भारतीय मूल की अमरीकी महिला जज

अपने पति के साथ बर्नाडेट
Image caption बर्नाडेट डिसूजा चुनाव के ज़रिए जज के पद पर आसीन हुई हैं.

अमरीका के लुईसियाना राज्य में पहली बार एक भारतीय मूल की महिला जज बनी हैं.

जज बनने वाली बर्नाडेट डिसूज़ा भारतीय मूल की अमरीकी हैं जिन्हें न्यू ओरलिएंस शहर के फ़ैमिली कोर्ट के जज के तौर पर निर्विरोध चुना गया.

उन्होंने पहली मार्च को पद की शपथ ले ली है. अमरीका के अधिकतर राज्यों में जजों की नियुक्ति चुनाव के ज़रिए ही होती है.

मूल रूप से भारत के गोवा की रहने वाली बर्नाडेट डिसूज़ा 1978 में ही अमरीका चली गई थीं जहां न्यू ओरलिएंस में उनके पति डॉक्टर टेरेंस डिसूज़ा मेडिकल रेज़िडेंसी कर रहे थे.

फिर वह न्यू ओरलिएंस की ही होकर रह गईं.

उनकी नियुक्ति को राज्य में एक नए दौर की तरह देखा जा रहा है.

बर्नाडेट डिसूज़ा अपनी जीत और जज के पद पर ऐतिहासिक नियुक्ति से बहुत खुश हैं.

वह कहती हैं, "मैं बहुत खुश हूं कि मैं एक भारतीय मूल की अमरीकी के तौर पर राज्य में पहली महिला जज नियुक्त हुई हूं. "

उनका कहना था, "मेरा तो सपना साकार हो गया है. मैं चाहती थी कि इस शहर में पारिवारिक मामलों के लिए अलग अदालतें हों जिससे पारिवारिक मामलों पर अधिक ध्यान देकर केसों और विवादों को जल्दी निपटाया जा सके. अब जज की हैसियत से इस शहर में मैं उस तरह की अदालत की शुरूआत करूंगी."

सन 1978 में अमरीका आने के बाद उन्होंने यहीं से कानून की डिग्री हासिल की और एक वकील की हैसियत से दो दशक से ज़्यादा समय से विभिन्न कंपनियों के साथ काम करती रहीं. इसके साथ वह तुलेन विश्वविद्यालय में लॉ की प्रोफ़ेसर भी हैं.

दक्षिणी गोवा के क्यूपम शहर में 1954 में जन्मी बर्नाडेट डिसूज़ा को भारत में गुज़ारे अपने बचपन और जवानी के दिन भी याद आते हैं.

उन्होंने गोवा में कैथलिक स्कूल में पढ़ाई की औऱ बोर्डिंग स्कूल में ही रहीं.

गोवा और मुंबई

गोवा में अपने बचपन को याद करके वह ठंडी आहें भरकर कहती हैं, "हम लोग स्कूल से गर्मियों की छुट्टियों में अपने दादा दादी के पास जाते थे और बड़ा मज़ा आता था. हमारे घर पर पार्टियां होती थीं और परिवार वाले और दोस्तों से घर भरा रहता था. खूब धमाचौकड़ी रहती थी." उनके पिता टोनी गोम्स मुंबई में नौकरी करते थे, इसलिए बर्नाडेट डिसूज़ा मुंबई में ही पली बढ़ी थीं. उन्होंने मुंबई विश्विद्यालय से ही मनेविज्ञान में बीए किया.

Image caption बर्नाडेट के बच्चे हॉलीवुड में काफी सक्रिय हैं.

मुंबई के दिनों को याद करके वह भावुक हो जाती हैं. क्यूंकि उनके पिता ने कई हिंदी फ़िल्मों में संगीतकार की हैसियत से काम किया था.

बर्नाडेट डिसूज़ा बताती हैं कि उनके पिता टोनी गोम्स ने कई फ़िल्मों में बैकग्राउंड म्यूज़िक दिया था. औऱ कई मशहूर संगीत निदेशकों जैसे आरडी बर्मन, एसडी बर्मन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, शंकर-जयकिशन के साथ काम किया था. कहा जाता है कि टोनी गोम्स ने हिंदी फ़िल्मों के संगीत में गिटार की शुरूआत की.

