बांग्लादेश में अस्तित्व की लड़ाई लड़ते बिहारी मुसलमान

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Image caption इस्लामी कानून को लागू करने की मांग को लेकर बांग्लादेश में हो रही रैली की एक फाइल फोटो

तकरीबन तीन लाख उर्दू भाषी भारतीय मुसलमान पिछले चार दशक से बांग्लादेश में अनिश्चितता की जिंदगी गुज़ार रहे हैं.

स्थानीय लोग इन्हें बिहारी बुलाते हैं जबकि ये खुद को पाकिस्तानी समझते हैं, लेकिन हकीकत ये है कि पाकिस्तान ने कभी इन्हें वहां आने की अनुमति नहीं दी.

इन बिहारी मुसलमानों में से करीब आधे लोग अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस द्वारा चलाए जा रहे शरणार्थी शिविरों में रहने को मजबूर हैं.

2008 में ढाका हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि ये बिहारी मुसलमान बांग्लादेश की राष्ट्रीयता के अधिकारी हैं.

लेकिन आज भी कई बिहारी खुद को बांग्लादेश में फंसा पाकिस्तानी मानते हैं और एक दिन वहां जाने की आस लगाए बैठे हैं जबकि शिविरों में पैदा हुए उनके बच्चे खुद को बांग्लादेशी मानते हैं.

शरणार्थी शिविर

देश की राजधानी ढाका के जेनेवा शरणार्थी शिविर के निवासी ऐसी ही झुग्गी बस्तियों में रहते हैं जिनकी गलियां कचरे से भरी होती हैं. दस बटा दस फुट की इन झुग्गियों में एक परिवार के दस से बारह लोग रहते हैं और इन परिवारों में माता-पिता के साथ-साथ दादा-दादी, भाई, उनकी पत्नियां और उनके बच्चे बेहद तंगहाली में जीवन बसर करते हैं.

इन झुग्गियों में हवा में दुर्गंघ भरी होती है, सूर्य की रोशनी मुश्किल से अपना रास्ता तलाश पाती है और बच्चे और जानवर एक साथ इन तंग गलियों में खेलते नजर आते हैं और वयस्क इन्हीं परिस्थितियों में रोज़मर्रा के काम निपटाते हैं.

तकरीबन तीन लाख लोग पिछले चार दशकों से इस जगह को अपना घर कहते हैं. इसी झुग्गी बस्ती में रहनेवालों में से एक मोहम्मद रिज़वान कहते हैं कि एक छोटे से झोपड़े में वो अपने विशाल परिवार के साथ रहते हैं जहां बकरियां भी उनके साथ ही रहती हैं.

"इस घर में मैं अपने माता-पिता, सात भाई, तीन बहन और उनके परिवार के साथ रहता हूं. मैं बिस्तर के ऊपरी हिस्से में सोता हूं जबकि मेरे माता-पिता और भाई नीचे के हिस्से में सोते हैं. अपनी हालत बताते हुए मुझे रोना आ रहा है. अगर कोई हमें जिंदा जला देता तो हमारा भला हो जाता. यहां हमारी जिंदगी जेल की तरह है."

अदालत का फैसला

यहां रहनेवाले ज्यादातर बाशिंदों का कहना है कि हाईकोर्ट के फैसले ने बांग्लादेश में उनकी राष्ट्रीयता को लेकर लंबे समय से चले आ रहे विवाद को भले ही खत्म कर दिया हो लेकिन उनकी अग्निपरीक्षा खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही.

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Image caption ढाका हाईकोर्ट ने 2008 में बिहारी मुसलमानों को राष्ट्रीयता प्रदान की थी.

इसी झुग्गी में रहनेवाले मोहम्मद साजिद खान कहते हैं कि राष्ट्रीय पहचान चिन्ह का केवल चुनाव में वोट के लिए इस्तेमाल करते हैं. वे कहते हैं, " जब हमें राष्ट्रीय पहचान चिन्ह मिला था तो हम बहुत आशान्वित थे. लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि उनके केवल चुनाव में ही इस्तेमाल की जरूरत है. चुनाव के बाद हमारी जिंदगी में ज्यादा कुछ नहीं बदला. हमारे कोई नागरिक अधिकार नहीं. अधिकारी हमें पासपोर्ट जारी नहीं करना चाहए. वे कहते हैं कि शरणार्थी शिविर में रह रहे लोगों को पासपोर्ट जारी नहीं किया जाएगा. ''

1947 में देश के बंटवारे के बाद ये मुस्लिम शरणार्थी भारतीय राज्य बिहार से बांग्लादेश आए थे. उनके जहन में सपना था कि पूर्वी पाकिस्तान में एक नई जिंदगी की शुरुआत करेंगे.

