इतिहास के पन्नों में 11 मार्च

इतिहास के पन्नों में 11 मार्च का दिन कई बातों के लिए याद किया जाएगा. इसी दिन जापान के तोहोकू के नज़दीक एक भूकंप से समुद्र में सुनामी उठी जिसकी वजह से हजारों लोग मारे गए और फुकुशिमा परमाणु संयंत्र हादसा हुआ. इसी दिन मिखाईल गोर्बाचेव ने सोवियत संघ के सर्वोच्च नेता के रूप में शपथ ली थी.

2011 : तोहोकू के नज़दीक भूकंप से जापान में सुनामी

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Image caption इस भूकंप की वजह से समुद्र में सुनामी उठ खड़ी हुई जिसकी लहरें 133 फीट तक ऊँची थीं.

आज ही के दिन साल 2011 में जापान में प्रशांत तट पर तोहोकू के पास समुद्र में रिक्टर पैमाने पर 9 का भूकंप आया था. यह जापान के इतिहास में दर्ज अब तक का सबसे शक्तिशाली भूकंप था.

इस भूकंप की वजह से समुद्र में सुनामी उठ खड़ी हुई जिसकी लहरें 133 फीट तक ऊँची थीं. इस भूकंप की वजह से पास ही में स्थित फुकुशिमा दईची परमाणु ऊर्जा संयंत्र को भीषण नुकसान पहुंचा और विकिरण वातावरण में रिसने लगा.

इस परमाणु हादसे के कारण इस संयंत्र के चारों तरफ 80 किलोमीटर के दायरे में फैले लोगों को वहां से हटा दिया गया. जापान की नेशनल पुलिस एजेंसी के अनुसार भूकंप और सुनामी के चलते 15850 लोग मारे गए थे.

इसके अलावा इस हादसे में हजारों लोग लापता हो गए और पूरे जापान में एक लाख से ज्यादा इमारतों को नुकसान पहुंचा था.

शुरुवाती अनुमानों के मुताबिक इस भूकंप में 14.5 अरब डॉलर से 34.6 अरब डॉलर का नुकसान हुआ था.

1985 : मिखाईल गोर्बाचेव सोवियत संघ के सर्वोच्च नेता बने

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Image caption बदलते हालातों के बीच गोर्बाचेव को 25 दिसंबर 1991 को इस्तीफ़ा देने को मजबूर होना पड़ा.

साल 1985 में इसी दिन मिखाईल गोर्बाचेव कोंस्तान्तिन चेरेंकों की मौत के बाद सोवियत संघ के सर्वोच्च नेता चुने गए.

जब कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव के रूप में उनका नाम सामने आया तो दुनिया को बड़ा अचरज हुआ क्योंकि इस वक़्त गोर्बाचेव महज़ 54 साल के थे.

परंपरा के विपरीत गोर्बाचेव ने चेरेंकों की मृत्यु की घोषणा के एक दिन बाद अमरीका के साथ परमाणु हथियारों पर पूर्वनिर्धारित बात को निरस्त नहीं किया.

जब गोर्बाचेव ने काम-काज संभाला था तब किसी को अंदाज़ नहीं था कि वो शीत युद्ध के दौरान अमरीका विरोधी महाशक्ति के आखिरी नेता होंगें.

गोर्बाचेव ने रूस और अमरीका के परमाणु हथियारों को कम करने के लिए कई संधियाँ कीं.

उन्होंने अपने देश में कई किस्म के राजनीतिक और आर्थिक सुधारों को लागू करने का प्रयास भी किया लेकिन उनकी वजह से देश में घनघोर आर्थिक और राजनीतिक संकट पैदा हो गए.

सोवियत संघ के भीतर बाल्टिक समूह के देशों में बढ़ते असंतोष के कारण गोर्बाचेव ने सोवियत संघ के देशों को अधिक स्वायत्तता देने का एलान किया.

लेकिन गोर्बाचेव के सभी प्रयासों के बावजूद देश में राजनीतिक संकट बढ़ता गया और अगस्त 1991 में कट्टरपंथी वामपंथियों की तरफ से एक तख्तापलटने का प्रयास भी हुआ.

बदलते हालातों के बीच गोर्बाचेव को 25 दिसंबर 1991 को इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर होना पड़ा.

उसी साल 31 दिसंबर के दिन सोवियत संघ का झंडा आखिरी बार फहराया गया.

गोर्बाचेव अब रासायनिक और आणविक हथियारों के प्रभावों से लड़ने वाली एक संस्था ग्रीन क्रॉस के प्रमुख हैं और रूस में ही रहते हैं.