1970 के दशक में उनके पिता टोनी गोम्स उन्हें अक्सर हिंदी फ़िल्मों की कुछ बड़ी हस्तियों के साथ मिलवाने भी ले जाते थे.

बर्नाडेट डिसूज़ा कहती हैं, "मुझे याद है कि मैं हेमा मालिनी से आंखें फिल्म की सिलवर जुबली की पार्टी में मिली थी. मेरे पिताजी अक्सर मुझे फ़िल्मों के सेट्स पर भी ले जाते थे."

वह फ़क्र से बताती हैं कि 1974 में जब उनके पिता का आपरेशन हुआ तो अस्पताल में उनसे मिलने आशा भोसले भी पहुंची थीं

Image caption बर्नाडेट को उनके सामाजिक कार्यों के लिए कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं.

टोनी गोम्स की आखरी फ़िल्म थी शोले - जिसमें उन्होंने गिटार के साथ बैकग्राउंड म्यूज़िक दिया था. लेकिन वह फ़िल्म के रिलीज़ होने से पहले ही गुज़र गए थे.

इसीलिए शोले के संगीत को बर्नाडेट डिसूज़ा अधिक पसंद करती हैं.

शोले का संगीत

वह कहती हैं,"शोले फ़िल्म के संगीत के साथ मेरे पिता की यादें जुड़ी हैं, वह उसके बारे में बहुत बातें किया करते थे. इसलिए मुझे इसका संगीत बहुत पसंद है. मुझे मेरे पिता की याद दिलाता है."

पिछले करीब 35 सालों से अमरीका में रह रही बर्नाडेट डिसूज़ा अब बहुत मुश्किल से हिंदी के कुछ ही शब्द बोल पाती हैं. लेकिन वह हिंदी फ़िल्में अब भी शौक से देखती हैं.

1988 में बर्नाडेट डिसूज़ा ने अमरीका की नागरिक्ता ले ली. और अब उनके परिवार में दो बेटियां और एक बेटा समेत कई पोते पोतियां भी शामिल हैं.

उनकी ही तरह उनकी एक बेटी तो पेशे से वकील है लेकिन उनके परिवार में फ़िल्मों में करियर बनाने का सिलसिला अभी टूटा नहीं है. उनके बेटे लॉयड डिसूज़ा अब हॉलीवुड में पटकथा लेखक हैं औऱ एक बेटी क्रिसटीन भी हॉलीवुड की फ़िल्मों के वितरण की एक कंपनी से जुड़ी हैं.

बर्नाडेट डिसूज़ा ने अमरीका में 1993 से वकालत शुरू की और न्यू आर्लींस शहर के गरीब लोगों की मदद करने वाली संस्थाओं में भी वकील की तरह काम किया. न्यू ओरलिएंस में कटरीना तूफ़ान से पीड़ित गरीब लोगों के लिए भी उन्होंने मुफ़्त कानूनी सेवा मुहैय्या करवाई थी. वकील की हैसियत से समाजसेवा के लिए उन्हे राज्य में कई पुरस्कार भी मिले.

वहीं से उन्हें गरीबों को न्याय दिलाने की धुन सवार हुई औऱ उन्होंने जज के लिए चुनाव लड़ने का फ़ैसला कर लिया.

बर्नाडेट डिसूज़ा बताती हैं कि अब भारतीय मूल के बहुत से युवा वकालत की पढ़ाई कर रहे हैं और वह इस देश में प्रगति के मौकों का फ़ायदा उठाना चाहते हैं.

पिछली बार वह सन 2008 में बीस साल के बाद भारत गई थीं जब उनकी मां का देहांत हुआ था.

बर्नाडेट डिसूज़ा कहती हैं कि जज के पद का नया काम ज़रा समझ लें फिर इसी साल या अगले साल भारत का दौरा करेंगी

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