क्यों है एवरेस्ट का आकर्षण?

एवरेस्ट पर्वत (फाइल) इमेज कॉपीरइट BBC World Service

पिछले हफ्ते चार और लोगों की जिंदगियां माउंट एवरेस्ट के नाम हो गईं, लेकिन ऐसी त्रासदियां उनकी तादाद में कोई कमी नहीं ला रही जो उसकी ऊचाईयों पर फतह पाना चाहते हैं.

वसंत के कुछ हफ्तों में हर साल माउंट एवेरेस्ट पर भीषण तेज हवाओं के थपेड़े चलते रहते हैं.

पर्वतारोही के लिए ये हफ्ते निहायत ही कीमती होते हैं जब वो पर्वतारोहण के सबसे जोखिम भरे सफर पर जाकर दुनियां की सबसे ऊंचे पहाड़ पर फतह हासिल करने की कोशिश करते हैं.

इस चढ़ाई पर जाने वालों को महीनों इसकी तैयारी और परमिट हासिल करने के लिए हजारों डॉलर खर्च करने होते हैं.

चढ़ाई के दौरान उन्हें खराब मौसम और ऊंचाई पर पैदा होनेवाली दिक्कतों को झेलना पड़ता है. चढ़ाई के दौरान अक्सर इस कोशिश में मारे गए लोगों की लाशें भी दिख जाती हैं.

पिछले सप्ताह चोटी से वापसी के दौरान चार लोगों की मौत हो गई.

क्या है प्रेरणा?

इस सप्ताहांत 200 पर्वतारोही माउंट एवरेस्ट की चोटी पर फतह हासिल करने का प्रयास करेंगे. ये इस साल का आखिरी जत्थे होंगे.

एवरेस्ट में क्या है ऐसा जो उन्हें यहां आने पर प्रेरित करता है?

पर्तवतारोहियों के लिए काम करने वाली कंपनी के दावा स्टीवन शेरपा कहते हैं, "क्योंकि ये दुनियां की सबसे ऊंची पर्वत श्रंखला है."

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Image caption एवरेस्ट पर सबसे पहले विजयी तेंजिग नॉरगे और एडमंड हिलेरी.

उनके जवाब में जार्ज मेलोरी के उस बयान - "क्योंकि वो वहां है" की झलक मिलती है.

मेलोरी ने ये बयान 1924 की एवरेस्ट पर फतह की उस कोशिश के बाद कहा था, जिसमें उनकी जान चली गई थी.

एवरेस्ट बेस कैंप में बीबीसी से बात करते हुए दावा स्टीवन शेरपा ने कहा, "अभी भी पर्वत पर तकरीबन 1,000 पर्वतारोही मौजूद हैं, लेकिन ये बहुत बड़ा पहाड़ है मगर आप मो ब्लां की तुलना में देखें तो ये तादाद ये संख्या बहुत अधिक नहीं है."

"लेकिन समस्या ये है कि हर कोई चोटी पर एक ही दिन और एक ही समय जाना चाहता है," क्योंकि पर्वतारोही बेहतर मौसम का लाभ लेना चाहते है, जो एक बार समाप्त होने पर महीनों उस स्थिति में नहीं लौट सकता.

व्यावसायिक रूप

उदाहरण के तौर पर 23 मई, 2010 के एक दिन के भीतर 169 पर्वतारोही चोटी पर पहुंचे थे - ये 1953 में चोटी पर पहली फतह के बाद के 30 सालों में एवरेस्ट पर गई कुल संख्या से अधिक थी.

साल 2010 के अंत तक चोटी पर जा चुके पर्वतारोहियों की संख्या 3,000 से अधिक पहुंच चुकी थी.

दावा स्टीवन शेरपा कहते हैं, "अब हमारे पास इस पर्वत पर जाने का पचास साल से अधिक का तजुर्बा है. हमें ये तक मालूम है कि रस्सी कहां लगानी है, ये तक की लोग चढ़ाई के लिए पांव कहां रखेंगे. पहले सालों के मुकाबले सबकुछ बहुत आसान हुआ है."

लेकिन इसने दूसरी तरह की दिक्कतें पैदा की हैं - बहुत सारे लोग जो चोटी पर फतह पाना चाहते हैं इसमें आनेवाली कठिनाइयों का सामना नहीं कर पाते.

राई जोन्स, जो एवरेस्ट पर फतह पाने वाले सबसे कम उम्र के ब्रितानी हैं, कहते हैं, "मुझे लगता है कि कुछ लोग इस चढ़ाई में आने वाली दिक्कतों को कम आंकते हैं."

"इसके लिए आपको कीमत चुकानी पड़ती है, लेकिन वो सोचते हैं कि हम अगर पैसे खर्च करेंगे तो हम इसपर फतह क्यों नहीं पा सकते हैं."

दावा स्टीवन शेरपा इस विचार से सहमत हैं: "कुछ लोग अपनी क्षमताओं को जरूरत से ज्यादा आंकते है. लोग पूरी तरह से फिट हो सकते है, मैराथन के धावक हो सकते हैं, बड़ी दौड़ के चैंपियन - लेकिन वो ऊंचाइयों को नहीं समझते, वो पर्वत पर चढ़ाई में आनेवाली वास्तविकताओं को ठीक से समझ नहीं पाते."

पुराने पर्वतारोहियों के अनुसार, एवरेस्ट पर पर्वतारोहण ने बहुत व्यावसायिक रूप अख्तियार कर लिया है, और बाहरी मदद पर आश्रित हो गया है.

सहनशक्ति और धैर्य

राईन्होल्ड मेसनर ने 1978 में बिना किसी बिना ऑक्सीजन के इस्तेमाल के माउंट एवरेस्ट पर फतह हासिल की थी.

वो कहते हैं, "चढ़ाई के लिए शेरपा रास्ता तैयार करते हैं. चोटी तक जाने के रास्ते में तैयार कैंपों में अतिरिक्त ऑक्सीजन उपलब्ध होता है. लोग आपके लिए खाना बनाते है, बिस्तर बिछाते हैं. इन सुविधाओं के खरीदारों को आराम मुहैया है."

लेकिन राई जोन्स मानते हैं कि एवरेस्ट हमेशा खास रहेगा, और वो कभी भी महज एक "ट्रेडमिल नहीं बनेगा."

उन्होंने बीबीसी से कहा, "सभी को बाधाओं के बारे में मालूम है, सभी ने इसके मुतल्लिक किताबें पढ़ रखी हैं, जिसमें से ज्यादातर त्रासदियों और मौत से संबंधित हैं."

"लेकिन दरअस्ल जोखिम ही आकर्षण की मुख्य वजह है. लोग इसे सहनशक्ति और धैर्य की परीक्षा की तौर पर देखते हैं."

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