सड़कों के नाम में महिलाओं से भेदभाव

सड़कों के नाम
Image caption दुनिया भर में सड़कों के नाम में पुरुषों के नाम पर रखे जाते हैं

आप ऐसी कितनी सड़कें जानते हैं जिनका नाम महिलाओं के नाम पर रखा गया हो?

भारत की राजधानी दिल्ली में कस्तूरबा गांधी या अरूणा आसफ अली के नाम पर कुछ मार्ग मिल जाएंगे लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि इसके मुकाबले पुरुषों के नाम पर सड़कों की संख्या कहीं ज्यादा होगी.

ये हाल सिर्फ भारत का ही नहीं है बल्कि दुनिया भर के तमाम देशों में देखा जा सकता है.

तो क्या ये महिलाओं के साथ भेदभाव का नतीजा है, इतिहास का तकाजा है या फिर दोनों ही कारण मौजूद हैं?

महिलाओं के साथ इस भेदभाव को जानने के लिए रोम शहर में भूगोल की एक अध्यापिका मारिया पिया अर्कोलिनी ने काफी काम किया है.

रोम का भेदभाव

अर्कोलिनी रोम शहर की गाईड लिख रही थी जब उन्होंने ध्यान दिया कि महिलाओं का नाम लगभग गायब है.

अर्कोलिनी और उनकी टीम ने रोम के 16,550 सड़कों को छाना और उनके नाम निकाले. उन्हें पता चला कि 7,575 (47%) सड़कें पुरुषों के नाम पर थी जबकि महिलाओं के नाम पर सिर्फ 580 सड़कें (3.5%) हैं.

अब अर्कोलिनी चाहती हैं कि इस अनुपात में बदलाव किया जाए और इसके लिए उन्होंने फेसबुक पर पेज बनाकर लोगों की राय मांगी है.

उन्होंने कहा, "हम ये नहीं चाहते की सड़कों का नाम बदला जाए. हम चाहते हैं कि रोम की नई सड़कें महिलाओं के नाम पर रखी जाएं."

रोम से प्रभावित होकर दूसरे कुछ शहरों में भी इस तरह का सर्वे कराया गया है.

स्पेन की राजधानी मैड्रिड में 27 प्रतिशत सड़क पुरुषों के नाम पर है और 7 फीदी महिलाओं के नाम पर.

फ्रांस की राजधानी पेरिस में भी ये काम शुरु हो गया है लेकिन आंकड़े अभी नहीं आए हैं.

लंदन फेमिनिस्ट नेटवर्क की जूलिया लॉंग कहती हैं, "मैं चाहूंगी की ऐसा ही प्रोजेक्ट लंदन में भी शुरु किया जाए. सड़कों के नाम से किसी व्यक्ति को जैसे अमर बना दिया जाता है. लेकिन पुरुषों के नाम पर ज्यादा सड़क बनाकर तो यही दिखाया जाता है कि उनका मूल्य महिलाओं से ज्यादा है.

रोम में अर्कोलिनी की कोशिशें रंग ला रही हैं.

रोम शहर के मेयर की पत्नी इसाबेला रौती भी मानती हैं कि महिलाओं के नामों की कमी सदियों के भेदभाव को दर्शाता है जिसे बदलने का वक्त आ गया है.

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