दुर्गा पूजा और गणेश उत्सव सा लंदन का जश्न

 शुक्रवार, 8 जून, 2012 को 21:11 IST तक के समाचार
दुर्गा पूजा और लंदन का जश्न

जब आप दुनिया के शिखर पर होते हैं तो जश्न मनाना लाजिमी है. जब आप गर्त में होते हैं तो आपकी जरूरत होती है अस्तित्व को बचाना.

मुंबई में अपने फ्लैट में बैठकर ने मैंने तीन दिन तक उमस भरी रातों में बीबीसी एंटरटेनमेंट चैनल देखा जिस पर महारानी के सत्तासीन होने के हीरक जयंती समारोह के कार्यक्रमों का सीधा प्रसारण हो रहा था. मैंने भला सब कुछ छोड़ कर क्यों ये कार्यक्रम देखे, जबकि मेरा तो इनसे कोई लेना देना भी नहीं था?

जहां से ये सब हो रहा था, वो मुझसे हजारों किलोमीटर दूर था. रही बात कॉमनवेल्थ की, तो वो खेलों, साहित्य पुरस्कारों और राष्ट्राध्यक्षों के साथ रंग बिरंगी पगड़ियों में होने वाले सम्मेलन तक ही ठीक है. लेकिन ब्रिटिश राज की खुमारी तेजी से उतर रही है.

टेम्स नदी में उतरी हजारों नौकाओं का तमाशा? शर्ले बेसे, टॉम जोन्स, स्टीव वॉन्डर, पॉल मैककार्थी और एल्टन जॉन के गीतों को याद करना? सेंट पॉल कैथेड्ररल में हृदयस्पर्शी थैंक्सगिविंग सर्विस या फिर शाही जुलूस में हैरान कर देने वाली प्रतियोगिताएं?

एक जैसा जश्न

इस तरह की धूमधाम सिर्फ ब्रितानी लोग ही दिखा सकते हैं. इस बारे में हैरान परेशान होने के बाद जब मैंने थोड़ा सा सोचा, तो लगा कि भारत में हम भी तो यही सब करते हैं, भले ही कुछ अलग अंदाज में.

जैसा कि तस्वीरों में दिख रहा था, टेम्स नदी के किनारे लोगों का हुजूम था, लोग मस्ती में झूम रहे थे और दर्शकों के सामने से शानदार सवारियां निकल रही थीं. कुल मिलाकर वैसा ही जश्न जैसा भारत में होता है.

महारानी एजिलाबेथ

महारानी के सत्तासीन होने के मौके पर चार दिन तक जश्न में डूबा रहा ब्रिटेन.

अगर आप इस तरह की तुलना को एक तरफ भी रख दें तो रिमझिम बरखा में भीगे लंदन में भावनाओं का वैसा ही सैलाब उमड़ा था जैसा पांच दिन तक चलने वाली दुर्गा पूजा में देखने को मिलता है जब पूरे कोलकाता में छुट्टी और जश्न का ही माहौल होता है.

इसी तरह का नजारा मुंबई में गणेशोत्सव के दौरान होता है, जब हजारों लोग कई दिनों तक पूजा अर्चना के बाद टोलियों में नाचते गाते गणपति को अरब सागर में विसर्जित करते हैं.

सांस्कृतिक संदर्भों को छोड़ दें तो जश्न और जोश का जज्बा एक जैसा ही लगा.

उठते सवाल

लंदन में कुछ लोगों के जेहन में ये सवाल जरूर आया होगा कि शांत और संयमित ब्रितानी गुणों के वाहक समझे जाने वाले शाही परिवार के हीरक जयंती समारोह में इतने तामझाम और शानोशौकत दिखाने की क्या जरूरत थी.

इसी तरह मुंबई में भी कुछ लोग नाक भौं सिकोड़ते हैं, जब उन्हें लगता है कि गणेशोत्सव का मतलब अब सिर्फ गलियों में नाचना कूदना रह गया है.

लेकिन ऐसे आलोचक एक बात को नहीं समझ पाते हैं. भागते दौड़ते, मंदी के मारे या फिर नीरस हो चुके समाज में इस तरह के जश्न ही तो लोगों में जोश भरते हैं.

इसीलिए लगता है कि आजादी के बाद भारत के नेताओं ने सही ही किया जो निजी आयोजन समझे जाने वाले दुर्गा और गणपति पूजा का राजनीतिकरण कर दिया और उनमें कहीं न कहीं राष्ट्रवाद फूंक दिया.

गणेशोत्सव

गणेशोत्सव के दौरान मुबई की सड़कों पर अद्भुत नजारा दिखता है.

इतना ही नहीं, आर्थिक तंगियों में फंसे लोगों के लिए इस तरह के आयोजन रोजीरोटी का जरिया भी साबित होते हैं.

खुद की खुशी

बहुत साल पहले, कोलकाता स्थित एक ब्रितानी समाजशास्त्री ने कहा था कि अगर कोलकाता में दुर्गा पूजा न हो तो लोग बड़े पैमाने पर आत्महत्या करने लग जाएंगे. आर्थिक मंदी के चलते यूरोप भी मुश्किल हालात के कगार पर खड़ा है.

जैसा कि भारतीय उत्सवों के दौरान होता है, महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के हीरक जयंती समारोह में भी लोग शाही परिवार के सम्मान से कहीं ज्यादा अपनी खुद की खुशी और सुकून के लिए नाच-गा रहे थे.

यह सही है कि ब्रितानी जनता ने भारत के लोगों की तरह पटाखे नहीं फोड़े और न ही सिंदूर उड़ाया और न ही महारानी को खुद उस तरह सुशोभित किया जैसे भारत में लोग दुर्गा देवी की मूर्ति को करते हैं- वे उन्हें ट्रक में लेकर पूरे लंदन में भी नहीं घूमे. फिर भी मेरे हिसाब वे ये सब करने के काफी करीब लगते थे.

भले ही महारानी की पूजा न होती हो, लेकिन वे उन लोगों के लिए प्रेरणा हैं जो पारंपरिक मूल्यों से अंजान और अलग हैं.

हम सब इसी तरह के हैं. और हम सभी को ये पसंद भी है.

लेखिका बाची काकड़िया भारतीय पत्रकार और स्तंभकार हैं और वो द टाइम्स ऑफ इंडिया में संपादक रह चुकी हैं.

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