1971 की लड़ाई के दौरान कई उर्दू भाषी बिहारी मुसलमानों ने पाकिस्तानी सेना के साथ संघर्ष किया था या उसका समर्थन किया था.

बांग्लादेश का जन्म

लड़ाई के बाद जब स्वतंत्र बांग्लादेश का जन्म हुआ तो वहां की सरकार ने इन बिहारियों को पाकिस्तान भेजने का प्रस्ताव दिया था.

पांच लाख से ज्यादा लोगों ने पाकिस्तान जाने की इच्छा जाहिर की लेकिन 70 के दशक के मध्य में इस कार्रवाई को उस समय अचानक रोक दिया गया जब पाकिस्तान ने और लोगों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया.

इस राजनीतिक फैसले से तीन लाख से ज्यादा बिहारी बांग्लादेश में ही रह गए और उनके सामने ये बड़ा प्रश्न खड़ा हो गया कि वो अपना वतन किसे कहें.

36 वर्षों के संघर्ष के बाद 2008 में हाईकोर्ट के फैसले से इस समस्या का सैद्धांतिक हल तो निकल गया लेकिन समस्याएं फिर भी बनी रहीं.

अब्दुल जब्बार खान इसी उर्दू भाषी समुदाय के एक कार्यकर्ता हैं जो लंबे समय से बिहारियों के पाकिस्तान भेजे जाने की लड़ाई लड़ रहे हैं. वो कहते हैं कि जो लोग असल में पाकिस्तान जाना चाहते थे उन्होंने अब अपने विचार बदल लिए हैं लेकिन वो अपने जीवन स्तर में भी बदलाव चाहते हैं.

वे कहते हैं, "मैं अपने जीवन में कभी पाकिस्तान नहीं गया. मैंने अपनी पूरी जिंदगी यहीं गुजारी है और आज भी यहीं रह रहा हूं. जो बंगाली पाकिस्तान में रह रहे हैं उनकी भी यही हालत है. हम पाकिस्तान जाना चाहते थे लेकिन अगर ऐसा संभव नहीं है तो कम से कम हमें अच्छी जिंदगी गुजारने की सहूलियत तो दी जानी चाहिए.''

अब्दुल जब्बार खान बताते हैं कि नागरिकता के विवाद के सुलझने के बाद शिविर में रहनेवाले ज्यादातर लोगों के सामने दूसरी दुविधा खड़ी हो गई है. आधिकारिक रूप से वो अब शरणार्थी नहीं रहे इसलिए यहां से हटा दिए जाने का खतरा उनपर मंडरा रहा है. अगर ऐसा होता है तो उन्हें सड़क पर पनाह लेनी पड़ेगी.

अब्दुल जब्बार बताते हैं, "हाईकोर्ट का कहना है कि देशभर में मौजूद 70 शरणार्थी शिविरों के साथ तब तक छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए जब तक ये मुद्दा पूरी तरह सुलझ नहीं जाता. लेकिन इस पर कोई ध्यान नहीं दे रहा. सरकार की निवास योजनाएं हमारे लिए बड़ी समस्या खड़ी कर रही हैं. अधिकारी एक ही जमीन तीन अलग-अलग लोगों को आवंटित कर रहे हैं और ये लोग जमीन पर कब्जा करने के लिए मुष्टंडों का इस्तेमाल कर रहे हैं. अब हम कहां जाएं.''

नई पीढ़ी

इन शिकायतों के बावजूद 1971 के बाद बांग्लादेश में पैदा हुई पीढ़ी ये महसूस करती है कि अदालत के फैसले के बाद देश की मुख्यधारा में शामिल होना अब आसान हो गया है.

नई पीढ़ी के मोहम्मद हसन कहते हैं, पहले स्थानीय लोग हमें संदेह की नजरों से देखते थे लेकिन अब हालात बदल गए हैं. जब मैं युवा था तो शिविर के बाहर हम स्कूलों में नहीं जा सकते थे. अब चीजें बदल गई हैं. सरकार ने हमें राष्ट्रीयता दे दी है और अब हम अपनी पहचान के बारे में खुलकर बात कर सकते हैं. हमारे सहपाठी शुरुआत में थोड़ा अलग व्यवहार करते थे , दूरी रखने की कोशिश करते थे, लेकिन अब उनकी सोच बदली है, वो हमें दोस्त की तरह देखने लगे हैं.''

हसन को यकीन है कि वो अपना भाग्य बदल लेंगे. हसन की तरह ही अन्य बच्चे बंगालियों के साथ दोस्ती कर रहे हैं, अपने समुदाय से बाहर विवाह कर रहे हैं, बंगाली सीखने की कोशिश कर रहे हैं और इस तरह खुद को जीवन के नए ढर्रे में ढालने की कोशिश कर रहे हैं.

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