संवैधानिक संकट की कगार पर नेपाल

Image caption नेपाल में संविधान सभा का कार्यकाल 27 मई को समाप्त हो रहा है.

नेपाल की सर्वोच्च अदालत ने नए संविधान का मसौदा तैयार कर रही संविधान सभा का कार्यकाल और तीन महीने बढ़ाने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है.

अदालत का कहना है कि संविधान सभा का कार्यकाल पहले ही चार बार बढ़ाया जा चुका है और अब इसे 27 मई से आगे नहीं बढ़ाया जा सकेगा.

राजधानी काठमांडू में मौजूद बीबीसी संवाददाता का कहना है कि कोर्ट के फैसले से नेपाल में नए आम चुनाव की संभावना पैदा हो जाएगी.

2008 में नेपाल के गणतंत्र बनने के बाद ही दो साल के लिए एक संविधान सभा का गठन किया गया था. लेकिन राजनीतिक दल बार-बार नए संविधान का मसौदा तैयार करने में नाकाम रहे.

संघर्ष की स्थिति

विशेषज्ञों का कहना है कि अदालत के इस आदेश से इस कठिन समय में देश की न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच संघर्ष की स्थिति पैदा हो जाएगी.

सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि संविधान सभा का कार्यकाल बढ़ाने की कोशिश कर सरकार ने अपने पूर्व के आदेश की अवहेलना की है.

अदालत ने माओवादी प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई के खिलाफ लगे अदालत की अवमानना के अभियोग की भी सुनवाई की है और आदेश दिया है कि प्रधानमंत्री सात दिनों के भीतर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर लिखित में अपना जवाब दाखिल करें.

अदालत के इस आदेश से सरकार के पास केवल एक विकल्प बचता है : या तो वो रविवार से पहले नया संविधान जारी करे या फिर एक राजनीतिक शून्य का सामना करे.

नेपाल को नए संघीय राज्यों में विभाजित करना राजनीतिक दलों के बीच अभी भी असहमति का एक बड़ा मुद्दा है.

विशेषज्ञों को भय है कि अगर राजनीतिक दल रविवार से पहले किसी सहमति पर नहीं पहुंचते हैं तो 2006 से लेकर अब तक जो भी उपलब्धियां हासिल हुई हैं वो खतरे में पड़ जाएंगी.

2006 में नेपाल के विभिन्न राजनीतिक दलों ने एक शांति समझौते पर दस्तखत किया था जिससे एक दशक पुराने माओवादी विद्रोह का अंत हुआ था. इस विद्रोह में 15,000 से ज्यादा लोग मारे गए थे.

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