लंदन ओलंपिक से डरने के 10 कारण

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Image caption ओलंपिक खेलों के दौरान बनाए जिल लेन बनाया गया है जिसका इस्तेमाल आम लंदनवासी नहीं कर पाएंगे

इस साल के अंत में लंदन में होने वाले ओलंपिक खेलों ने ब्रिटेन में रहने वाले हर शख्स के मन में उत्साह भर दिया है, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके मन में इस आयोजन को लेकर काफी डर पैदा हो गया है.

लंदन ओलंपिक को लेकर हर तरफ सकारात्मक बातें ही सुनने को मिल रही हैं. अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष जल्द ही लंदन पहुंचने वाले हैं ताकि इस आयोजन की तैयारियों का जायज़ा ले सकें.

अभी तक पूरी तैयारी सही रास्ते पर लग रही है. राजनेताओं से लेकर आम आदमी तक सभी इस आयोजन को लेकर काफी उत्सुक और उत्साहित हैं. उनके लिए लंदन ओलंपिक का आयोजन खेलों से जुड़े गर्व का परिचायक है.

लेकिन एक वर्ग ऐसा है जो इस आयोजन को लेकर उत्साहित नहीं है, उनके मन में एक डर बसा हुआ है उन्हें लगता है कि इस आयोजन से हर तरफ बवाल मचेगा, उनका कामकाज प्रभावित होगा और लोगों की परेशानियां बढ़ जाएंगी.

और कुछ लोग तो ऐसे हैं जो लंदन से हज़ारों किलोमीटर दूर रहकर ये सोच नहीं पा रहे हैं आखिर इन खेलों की कीमत उन्हें क्यों चुकानी पड़ रही है.

डर के 10 कारण

1.'ज़िल लेन'

लंदन ओलंपिक 2012 के आयोजक इस आयोजन के दौरान तीस मील की गेम्स लेन बना रहे हैं जिसका इस्तेमाल सिर्फ ओलंपिक फैमिली कर पाएगी. ये लेन लंदन के मुख्य इलाकों से होकर गुज़रेगी जिसमें चार हज़ार बीएमडब्लू गाड़ियां और पंद्रह सौ फरारी कोच ओलंपिक आयोजन में आने वाले वीआईपी मेहमानों, खिलाड़ियों, प्रायोजकों और मीडियाकर्मियों को लेकर आयोजन स्थल तक जाया करेंगी. इस लेन का इस्तेमाल कोई भी बिना अधिकार पत्र के नहीं सकता है और जो ऐसा करेगा उन्हें जुर्माना भरना पड़ेगा.

आलोचकों ने इस लेन को 'ज़िल' लेन का नाम दिया है. दरअसल सोवियत संघ में वरिष्ठ अधिकारी जो ज़िल लिमोज़ीन गाड़ी का इस्तेमाल करते थे उसी संदर्भ में इसे ज़िल लेन का नाम दिया गया है.

2. 'कीमत'

कुछ लोगों का मानना है कि ये आयोजन जनता के पैसों की सरासर बर्बादी है. इस आयोजन पर कुल 9.2 अरब पाउंड का खर्च आ रहा है. लंदन ईवनिंग स्टैंडर्ड अखबार में स्तंभकार सैम लीथ कहते हैं कि अगर इस आयोजन से हमारी अर्थव्यवस्था को कोई फायदा होता तो हम समझ पाते लेकिन ऐसा नहीं है. ब्रिटिश चेंबर ऑफ कॉमर्स ने भविष्यवाणी करते हुए कहा है कि ओलंपिक के कारण ना सिर्फ ब्रिटेन की उत्पादन क्षमता में कमी आ सकती है बल्कि विकास की दर में भी कुछ समय के लिए कमी आ सकती है.

3. 'दूर दराज़ के इलाकों की अनदेखी'

लंदन ओलंपिक के आयोजन के लिए लंदन पार्क को दोबारा बनाने में जितनी मेहनत और पैसा खर्च किया जा रहा है चाहे वो हाई स्पीड रेल हो, क्रॉस रेल हो या ओलंपिक पार्क ये सब मुख्य लंदन शहर और दक्षिण पूर्व के इलाकों में स्थित है. इससे सिर्फ शहरी इलाकों में विकास हो रहा है और देश के उत्तरी प्रांतों के गरीब और ग्रामीण इलाकों की एक बार फिर से अनदेखी हो रही है.

4. 'पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर असर'

इस आयोजन का असर सार्वजनिक यातायात प्रणाली पर भी पड़ेगा. लंदन में जो लोग पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल काफी कम करते हैं उनके लिए भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट में सफर करना काफी तकलीफदेह हो सकता है. सड़कों पर गाड़ियों की भीड़ बढ़ जाएगी और गर्मी का मौसम होने के कारण सड़क पर यात्रियों की दिक्कतें काफी बढ़ जाएंगी.

