श्रीलंका के 'सुनहरे' दिन लौटे

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Image caption 2009 से पहले श्रीलंका में बम धमाकों की ख़बरें आम होती थी, लेकिन अब स्थिति बदल रही है

ब्रिटेन के रॉबिन मैकॉनिकी के मन में श्रीलंका की जो छवि बनी थी, वो न्यूज़ चैनलों पर आने वाली गृह युद्ध की ख़बरों पर आधारित थी.

रॉबिन दक्षिण एशियाई देशों समेत दुनिया भर में बतौर सैलानी घूम चुके हैं, लेकिन श्रीलंका को उन्होंने कभी एक पर्यटक स्थल के रूप में नहीं देखा था.

उनका कहना है, "जिन दिनों यहां तमिल टाइगर्स और सरकारी सेना के बीच झड़पें चल रही थी, तब मैंने यहां आने के बारे में सोचा भी नहीं था. अगर उस समय श्रीलंका घूमने के बारे में सोचता भी तो मुझे अपनी सुरक्षा की ही चिंता लगी रहती."

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तमिल टाइगर्स और श्रीलंका सरकार के बीच गृह युद्ध की शुरुआत 1980 के दशक में हुई थी.

लगभग 30 सालों तक आए दिन सरकारी अधिकारियों व मंत्रियों पर हमले की कोशिशें, जगह-जगह बम धमाके और तमिल समुदाय पर हमलों की ख़बरें सामने आती रहीं. इस गृह युद्ध में लगभग 70,000 जानें गई.

स्थानीय लोगों के मुताबिक इस गृह युद्ध का प्रतिकूल असर न केवल श्रीलंका की अर्थव्यवस्था पर पड़ा, बल्कि पर्यटन पर भी पड़ा.

लेकिन 2009 में युद्ध समाप्ति की घोषणा के बाद चीज़ें बदल रही हैं.

सुरक्षा की भावना

ऐ के कुमार बंगलौर से अपने पूरे परिवार औऱ दोस्तों के साथ श्रीलंका घूमने आए हैं.

श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजापक्षे की चरमपंथ विरोधी नीतियां भले ही सवालों के घेरे में हो, लेकिन ऐ के कुमार का कहना है कि अपनी अर्थव्यवस्था को वैश्विक मानचित्र पर लाने के लिए श्रीलंका की सरकार के लिए कड़े कदम उठाना ज़रूरी था.

श्रीलंका के उत्तरी प्रांत की बेंटोटा नदी में बोट राइड का आनंद उठाते हुए वे कहते हैं, "अब चूंकि पिछले 2-3 सालों से यहां शांति है, तो हमने यहां आने के बारे में सोचा और पाया कि श्रीलंका बेहद खूबसूरत जगह है. एक सैलानी के तौर पर मुझे यहां सुरक्षित महसूस हो रहा है. अब यहां की सरकार को ये सुनिश्चित करना चाहिए कि ये शांति बनी रहे ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग यहां से ख़ूबसूरत यादें लेकर वापस जा सकें."

2009 में गृह युद्ध की समाप्ति के बाद ए के कुमार की तरह लाखों भारतीय सैलानी हर साल श्रीलंका का रूख कर रहे हैं.

2009 से लेकर 2011 के आंकड़ों को देखा जाए, तो भारत से श्रीलंका आने वाले सैलानियों की संख्या में 106 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई है.

2006 से लेकर 2009 तक, जब श्रीलंका में गृह युद्ध चरम पर था, तब सैलानियों की संख्या में लगातार गिरावट दर्ज की गई. लेकिन पिछले तीन सालों में दुनिया भर से आने वाले सैलानियों की संख्या दोगुनी हो गई है.

बढ़ता निवेश

Image caption 2009 से लेकर 2011 के बीच श्रीलंका आने वाले सैलानियों की संख्या दोगुनी हुई है

मध्य श्रीलंका में स्थित हिल स्टेशन न्वौरेलिया के हेरिटेन्स टी फैक्ट्री होटल के जनरल मैनेजर रोशनलाल परेरा का कहना है कि अब हालात इस कद्र सुधर रहे हैं कि कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां यहां के पर्यटन क्षेत्र में निवेश कर रही हैं.

श्रीलंका का 'सुनहरा दौर' याद करते हुए वे कहते हैं, "मुझे याद है कि सन 1982 तक श्रीलंका का पर्यटन क्षेत्र का सबसे शानदार समय था. लेकिन उसके बाद जैसे ही गृह युद्ध ने ज़ोर पकड़ा, तो पर्यटन क्षेत्र का पतन शुरू हो गया. उन दिनों हमें होटल मैनेजर की भूमिका छोड़ अपने पर्यटकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए संकट मोचक की भूमिका धारण करनी पड़ी थी. लेकिन अब वही सुहावने दिन वापस आ गए हैं."

हालांकि गृह युद्ध का केंद रहे उत्तरी और पूर्वी श्रीलंका में स्थिति थोड़ी अलग है.

तमिल टाइगर्स के गढ़ में चले भीषण संघर्ष के दौरन और उसकी समाप्ति के काफी समय बाद तक भी वहां सैलानियों को जाने की अनुमति नहीं थी. लेकिन अब सरकार ने उत्तरी और पूर्वी क्षेत्रों के पर्यटक स्थलों को भी सैलानियों के लिए खोल दिया है.

लेकिन स्थानीय पत्रकारों का कहना है कि वहां आने वाले सैलानियों पर सेना कड़ी नज़र रखती है और उन्हें स्थानीय लोगों से घुलने-मिलने नहीं दिया जाता.

बहरहाल, श्रीलंका पर्यटन विकास संस्था का कहना है कि वे विभिन्न देशों में अपने पर्यटन क्षेत्र का वैश्विक स्तर पर प्रचार कर रहे हैं और बाहरी निवेशकों को अपने देश की ओर आकर्षित करने में जुटे है.

श्रीलंका की खूबसूरती पर लगा दाग अब हटता हुआ नज़र आ रहा है....और दूर क्षितिज पर चढ़ते हुए सूरज को देखने आए पर्यटकों की बढ़ती संख्या भी शायद यही इशारा करती है.

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