ओलांड से भी भारत के अच्छे रिश्ते रहेंगे: सिब्बल

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Image caption ओलांड ने सार्कोजी को मात दी और सोशिलिस्ट 17 साल बाद फ्रांस में सत्ता में आए

फ्रांस्वा ओलांड फ्रांस के नए राष्ट्रपति चुने गए हैं. वामपंथी विचारधारा वाले ओलांद के साथ भारत के संबंध कैसे रहेंगे यही जानने के लिए बीबीसी संवाददाता अमरेश द्विवेदी ने बात की फ्रांस में भारत के राजदूत और भारत के पूर्व विदेश सचिव रहे कंवल सिब्बल से.

पढ़िए इस विशेष बातचीत के मुख्य अंश:

सिब्बल साहब, फ्रांस भारत का दोस्त माना जाता है. निकोला सारकोजी के समय में भी, चाहे वो परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग का मामला हो या फिर सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए भारत की दावेदारी का मामला. क्या फ्रांस के नए राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलां[ के आने के बाद उसकी नीति में कोई बदलाव आ सकता है?

नहीं आएगा. लेकिन ये बात सही है कि फ्रांस्वा ओलांड का विदेशी मामलों में कोई अनुभव नहीं है. उनका पूरा अनुभव देश के भीतर की राजनीति में ही रहा, वो हिन्दुस्तान कभी आए भी नहीं और अपने करियर में बाकी देशों में भी कहीं नहीं गए. इसलिए ये प्रश्न उठता है कि इनका भारत के साथ क्या रिश्ता रहेगा?

लेकिन मेरी समझ से अगर कोई तब्दीली आ भी जाए तो बुनियादी रूप से इसमें कोई फर्क नहीं पड़ेगा. वो बुनियाद आर्थिक क्षेत्र में है, रक्षा क्षेत्र में है और आपने जो बातें कहीं वो राजनीतिक बातें भी अहम हैं. हमें फ्रांस से हमेशा मदद मिली. वो यूएन सेक्यूरिटी कॉंसिंल के लिए, परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में मिली. उनके साथ हमने सबसे पहले स्ट्रेटिजिक डायलॉग शुरू किया. इसलिए हमारी बुनियाद काफी मजबूत हो गई है, इसलिए नेता बदल भी जाएं तो उसमें अंतर नहीं आएगा.

सिब्बल साहब, आप राजनयिक रहे हैं फ्रांस में. अगर हम राष्ट्रपति मितरां की वामपंथी सरकार से ओलांड की वामपंथी सरकार की तुलना करें जिसका जिसका कि काम-काज अभी सामने नहीं आया है, लेकिन उन दोनों के बीच काफी समय का अंतर आ गया है. इसलिए आर्थिक परिप्रेक्ष्य की बात करें, वैश्विक परप्रेक्ष्य की बात करें, सामरिक परिप्रेक्ष्य की बात करें तो आपको इसका भविष्य कैसा नजर आ रहा है?

आपको एक और बात को ध्यान में रखनी चाहिए. यह ठीक है कि पिछले दफे मितरां वामपंथी राष्ट्रपति बने थे लेकिन बीच में लायोनेल जॉस्पिन आए थे जो कि सोशलिस्ट प्रधानमंत्री थे. जब शिराक राष्ट्रपति थे तो सरकार सोशलिस्ट थी. हमने देखा कि उस समय भी बहुत अंतर नहीं था. कोई भी सरकार हो, सोशलिस्ट हो या कोई भी सरकार हो, दूसरे मुल्कों से संबध तो रखने ही पड़ते हैं.

