लंदन पुलिस में नस्लवाद बड़ी समस्या: पूर्व अफसर

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Image caption गुरपाल विर्दी 30 साल तक लंदन पुलिस में काम करने के बाद पिछले दिनों सेवानिवृत्त हो गए.

लंदन पुलिस के पूर्व अफसर गुरपाल विर्दी का कहना है कि मेट्रोपोलिटन पुलिस में नस्लवाद अब भी बड़ी समस्या है और उससे निपटने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए जा रहे हैं.

डिटेक्टिव सार्जेंट रहे भारतीय मूल के गुरपाल पहले ऐसे अधिकारी हैं जिन्होंने 2000 में लंदन पुलिस के खिलाफ भेदभाव से जुड़ा ऐतिहासिक मुकदमा जीता.

तीस साल तक लंदन पुलिस में नौकरी करने वाले गुरपाल हाल में सेवानिवृत्त हो गए और अब वो अनुभवों के बारे में खुल कर बात कर सकते हैं.

वो कहते हैं, “नस्लवादी लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाती. उन्हें अनुशासित बनाने या बर्खास्त करने की बजाय प्रमोशन दिया जाता है. ऊंचे पदों पर जाकर भी वे भेदभाव करना जारी रखते हैं. हम इस समस्या से नहीं निपट रहे हैं.”

'हर कदम पर भेदभाव'

गुरपाल का दावा है कि पुलिस ट्रेनिंग स्कूल में भर्ती होते ही समस्याएं शुरू होने लगती हैं. उनके मुताबिक, “इसकी शुरुआत आपके साथ क्लास में मौजूद साथियों या फिर ट्रेनिंग देने वाले सार्जेंट या इंस्पेक्टर से हो सकती है. अगर आप अल्पसंख्यक समुदाय की महिला हैं तो दोगुनी मुश्किल हो जाती है. आपको महिला और जातीय अल्पसंख्यक, दोनों के नाते भेदभाव झेलना पड़ सकता है.”

गुरपाल कहते हैं कि ट्रेनिंग के बाद नौकरी पर तैनाती के दौरान भी भेदभाव का सिलसिला चलता रहता है.

वो बताते हैं, “उन्हें ऐसी जगह पर तैनात किया जा सकता है, जहां उनके साथ सही बर्ताव नहीं होता है. उन्हें प्रमोशन नहीं दिए जाते हैं और उन्हें टीम का हिस्सा नहीं माना जाता है.”

गुरपाल बताते हैं कि काले और एशियाई लोगों के साथ भेदभाव होना या उनका मनोबल गिराया जाना कोई नई बात नहीं है. वो ब्लैक पुलिस एसोसिएशन, सिख एसोसिएशन, मुस्लिम एसोसिएशन और हिंदू एसोसिएशन जैसे संगठनों से जुड़े रहे हैं और उनसे बहुत से लोगों ने ऐसे मामलों में सलाह मांगी है.

गुरपाल विर्दी का कहना है कि उन्होंने खुद कई तरह की समस्याओं का सामना किया है. वह चार बार मेट्रोपोलिटन पुलिस को रोजगार प्राधिकरण ले गए जहां उन्हें मिले-जुले नतीजे मिले.

लंबा है सफर

उनका कहना है कि वो इसलिए खुल कर अपनी बात कह रहे हैं क्योंकि उन्हें पुलिस और उन समुदायों की फिक्र है जिनके लिए पुलिस काम करती है.

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Image caption गुरपाल का कहना है कि आबादी के हिसाब से अल्पसंख्यकों का पुलिस में प्रतिनिधित्व कम है.

वो बताते हैं, “लंदन के आंकड़ों पर नजर डालिए तो जातीय अल्पसंख्यक समुदाय के अफसरों की संख्या सिर्फ 9 फीसदी के बराबर है जबकि शहर की आबादी में उनकी हिस्सेदारी 14 प्रतिशत है. यह बड़ा अंतर है. इस बारे में पिछले कमिश्नर नाकाम रहे हैं. किसी तो इस पर काम करना होगा.”

मेट्रोपोलिटन पुलिस ने नस्लवाद की समस्या को माना है. कमिश्नर बर्नार्ड होगान-होवे का कहना है कि वो पुलिस बल में नस्लवाद को खत्म करना चाहते हैं.

गुरपाल कहते हैं कि नस्लवाद और नस्लवादियों से निपटने के बारे में अफसरों को बिल्कुल नए सिरे से सोचना होगा.

उनका मानना है, “पीड़ित को परेशान करने की बजाय संदिग्ध को निलंबित किए जाने की जरूरत है. उसे अनुशासित होना पड़ेगा और उस पर नजदीक से नजर रखनी होगी. समस्या ये है कि मेट्रोपोलिटन पुलिस संदिग्धों को कानूनी जुमलों और कानून विभाग के जरिए बचाती है जो गलत है.”

बहुत से लोग गुरपाल की बातों से सहमत हैं और मानते हैं कि पुलिस इस समस्या से निपटने के लिए कदम उठाएगी. लेकिन गुरपाल की बातों से साफ होता है कि इस दिशा में अभी लंबा सफर तय करना होगा.

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