अफगानिस्तान की 'सुपर महिला'

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अफगानिस्तान में किसी महिला नेता का होना असंभव सी बात है लेकिन जारिफा कजीजादा देश की एक मात्र महिला ग्राम प्रमुख हैं, जिन्होंने अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति के चलते ये संभव कर दिखाया है.

यहाँ तक कि उनके कपड़े पहनने का अंदाज़ भी निराला है. वो नकली मूंछे लगाती हैं और रात में मोटर साइकिल पर गाँव के चक्कर लगाती हैं.

जारिफा कजीजादा कहती हैं, "मैं गांव के लोगों से कहती हूँ कि मुझे सिर्फ आपकी दुआओं की जरुरत है. जब भी आपको कोई समस्या हो तो मैं आपकी ओर से सरकार से बात करुँगी. साथ ही ये भी कहती हूँ कि अगर रात में भी कोई गड़बड़ी हो तो मैं अपनी बंदूक उठा कर आपके घर का पहरा दूंगी."

2004 की बात है जब जारिफा कजीजादा चुनाव में हार गई थीं, लेकिन इसके बाद भी उन्होंने सबके लिए बिजली की व्यवस्था करवा दी.

दो साल बाद लोगों ने उनसे अफगानिस्तान के उत्तरी बल्ख प्रांत के नव अब्द गाँव के मुखिया के पद के लिए पर्चा भरने को कहा.

मोटर साइकिल की सवारी

जारिफा कजीजादा कहती हैं कि जब भी रात में कोई घटना घटती है तो वो पुरुष के भेष में मोटर साइकिल पर जा पहुंचती हैं.

ग्रामीण अफगानिस्तान में किसी अकेली महिला को मोटर साइकिल की सवारी करते देखना आश्चर्यजनक है.

और वो मूंछे इसलिए लगाती है ताकि लोगों को ध्यान उन पर न जाए.

उनके एक स्थानीय समर्थक मौलवी सैयद मोहम्मद कहते हैं कि वो जिस तरीके का काम करती हैं उसे तो पुरुष भी नही कर सकते.

गाँव में बिजली

संसद का चुनाव हारने के बावजूद गाँव को बिजली दिलाने के अपने वादे को पूरा करने के लिए जारिफा कजीजादा अपनी चार साल की बेटी को लेकर देश की राजधानी काबुल जा पहुंची.

वहाँ वो सीधे ऊर्जा मंत्रालय गईं और मंत्री से मिलीं.

इस प्रयास में उन्हें सफलता भी मिली, लेकिन समस्या ये थी कि बिजली के तारों और स्टेशन बनाने का खर्चा गाँव वालों को ही उठाना था.

पैसे जुटाने के लिए जारिफा कजीजादा ने इसके लिए अपने जेवर तक बेच डाले.

पाँच महीने बाद ही उनके गाँव के हर घर तक बिजली पहुँच चुकी थी.

पुरुषों से बढ़कर काम

बिजली से होने वाली आय से जारिफा कजीजादा ने नदी पर पुल बनवाया जिससे गाँव मुख्य सड़क से जुड़ गया.

जारिफा कजीजादा ने एक मस्जिद भी बनवाई और इसकी विशेषता ये है कि यहाँ पुरुषों के साथ साथ महिलाएं भी नमाज पढ़ सकती हैं.

जारिफा कजीजादा कहती हैं कि जब लोगों ने उन्हें योजनाओं पर काम करते देखा तो खुद ही उनके साथ हो लिए.

तालिबान के शासन के दौरान जारिफा कजीजादा अपने पति के साथ मजारे शरीफ चली गईं. वहाँ उन्होंने बच्चों के टीकाकरण के लिए काफी काम किया.

आज 50 साल की उम्र में जारिफा कजीजादा के 36 पोते- पोतियां हैं और वो स्थानीय महिला परिषद की अध्यक्ष होने के साथ-साथ गाँव प्रमुख तो हैं ही.

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