खाड़ी के देशों में शाहखर्ची का दौर

आबु धाबी
Image caption सारी दुनिया आर्थिक संकट से जूझ रही है लेकिन खाड़ी के देशों में सरकारें खूब खर्च कर रही हैं.

अमरीका और यूरोप में ऋण संकट, जापान में सूनामी और अरब जगत में राजनीतिक उठा-पटक की वजह से बीता साल वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए काफ़ी मुश्किल रहा है. इन्हीं कारणों से कच्चे तेल के दाम सौ डॉलर प्रति बैरल से भी बढ़ गए हैं.

हालांकि इसका दुनिया भर में बुरा असर पड़ा है लेकिन अरब की खाड़ी को इसका फ़ायदा ही हुआ है. यहां की सरकारें अपने अवाम को ख़ुश रखने और क्षेत्र में फैले असंतोष को दूर रखने के प्रयास में हैं.

आबू धाबी में खादिम रोल्स रॉयस कारों को अपने अमीर ग्राहकों की पसंद के हिसाब से ढालते हैं. फिर चाहे वो ख़ास पेंट हो या बेशकीमती सीट कवर. खादिम आम आदमी नहीं हैं क्योंकि वे दुनिया में ग्राहकों के हिसाब से तैयार की गई रोल्स रॉयस कारों के सबसे बड़े विभाग के प्रमुख हैं.

ये कारें पचास लाख डॉलर यानि 25 करोड़ रुपए तक की हो सकती हैं. तो यहां के अमीरों की इस शाहख़र्ची का राज़ क्या है?

चेहरे पर मुस्कान

ख़ादिम कहते हैं, “जब तेल के दाम बढ़ते हैं तो हम मुस्कुराते हुए चेहरे देख सकते हैं. लोग ख़ूब खर्च करते हैं क्योंकि वे महसूस करते हैं कि भविष्य में हालात और अच्छे होने वाले हैं.”

खाड़ी के देशों की अर्थव्यवस्था कई देशों से ज़रा हटकर काम करती है. कच्चे तेल के दाम सौ डॉलर से अधिक होने के कारण तेल निर्यातक देश इसका भरपूर लाभ उठा रहे हैं.

बॉस्टन कंसलटिंग ग्रुप के स्वेन ओलाफ़ फ़ात्जे कहते हैं, “तेल इस क्षेत्र में कमाई का मुख्य साधन है. पिछले एक दशक में कच्चे तेल की कीमत 15 डॉलर से सौ डॉलर तक पहुंच गई है जिससे जीडीपी की विकास दर को गति मिली है. इससे धन-दौलत में भारी बढ़ोतरी हुई है और इस व्यवसाय जुड़ी कंपनियों को भी भारी मुनाफ़े का फ़ायदा पहुंचा है. ”

आमतौर पर जब तेल के दाम बढ़ते हैं तो खाड़ी देशों की सरकारें देश के भीतर और विदेशों में अधिक ख़र्च करना शुरू कर देती हैं.

मध्य-पूर्व में एचएसबीसी के मुख्य अर्थशास्त्री साइमन विलियम्स कहते हैं कि इस बार अरब जगत की राजनीतिक अस्थिरता के चलते ये ख़र्चा देश के भीतर अधिक हो रहा है ताकि लोग ख़ुश रहें.

बेशकीमती नौकाएं

साइमन विलियम्स ने बीबीसी को बताया, “इस क्षेत्र में अस्थिरता की पृष्ठभूमि में अगर आप पिछले एक साल पर नज़र डालें तो पाएंगे कि सरकारी खर्चों में बहुत बढ़ोतरी हुई है और वेतनों में भी. और अगर आप इसकी तुलना पश्चिमी देशों से करें तो समझ आयेगा कि यहां कच्चे तेल के ऊंचे दामों का फ़ायदा हुआ है.”

आबू धाबी से कुछ दूरी पर लग्ज़री नौकाएं बनाने वाली कंपनी के मुनाफ़े को देखकर आप इस धन-दौलत का अंदाज़ा लगा सकते हैं.

गल्फ़ क्राफ़्ट नाम की ये कंपनी 1982 में शुरू हुई थी.

यहां कारीगर करीब साढ़े आठ करोड़ की बेशकीमती नौकाएं बनाते हैं. हालांकि छोटी नौकाओं की मांग घटी है लेकिन बड़ी लग्ज़री नौकाओं के लिए इतनी मांग पहले कभी ना थी.

हांलाकि इस कंपनी के अधिकतर ग्राहक खाड़ी के देशों से ही हैं लेकिन गल्फ़ क्राफ़्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी इर्विन बैम्प कहते हैं कि अब एशिया से भी लोग नौकाओं की मांग कर रहे हैं.

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