जब विश्व ने पर्यावरण की सोची...

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Image caption पर्यावरण का मुद्दा आज हर देश के लिए अहम हो गया है, लेकिन 40 साल पहले स्थिति अलग थी

आने वाले दिनों में दुनिया भर से 130 शीर्ष नेता ब्राज़ील के रियो द जिनेरियो में संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में संगठित हो रहे हैं, जहां वे सतत विकास और उसकी कमी पर चर्चा करेंगें.

इस बैठक में ग़रीबों के लिए खाद्य पदार्थ, पानी और ऊर्जा की कमी और पर्यावरण की दुर्दशा पर भी चर्चा होगी.

लेकिन जिस देश ने इस बैठक का दौर शुरु किया था, वहां अब हालात बहुत अलग हैं.

स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में 40 साल पहले संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सम्मेलन पहली बार आयोजित किया गया था.

1972 में स्टॉकहोम में पृथ्वी के अधिकारों पर बातचीत के लिए आयोजित हुए समारोह ने सरकारी अधिकारियों के अलावा भी कई तब्कों के लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया.

स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में उस वक्त करीब 10,000 लोग संगठित हुए थे. ये पर्यावरण कार्यकर्ताओं की पहली पीढ़ी थी.

क्रांति

नॉर्वे से आए युवक जॉन गुस्ताव स्ट्रान्डेनेस और कई लोगों के लिए साइलैंट स्प्रिंग नाम की किताब एक अहम कसौटी थी. इस किताब में दिखाया गया था कि सभी प्रकार का मानव विकास अच्छा नहीं होता.

किताब में उत्तरी अमरीका में वन्यजीवों का विनाश, कीटनाशकों का धड़ल्ले से होने वाला इस्तेमाल जैसे मुद्दे उठाए गए थे.

जॉन कहते हैं, “जापान में 1961-62 में जब मर्क्युरी डिज़ास्टर या पारे की आपदा आई थी तो हज़ारों लोगों और मछलियों की मौत हो गई थी. पानी के पारे से दूषित होने से कई लोगों की जान खतरे में पड़ीं. स्वीडन में भी ऐसा ही कुछ हुआ था जब एक रसायन के मिट्टी में मिल जाने से पानी दूषित हो गया था. जब तक मैंने रेचल कारसन की किताब नहीं पढ़ी थी, तब तक मैंने कभी इन मुद्दों को आपस में जोड़ कर नहीं देखा था.”

परमाणु बम परीक्षण, नीली व्हेल मछली का लुप्त होना और बढ़ती आबादी भी उस समय में चिंता का विषय बनते जा रहे थे.

जब कार्यकर्ता स्टॉकहोम की सड़कों पर रैलियां निकाल रहे थे, तब कई मंत्री आधिकारिक बेठकों में ऐसे ही मुद्दे उठा रहे थे. इनमें से एक थीं भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी.

उन्होंने कहा था, “मेरा अनुभव ये कहता है कि जो लोग पर्यावरण के साथ बेरहमी से पेश आते हैं, वो खुद के साथ सहज महसूस नहीं करते. आधुनिक लोगों को पर्यावरण के साथ एक ऐसा रिश्ता जोड़ना चाहिए, जो अटूट हो, जैसे कि पुरातन काल भारत में किया जाता था.”

विकासशील बनाम विकसित देश

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Image caption गरीबी जैसे मुद्दों को लेकर भारत जैसे विकासशील देश ज़्यादा चिंतित थे

लेकिन उस समय विकासशील देश अपने साथ और भी मुद्दे लेकर स्टॉकहोम आए थे. गरीबी, खाद्य सामग्री और पानी की कमी को लेकर उनहोंने चिंता ज़ाहिर की थी.

उस बैठक की अध्यक्षता करने वाले मॉरिस स्ट्रॉन्ग याद करते हैं कि इस वजह से बातचीत शुरू होने से पहले ही खत्म होने का डर उन्हें सता रहा था.

वे कहते हैं, “1972 में विकासशील देशों की चिंताएं अलग ही थी, क्योंकि उन्हें लगता था कि इस सम्मेलन में उठाए जा रहे मुद्दे केवल अमीर देशों के मुद्दे हैं जबकि उनकी असल चिंता तो गरीबी और विकास जैसे मुद्दों पर थी. इसलिए संयुक्त राष्ट्र की इस बैठक के रद्द होने के आसार भी दिखाई पड़ रहे थे.”

राष्ट्रीय राजनीति से लड़ना भी इस पर्यावरण सम्मेलन के लिए दूसरी चुनौति थी.

सोवियत संघ और उसके सहयोगी देशों ने इस बैठक में आने से मना कर दिया था क्योंकि पूर्वी जर्मनी को संयुक्त राष्ट्र के मंच पर एक सीट दे दी गई थी.

जहां अमरीका ने सम्मेलन में अपने विरोधी देश सोवियत संघ और जापान पर व्हेल का शिकार करने का आरोप लगाया, तो अमरीका पर दूसरे मुद्दों को लेकर हमला बोला गया.

कल की चुनौतियां

स्वीडन के प्रधानमंत्री ओलोफ पाल्मे ने सार्वजनिक तौर पर अमरीका की निंदा की क्योंकि उनका मानना था कि अमरीका वियतनाम में रसायनों का इस्तेमाल कर जान बूझ कर जंगलों को नष्ट कर रहा है.

इन सबके बीच दिलचस्प बात ये थी कि पहली बार सरकारें ये मान रही थीं कि विकास के लिए पर्यावरण का ख्याल रखना ज़रूरी है और हर देश की ये ज़िम्मेदारी है कि वो दूसरे देश को प्रदूषित न करे.

लुप्त होती प्रजातियों को बचाने पर इन देशों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी सहमति दी और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम स्थापित करने का फैसला भी किया.

जॉन गुस्ताव स्ट्रान्डेनेस के मुताबिक इस बात का असर सभी सरकारों पर हुआ था.

उनका कहना है, “इस बैठक से पहले दुनिया के किसी भी देश में कोई पर्यावरण मंत्री नहीं हुआ करता था. मुझे याद है कि इस बैठक के बाद नॉर्वे पर्यावरण मंत्रालय बनाने वाला पहला देश बना. तो एक तरीके से इस बैठक ने पर्यावरण के मुद्दे को राजनैतिक मंच पर रख दिया था.”

हालांकि बैठक के नतीजों से हर कोई खुश नहीं था. 40 साल पहले मुड़ कर देखा जाए, तो अब लगता है कि आज विश्व में अमीरी और सफाई बढ़ी है, लेकिन जैसे-जैसे आबादी बढ़ती गई और जंगल नष्ट होने शुरू हुए, वातावरण में भी बदलाव आने लगा और भुखमरी जैसी समस्याएं आम हो गईं.

अब आने वाले सम्मेलन में शायद विश्व भर के नेताओं के पास एक मौका है चीज़े अब भी बदलने का.

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