरान मैं भी उनके साथ जाया करता था.''

''मुझे अभी भी 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या की खबर सुबह चार बजे एफएम रेडियो पर बीबीसी न्यूज़ में सुनना याद है. अपने पिता के साथ एक सुनसान सड़क पर ये खबर सुनने का अनुभव कुछ ऐसा था मानो पूरे ब्रिटेन में इंदिरा गांधी की मौत की खबर जानने वाला मैं पहला व्यक्ति हूं.1986 में मेरे अभिभावकों ने मुझे वेगा सेलीना 215 रूसी शॉर्टवेव रेडियो लाकर दिया था और तब मैंने अपने खाली वक्त का इस्तेमाल पूरी दुनिया में प्रसारित रेडियो प्रसारणों को सुनकर किया करता था, अंधेरी रातों में 'दिस इज़ लंदन' सुनना बेहद रोमांचक हुआ करता था.

''हालांकि शॉर्टवेव का सिग्नल काफी खराब होता था इसके बावजूद सभी व्यवधानों को दरकिनार कर इसे सुनना काफी अच्छा लगता था. मैं रेडियो मॉस्को सुना करता था. मेरे 18वें जन्मदिन पर मेरे परिजनों ने मुझे एक डिजिटल रेडियो लाकर दिया था, जिसमें फ्रीक्वेन्सी अंकित थे, ये पहले से आसान था लेकिन रोमांच के अंत की शुरुआत भी थी.''

रॉवनस्ले के अनुसार, ''उसके बाद मैंने शॉर्टवेव पत्रिका के लिए कई लेख भी लिखे. जब मैं 'तुलानात्मक अंतरराष्ट्रीय राजनीति' की पढ़ाई करने के लिए यूनिवर्सिटी गया तब रेडियो मेरा पर्सनल ट्यूटर था. पूरी दुनिया की खबर रखने और घर से जुड़े रहने के लिए मैं बीबीसी वर्ल्ड सर्विस सुना करता था.''

वे आगे कहते हैं, ''मुझे ये सोच अच्छी लगती थी कि शॉर्टवेव रेडियो कई बड़े अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का कारण बनता था, कि शॉर्टवेव के ज़रिए दुनिया के तमाम देश 'शांति' की बात करते थे और शॉर्टवेव कूटनीति का हिस्सा था.सिर्फ इस एहसास को महसूस कर पाना कि लंदन में एक इंसान माइक्रोफोन पर कुछ रह रहा है और क्वालालंपोर या केन्टुकी में बैठा दूसरा व्यक्ति उसे सुन पा रहा है, ये काफी रोमांटिक अनुभव है.''

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