क्यों नाराज हैं वासेपुर के लोग?

 शनिवार, 2 जून, 2012 को 04:30 IST तक के समाचार
गैग्स ऑफ वासेपुर

वासेपुर मुस्लिम बहुल क्षेत्र है और यहां दो वार्ड की पार्षद महिलाएं है.

झारखंड राज्य का एक प्रमुख औद्योगिक शहर है धनबाद जिसकी पूरी दुनिया में कोयले से पहचान है. यहां कोयला है तो उद्योग है, कोयला खदान हैं, मज़दूर हैं, आग है और कोयला माफिया हैं.

ब्लैक डायमंड के लिए मशहूर ये शहर, गोलियों की तड़तड़ाहट और माफिया सरगनाओं की दबंगई, गैंगवार और खूनखराबे के लिए हमेशा चर्चा में रहता है.

अगर इलाके का इतिहास देखें तो पिछले पैंतीस सालों में तेईस से ज्यादा कोयला व्यवसायियों और माफियाओं की हत्या आपसी गैंगवार में हो चुकी है और कोयले की पृष्ठभूमि पर पीढ़ी दर पीढ़ी चल रही इसी गैंगवार को फिल्म निर्देशक अनुराग कश्यप पर्दे पर उतारकर ला रहे हैं अपनी अगली फिल्म 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' में.

लेकिन वासेपुर के लोग नाराज़ हैं, उनमें गुस्सा है, क्षोभ है. पीड़ा है. उनका कहना है कि आखिर इस फिल्म के जरिए उन्हें क्यों बदनाम करने की कोशिश की जा रही है. आखिर क्यों उनकी आने वाले पीढ़ी से सम्मानित जीवन जीने का अधिकार छीना जा रहा है?

वो कहते हैं कि धनबाद में कोयला माफियाओं की पैठ शुरु से झरिया इलाके में रही है, ऐसे में अनुराग की फिल्म का शीर्षक गैंग्स ऑफ वासेपुर क्यों है? गैंग्स ऑफ झरिया या धनबाद क्यों नहीं?

मुसलमानों के खिलाफ़ साज़िश

"वासेपुर इलाका मुसलमानों की बस्ती के रुप में जाना जाता है. यहां की नब्बे प्रतिशत आबादी मुसलमानों की है. ऐसे में वासेपुर के नाम से फिल्म बनाकर, मुसलमान किरदारों के ज़रिये पूरी दुनिया इलाके की पहचान दहशतगर्दी की बनाई जा रही है."

मुबारक हुसैन, इमाम, आएशा मस्जिद

यहां के लोगों का कहना है किसी भी शहरी आबादी की तरह वासेपुर में भी कुछ परिवारों के बीच आपसी रंजिश को लेकर वर्चस्व की लड़ाई थी, जिनमें फहीम खान और शबीर खान गुट मुख्य थे, लेकिन इस लड़ाई का कोयले से कोई संबंध नहीं था.

वासेपुर में रहने वाले मोहम्मद इकलाख रिटायर्ड सिविल इंजीनियर हैं. वो कहते हैं इस तरह से एक पूरे इलाके को जिस तरह से फिल्म में दिखाया गया है वो काफी आपत्तिजनक है.

उनका कहना है, ''यहां समाज के हर वर्ग के लोग रहते हैं - वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर, आईएएस और आईपीएस अफसर, कारोबारी और बुद्धिजीवी. इस फिल्म में जिस तरह से इलाके को अपराधियों के गढ़ के तौर पर दिखाया गया है वो यहां के लोगों को बदनाम करने की साज़िश है.''

वासेपुर स्थित आएशा मस्जिद के इमाम मुबारक हुसैन इसे मुसलमानों को बदनाम करने की साजिश करार देते हैं.

हुसैन कहते हैं, ''पूरे धनबाद में वासेपुर इलाका मुसलमानों की बस्ती के रुप में जाना जाता है. यहां की 90 प्रतिशत आबादी मुसलमानों की है. ऐसे में वासेपुर के नाम से फिल्म बनाकर, मुसलमान किरदारों के ज़रिये पूरी दुनिया के सामने एक ऐसी तस्वीर बनाने की कोशिश की जा रही है कि यहां के लोगों की पहचान दहशतगर्दी है.''

वासेपुर

फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर के एक दृश्य में अभिनेता मनोज वाजपेयी अन्य कलाकारों के साथ.

वो आगे कहते हैं, ''इस कदम से ना सिर्फ सरकारी महकमों से मुसलमानों को मिलने वाली सुविधाएं घट जाएंगी बल्कि जो युवा पीढ़ी शिक्षा या नौकरी हासिल करने बाहर जा रही है उन्हें भी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा और वे हताश होंगे.''

वासेपुर एकता मंच के अध्यक्ष और फिल्म के विरोध में रांची हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल करने वाले याचिकाकर्ता जावेद खान का कहना है, ''फिल्म के ज़रिए पूरे वासेपुर समाज और कौम को बदनाम किया जा रहा है, यहां तक कि फिल्म के निर्देशक अनुराग कश्यप ने पटना में एक प्रेसवार्ता के दौरान वासेपुर के लोगों को अपराधी, गैरकानूनी कामों में लिप्त और फुट-सोल्जर्स कहा है.''

जावेद आगे कहते हैं, ''कोयला और कोयला खदानों का संबंध झरिया है जहां हिंदु गुटों और परिवारों के बीच लंबे समय से वर्चस्व की लड़ाई चल रही है जिनमें बी पी सिह, सुर्यदेव सिंह से लेकर पिछले साल हुई सुरेश सिंह की हत्या प्रमुख है. इसलिए हमने फिल्म के रिलीज़ को रोकने के लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और सेंसर बोर्ड को नोटिस भेजा है, रांची हाई कोर्ट में जनहित और रिट दायर की है, जिसकी सुनवाई आगामी 12 जून को होगी.''

वासेपुर के लोगों की मांग है कि फिल्म के शीर्षक से 'वासेपुर' नाम को हटाने के अलावा फिल्म में इस्तेमाल किए गए कुछ आपत्तिजनक डायलॉग्स भी हटाए जाएं जिसमें यहां के लोगों की पहचान दुनियाभर में दहशतगर्द कौम के तौर पर ना हो. अगर फिल्म में बगैर बदलाव के रिलीज़ होती है तो धनबाद जिले में इसका विरोध होगा.

असल गांवों और शहरी इलाकों पर बनी ये पहली फिल्म नहीं जो चर्चा में रही है इससे पहले भी शोले और पीपली लाइव जैसी फिल्में अपनी कहानी के कारण चर्चा में रही हैं लेकिन इन फिल्मों के प्रदर्शन को अदालत में चुनौती नहीं दी गई थी.

ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि वासेपुर के लोगों के अनुसार तो ये लड़ाई सिर्फ नाम की नहीं बल्कि एक पूरे कौम को बदनाम करने की षडयंत्र को नाकाम करने की है. उनके मुताबिक वे इसी देश के एक प्रमुख औद्योगिक शहर के निवासी हैं और उनके सामाजिक सरोकार भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने देश के किसी अन्य नागरिक के.

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