दक्षिण अफ्रीका के स्कूल भी भारत जैसे

 शुक्रवार, 30 मार्च, 2012 को 09:12 IST तक के समाचार
नाइजीरिया के स्कूल

पूरे अफ्रीका में सरकारी स्कूलों की हालत बहुत खराब है.

भारत में सरकारी स्कूलों की खस्ता हालत पर आए दिन ख़बरें आती हैं लेकिन ये हाल सिर्फ़ भारत में हो ऐसा नहीं है.

दक्षिण अफ्रीका में हर वर्ष करीब 5000 बच्चे सरकारी स्कूल छोड़कर निजी स्कूलों में भर्ती हो रहे हैं और ये ज़्यादातर काले हैं.

इस स्थिति के पीछे की वजहें भी भारत जैसी ही हैं.

सरकारी शिक्षा से जुड़ी समस्याएं वहीं हैं जैसे भ्रष्टाचार, अध्यापकों का अक्सर छुट्टी ले लेना, या एक ही साथ दो नौकरियां करना और एक पर ठीक से ध्यान ना देना, अध्यापकों के लिए प्रयाप्त प्रशिक्षण केन्द्रों का ना होना इत्यादि.

बीबीसी संवाददाता कैरन ऐलन के अनुसार दक्षिण अफ्रीका में ऐसे सैंकड़ो स्कूल खुल गए हैं जो निजी हैं लेकिन जहां फीस कम है.

ज्यादातर स्कूलों की फीस सालाना करीब 700 पाउंड यानी लगभग 56 हजार रुपए.

इन स्कूलों की फीस इतनी है कि दक्षिण अफ्रीका का मध्यम वर्ग खास तौर पर काले लोग भी अपने बच्चों को इन स्कूलों में भेज सकते हैं. लेकिन सरकारी स्कूलों को छोड़कर निजी स्कूलों का रुख करने की वजहें और भी हैं.

"मां-बाप निजी स्कूलों का रुख कर रहे हैं क्योंकि वो चाहते हैं कि उनके बच्चों को सुनियोजित तरीके से उच्च स्तर की शिक्षा लगातार मिलती रहे. वो आश्वस्त होना चाहते हैं कि उनके बच्चे को स्कूली शिक्षा के बाद बेहतर भविष्य मिलेगा."

पीटर पोसमान, एक निजी स्कूल के एक अध्यापक

इन्हीं स्कूलों में से एक गेटअहेड स्कूल के एक अध्यापक पीटर पोसमान कहते हैं, ''मां-बाप निजी स्कूलों का रुख कर रहे हैं क्योंकि वो चाहते हैं कि उनके बच्चों को सुनियोजित तरीके से उच्च स्तर की शिक्षा लगातार मिलती रहे. वो आश्वस्त होना चाहते हैं कि उनके बच्चे को स्कूली शिक्षा के बाद बेहतर भविष्य मिलेगा.''

गेटअहेड स्कूल में पढ़ने वाले 17 वर्षीय समानिया ज़ोनडाने के मां-बाप की मृत्यु हो चुकी है. वो अपनी आंटी के साथ रहता है.

आंटी निक्विज़ी ने समानिया की पढ़ाई के खातिर अपना घर बदला. अब उन्हें कम किराया देना पड़ता है और वो उसके निजी स्कूल की फीस भर पाती हैं. निक्विज़ी के लिए ये बहुत ज़रूरी था.

निक्विज़ी कहती हैं, ''सरकारी स्कूलों में अगर अध्यापकों और सरकार के बीच विवाद हो जाए तो वो हड़ताल पर चले जाते हैं. इससे बच्चों की शिक्षा पर असर पड़ता है. और फिर उन स्कूलों में बच्चे सुरक्षित महसूस नहीं करते.''

सरकारी स्कूल

इसी इलाके के एक सरकारी स्कूल के प्राचार्य कुन्ज़ी मारीकानी अपना स्कूल दिखाते हुए मानते हैं कि वहां खास तौर पर शौचालयों की स्थिति से वो शर्मसार हैं. उनके मुताबिक इस स्थिति से बच्चों का हौसला टूटता है और ये अध्यापकों को दूसरी नौकरियां तलाशने पर मजबूर करता है.

कुन्ज़ी मारीकानी कहते हैं, ''पहले हमारे स्कूल में पढ़नेवाले बच्चों के अच्छे नतीजे आते थे. लेकिन सुविधाओं की कमी की वजह से और अहम विषयों के अध्यापकों के नौकरी छोड़ने के कारण अब हमारी हालत बहुत बुरी है.''

"पहले हमारे स्कूल में पढ़नेवाले बच्चों के अच्छे नतीजे आते थे. लेकिन सुविधाओं की कमी की वजह से और अहम विषयों के अध्यापकों के नौकरी छोड़ने के कारण अब हमारी हालत बहुत बुरी है."

कुन्ज़ी मारीकानी, एक सरकारी स्कूल के प्राचार्य

दक्षिण अफ्रीका के शिक्षा मंत्री भी इस बात को मानते हैं कि 80 फीसदी सरकारी स्कूल ठीक से काम नहीं कर रहे और उसी की वजह से निजी स्कूलों की संख्या में 70 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है.

दक्षिण अफ्रीका की एक संस्था 'सेंटर फॉर डेवेलेप्मेंट एन्ड एन्टरप्राइज़' से जुड़ी ऐनबर्न स्टीन मानती हैं कि निजी स्कूलों का सरकारी स्कूलों की जगह लेने के लिए सस्ती फीस पर शिक्षा उपल्ब्ध कराना सहज ही है.

ऐनबर्न स्टीन कहती हैं, ''देखा जाए तो ज़्यादातर सरकारी स्कूलों में सोमवार और शुक्रवार के दिन अध्यापक नहीं आते, कई दो जगह नौकरी करते हैं और जो आते भी हैं वो ज़रूरत से कहीं कम पढ़ाते हैं.''

दक्षिण अफ्रीका में सरकारी शिक्षा की बदहाली को नेल्सन मंडेला के बाद के दौर की सबसे बड़ी कमी के तौर पर देखा जाता है.

देश में ज़्यादातर बच्चे सरकारी स्कूलों में ही पढ़ते हैं. लेकिन अब जब मध्यम वर्ग के लोग अपने बच्चों को निजी स्कूलों की शिक्षा का फायदा दे पा रहें है तो इससे गरीब बच्चों के पिछड़ने का डर बढ़ गया है.

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