5. 'सफेद हाथी'

लंदन ओलंपिक के आयोजन स्थल के आस-पास कई बड़े अपार्टमेंट बन कर तैयार हो रहे हैं. इससे पहले भी इस तरह के आयोजनों के बाद ऐसे कई अपार्टमेंट, एंफीथियेटर और खेल से जुड़ी बड़ी-बड़ी इमारतें और खेल से जुड़े मैदान छोड़े गए हैं, जिनका इस तरह के आयोजन के बाद कोई काम नहीं रह गया है. इससे पहले एथेंस, बार्सिलोना और सिडनी में भी इस तरह की इस्तेमाल ना करने योग्य खाली जगह पाई गई.

6. 'ब्लैंकेट कवरेज'

जानकारों का मानना है कि जितने दिनों तक ओलंपिक खेलों का आयोजन होगा उतने दिनों हर मीडिया में सिर्फ ओलंपिक खेल ही छाए रहेंगे. यहां तक कि चार साल में एक बार होने वाले फुटबॉल विश्वकप के दौरान भी दर्शकों और आम आदमी को सिर्फ फुटबॉल की खबरें ही देखने को मिलती हैं. हालांकि बीबीसी इस आयोजन का आधिकारिक तौर पर प्रसारण करेगी लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि जितना कवरेज ओलंपिक खेलों के मिलेगा उससे कहीं ज्यादा वहां हो रही अन्य गतिविधियों को भी मिलेगा.

7. 'जनसाधारण के खेलों को नुकसान'

ये ज़रुरी नहीं है कि ओलंपिक के आयोजन से देश में खेलों और खिलाड़ियों को प्रोत्साहन मिलेगा. ऐसे आयोजनों से ना सिर्फ बड़े स्टेडियम और वेलोड्रोम पर पैसा लगाया जाता है बल्कि उच्च वर्ग के एथलीटों को बढ़ावा दिया जाता है. बीजिंग ओलंपिक खेलों में ऑस्ट्रेलिया ने हर स्वर्ण पदक पर साढ़े चार करोड़ ऑस्ट्रेलियाई डॉलर ख़र्च किए थे. लंदन ओलंपिक के आयोजन का अधिकार हासिल करने गए दल ने कहा था कि प्रतियोगिता के दौरान ज्यादा से ज्यादा मेडल जीतकर वे खेलों में लोगों की भागीदारी को बढ़ा पाएंगे. आलोचकों का कहना है कि इन खेलों के आयोजन में जितना जितना पैसा खर्च किया जा रहा है उससे स्थानीय खेलों को नुकसान हो रहा है.

8.'प्राकृतिक सुंदरता'

कुछ प्रकृति प्रेमियों का कहना है कि जिस जगह पर ओलंपिक साइट का निर्माण किया जा रहा है वो लंबे समय तक यहां की शहरी आबादी के लिए एक प्राकृतिक सैरगाह था. इस खुली जगह पर चारों तरफ प्राकृतिक सुंदरता देखी जा सकती थी. लंदन में रहने वाले शहरी निवासी जब शहर के पूर्वोत्तर में बसे इस इलाके में आते थे तो ऐसा लगता था मानो वे किसी घने जंगल में आ गए हैं जहां वे वन्य जीवन से रूबरू हो सकते थे लेकिन अब ऐसा नहीं है. अब इन शहरी परिवारों के पास ऐसी आज़ादी नहीं बची है.

9. 'नियंत्रण करने की कोशिश'

कुछ लोगों को लगता है कि लंदन ओलंपिक के आयोजक इस बात को लेकर ज्यादा सचेत हैं कि वे इस आयोजन से जुड़ी चीज़ों पर कितना ज्यादा नियंत्रण कर सकें. आलोचकों के मुताबिक आयोजन के दौरान खाने-पीने की कुछ चीज़ों को ही अंदर जाने दिया जाएगा और बाकी पर मनाही होगी. यहां पानी वही मिलेगा जो कोका-कोला बेचेगा और खाना मैकडोनाल्ड्स का. इतना ही नहीं ये पाबंदी कुछ कपड़ों पर भी होगी और सुरक्षा की व्यवस्था इतनी कड़ी होगी कि किसी तरह के राजनैतिक संवाद या विरोध के स्वर तेज़ नहीं हो सकेंगे.

10. 'असली पुनरुद्धार की कमी'

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Image caption ओलंपिक पार्क में पीने का पानी कोका-कोला ब्रैंड और खाने का सामान मैकडोनाल्ड का ही मिलेगा

इस आयोजन के ज़रिए किसी भी तरह से पुनरुद्धार नहीं होने वाला है, ये ज़रुर है कि इससे लंदन को दोबारा विकसित किया जा सकेगा. आयोजकों ने लंदन को एक बेहतरीन अर्थव्यवस्था देने का मौका फिर से गंवा दिया और उसकी जगह एक औद्योगिक कॉरपोरेट की भावना ज्यादा नज़र आती है. ओलंपिक खेलों ने निजी क्षेत्र की तरफ से निवेश को काफी हद तक इन खेलों की तरफ आकर्षित किया है जो ओलंपिक के आयोजन के बगैर मुश्किल होता. लेकिन इससे किसी भी तरह से लंदन में रहने वाले लोगों को नया जीवन नहीं मिलने वाला है.

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