एक पुरस्कार कूड़ा बीनने वालों के नाम

इमेज कॉपीरइट Getty
Image caption चिंतन की कोशिशों से पिछले 5 सालों में भारत के करीब 20 हज़ार कूड़ा बिनने वालों को मदद मिली है.

भारत में कूड़ा बिनने वालों की मदद करने वाली संस्था चिंतन को अमरीकी विदेश मंत्रालय की ओर से ‘इनोवेशन अवार्ड’ से सम्मानित किया गया है.

पहली बार दिया गया यह पुरस्कार चिंतन को कूड़ा करकट बिनने वाले लोगों को संगठित करने और उनकी मदद के ज़रिए पर्यावर्ण की रक्षा करने के लिए दिया गया है.

चिंतन की निदेशक भारती चतुर्वेदी पुरस्कार लेने के लिए वॉशिंगटन पहुंची.

पुरस्कार लेने के बाद बीबीसी से बात करते हुए भारती चतुर्वेदी ने कहा, “मुझे बहुत खुशी है कि अमरीकी विदेश मंत्री हिलरी क्लिंटन ने कूड़ा बिनने वालों को एक तरह से सम्मानित किया है. क्यूंकि हमारे अपने देशों में तो हमें बहुत लड़ना पड़ता है सिर्फ यह समझाने के लिए कि कूड़ा बीनने वाले लोग भी इंसान हैं औऱ बहुत ज़रूरी काम करते हैं, इनके बिना हमारे शहर साफ़ नहीं रहेंगे. ”

उन्होंने कहा कि मैं उम्मीद करती हूं कि मैं अपने देश में भी कूड़ा बीनने वालों के प्रति ऐसी ही भावनाएं रखने का संदेश लेकर जाऊंगी.

चिंतन समेत यह पुरस्कार उन संस्थाओं को दिया गया है जो कुछ अलग करके समाज में बदलाव लाने और लोगों के उत्थान में मदद करती हैं. इस पुरस्कार के साथ चिंतन को 5 लाख डॉलर की राशि भी मिली है.

कोई इनकी भी ले सुध

वॉशिंग्टन में पुरस्कार वित्रण समारोह में बोलते हुए अमरीकी विदेश मंत्री हिलरी क्लिंटन ने कहा, “भारत के कई शहरों में कूड़े को रिसाइकल करने के लिए कूड़ा बीनने वाले कर्मचारियों की मदद चाहिए होती है. इन लोगों के कारण ही कूड़े में 20 प्रतिशत तक की कटौती भी होती है. लेकिन कूड़े के ढेर में से ऐसी चीज़ें चुनना जिनको रिसाईकल किया जा सकता है, यह खतर्नाक और गंदगी से भरा काम है. इसके अलावा इनके स्वास्थ्य को भी खतरा होता है.”

क्लिंटन ने कहा, “चिंतन कूड़ा बिनने वाले कर्मचारियों को प्रशिक्षण देने और उनको संगठित करने का काम करती है और इसके साथ ही बाल मज़दूरी को भी खत्म करने में मदद करती है. यह संस्था इनको मान्यता दिलाने और इन्हे सुरक्षा और सम्मान दिलाने की हिमायत करती है. ”

अमरीकी विदेश मंत्री ने कहा कि चिंतन की कोशिशों से पिछले 5 सालों में भारत के करीब 20 हज़ार कूड़ा बिनने वालों को मदद मिली है.

करीब 2000 बच्चों को इस काम से निकाल कर पढ़ाई करने में और जीवन के विकास में लगाया गया है.

पुरस्कार लेने के बाद चिंतन की निदेशक भारती चतुर्वेदी ने शुक्रिया अदा किया और कहा कि उनकी संस्था भारत के मध्यम वर्ग की गंदगी उठाकर उसे सामाजिक दौलत में बदलती है.

उनका कहना था कि भारत में कूड़ा बिनने वालों को बुरी नज़र से देशा जाता है और उनके बच्चो को भेदभाव के कारण स्कूलों में प्रवेश मिलने में भी दिक्कतें आती हैं.

भारत में कूड़े को सही ढंग से ठिकाने न लगाने या रीसाइक्लिंग न करने के कारण 3 प्रतिशत तक ग्रीन हाउस गैस निकलती है.

भारती कहती हैं, “कूड़ा सिर्फ़ कूड़ा नहीं वह जीविका का साधन भी है और अगर हम उसे जीविका बनाएंगे तो लोगों को रोज़गार भी मिलेगा और पर्यावरण को भी फ़ायदा होगा.”

कई शहरों में अब सरकारी सफाई संस्थाएं कई निजी कंपनियों को सफ़ाई और कूड़ा उठाने का ठेका दे रही हैं. इससे यह समस्या पैदा हो रही है कि जब बड़ी बड़ी कंपनियां कूड़ा उठाने का काम करने लगी हैं तो वह लोग जो कूड़ा बिनने को जीविका बनाए हैं उनके रोज़गार को भी अब खतरा पैदा हो रहा है.

लेकिन भारती चतुर्वेदी जो दिल्ली विश्वविद्यालय और अमरीका की जान हाप्किंस यूनिवर्सिटी से एमए किए हुए हैं, उन्हे कबाड़ और कबाड़ियों के साथ काम करने की कैसे सूझी.

भारती बताती हैं, “दिल्ली में एमए करने के दौरान ही पढ़ाई के अलावा पूरा एक साल मैंने कूड़ा बीनने वालों के साथ बिताया. यह देखने के लिए की यह लोग कैसे काम करते हैं. मुझे जिज्ञासा थी कि इसमें होता क्या है और मुझे आम लोगों का इन कूड़ा बीनने वालों के प्रति रवैय्या बहुत खराब लगा.”

पिछले 16 साल से भारती इसी तरह कूड़ा बीनने वालों के साथ काम कर रहीं हैं.

और उन्होंने कई बदलाव देखें हैं जैसे अब कबाड़ी संगठित हो रहे हैं और वह शहर को साफ़ रखने में अपना भी योगदान देखते हैं और फक्र महसूस करत हैं.

संबंधित समाचार