अब ग्लोबलाइजेशन के कारण इंटर कनेक्टिविटी तो बढ़ ही गई है. फ्रांस अकेला तो अपनी राजनीति नहीं कर सकता है न. इसलिए उनको भी बाकी देशों का समर्थन चाहिए. चाहे वह हिन्दुस्तान हो, पाकिस्तान हो, चीन हो या फिर रूस हो, अफ्रीका हो या सऊदी अरब हो. बाकी देशों से संबध तो रखने ही पड़ेगें. इसलिए ऐसा तो हो नहीं सकता कि किसी पार्टी के दृष्टिकोण में इतना फर्क पड़ता है कि सोशलिस्ट आ गए तो कहे कि हमको किसी की जरूरत ही नहीं है. उनको भी जरूरत है कि जिस किसी भी देश के साथ उनके साथ संबध रहें हों, उसे आगे बढ़ाया जाए. इसलिए जो कोई भी अकलमंद आदमी सत्ता में आएगा, वह यही सोचेगा.

ये भारत और फ्रांस के संबधों की बात हुई. अगर हम यूरो जोन की आर्थिक संकट की बात करें तो उसमें फ्रांस और जर्मनी की महत्वपूर्ण भूमिका रही. चाहे वह बेलआउट पैकेज का मामला हो या फिर दीर्धकालीन आर्थिक योजना बनाने का मामला. तो अब जो ये नई वामपंथी सरकार सत्ता में आई है, उसकी यूरो जोन संकट पर क्या भूमिका रह सकती है?

देखिए, ये जो तब्दीली हुई है, इसका सबसे ज्यादा असर यूरोप में ही पड़ेगा. यह इसलिए पड़ेगा क्योंकि यूरोप फ्रांस और जर्मनी के बिना चल ही नहीं सकता. यूरोप में बहुत बड़ा संकट आ गया है. एक तो यूरो जोन का संकट है, यूरो का संकट है, करेंसी का संकट है. दूसरी, ये जो बातें हो रही हैं कि यूरोप की जो निर्णय लेने की प्रक्रिया है, उसमें तब्दीली लानी पड़ेगी. फिर यूरो को काफी बढ़ा दिया गया है जिसमें 27 मुल्क हैं.

इसमें परेशानी ये है कि सबकी राय लेना और उसमें सहमति बनाना काफी मुश्किल हो रहा है. इसमें छोटे-छोटे देश हैं, जैसे ग्रीस हैं, पुर्तगाल है. पहले आयरलैंड था, इन सबने बहुत फायदा उठाया यूरोपीयन यूनियन का. लेकिन समस्या भी यहीं से शुरू हुई है, खासकर ग्रीस से. इसलिए जर्मनी और फ्रांस ने आपस में मिलकर इस समस्या को नहीं उठाया तो बहुत मुश्किल आएगी. मुश्किल ये आ गई है कि इनमें से एक देश है जिनकी स्थिति बहुत मजबूत है और वह देश है जर्मनी.

जर्मनी का जो एप्रोच रहा है फिजिकल स्टेबलिटी का, वो चाहता है कि यूरोपीय लेवल पर इससे निपटा जाए. इसे यूरोपीयन स्टेबिलिटी का पैक्ट भी माना गया है. इसमें, सरकोजी ने भी हिस्सा लिया था. कहते हैं कि फ्रांस के नए राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांड की राय यह है कि यह जो सरकारी खर्च में कटौती का मामला है और आय की कमी का मामला है, ये अब नहीं चलेगा क्योंकि इससे बहुत सामाजिक समस्याएं पैदा हो गई हैं. इसलिए हमें पूंजी-निवेश चाहिए, विकास चाहिए, हमें रोजगार चाहिए.

अगर आप पाबंदी लगा देगें कि आपको संतुलित बजट चाहिए तो फिर आप पूंजी निवेश कैसे करेगें, विकास कैसे लाएगें? इसलिए नए राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांड यूरोपीयन स्टेबलिटी पैक्ट में तब्दीली लाना चाहते हैं चाहे जर्मनी माने या ना माने. कितने लंबे समय के बाद इस पर बहस होगी, फिर मीटिंग के भीतर क्या समीकरण बनेगा, उस पर भी काफी कुछ निर्भर करेगा. इसके अलावा बाकी देश इटली, स्पेन भी विकास चाहते हैं और फ्रांस के नए राष्ट्रपति जर्मन मॉडल पर प्रश्न चिन्ह लगा रहे हैं. अब देखते हैं कि इसका यूरोप पर क्या असर पडता है.

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