तहरीर चौराहे पर जमा हुए हजारों प्रदर्शनकारी

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Image caption मिस्र में मुसलिम ब्रदरहुड की फ्रीडम एंड जस्टिस पार्टी के प्रमुख मोहम्मद मुरसी के जीतने की उम्मीद है

मिस्र में सैन्य परिषद के खिलाफ हजारों लोग तहरीर चौक पर प्रदर्शन के लिए इकट्ठा हो रहे हैं. परिषद ने खुद को नए अधिकार देने का फैसला किया है.

मुसलिम ब्रदरहुड सत्तारूढ़ सैन्य परिषद के नई शक्तियां हासिल कर लेने के खिलाफ पूरे मिस्र में प्रदर्शन करने का आह्वाहन किया है.

इस सप्ताहांत में सैन्य परिषद ने दो फरमान जारी किए. इनमें कट्टरपंथियों के प्रभुत्व वाली संसद को भंग करने के अलावा खुद के लिए सभी सवैंधानिक अधिकारों पर दावा कर लिया गया.

मंगलवार को कुछ सांसदों के संसद में घुसने की कोशिश भी करने की उम्मीद है. इस बीच राष्ट्रपति चुनावों की गिनती पूरी हो गई और दोनों ही उम्मीदवार अपनी जीत का दावा कर रहे हैं.

ब्रदरहुड की फ्रीडम एंड जस्टिस पार्टी के प्रमुख मोहम्मद मुरसी ने दावा किया कि उन्हें 52 फीसदी वोट मिले हैं.

जबकि प्रधानमंत्री अहमद शफीक की चुनाव प्रचार टीम ने आरोप लगाया कि ब्रदरहुड ने वोटरों को आतंकित किया है.

मुरसी मजबूत

चुनाव विश्लेषकों और सरकारी मीडिया का अनुमान है कि मुरसी तीन-चार प्रतिशत वोट के अंतर से जीत रहे हैं. उन्हें 10 लाख वोट मिलने का अनुमान है.

आधिकारिक तौर पर परिणाम गुरुवार को घोषित होने हैं.

काहिरा से बीबीसी के संवाददाता जॉन लियॉन के अनुसार सशस्त्र सेना की शीर्ष परिषद यानी स्काफ को भी मुरसी की जीत का अंदाजा होने लगा है.

परिणाम स्वरूप राष्ट्रपति की शक्तियों पर लगाम लगाने के लिए कई आदेश जारी करने के अलावा नियुक्तियां भी की गईं हैं.

बीबीसी संवाददाता के अनुसार सेना के तख्ता पलटने के भी कयास लगाए जा रहे हैं. ऐसे हालातों में सभी को अराजकता भरे समझौते के बीच रहना पड़ेगा.

पिछले साल होस्नी मुबारक की सत्ता पलट के बाद उनका उत्तराधिकारी चुनने के लिए इस सप्ताहांत चुनाव हुए थे. लेकिन सैन्य परिषद के ये दो आदेश इस सब पर हावी नजर आ रहे हैं.

दो ताजा फरमान

गुरुवार को शीर्ष संवैधानिक कोर्ट ने फैसला दिया कि निचले सदन के लिए चुनावों के लिए बने नियम असंवैधानिक हैं क्योंकि इसमें पार्टी के सदस्यों को उन सीटों पर लड़ने की अनुमति दे दी गई जो आजाद उम्मीदवारों के लिए आरक्षित थी. इसके बाद संसद भंग कर दी गई.

रविवार को चुनाव खत्म होने के साथ ही दूसरे आदेश में मार्च 2011 की सवैंधानिक घोषणा को निरस्त कर दिया गया और सेना के जनरलों को ताजा चुनाव होने तक संसद पर नियंत्रण के पूरे अधिकार दे दिए गए.

इन फरमान के विरोध में मुसलिम ब्रदरहुड ने दस लाख से अधिक लोगों का विरोध मार्च निकालने की घोषणा की है.

अरब देशों में मुसलिम ब्रदरहुड सबसे पुराने इस्लामी संगठनों में से एक है. इसकी स्थापना 1928 में की गई थी और मध्य पूर्व के कई देशों में इसके सदस्य हैं.

1928 में जब मिस्र में सैन्य कब्ज़ा हो रहा था तो उसके विरोध में मुसलिम ब्रदरहुड अस्तित्व में आया था. गरीबी और भ्रष्टाचार के कारण मिस्र में मुसलिम ब्रदरहुड के सदस्यों की संख्या लगातार बढ़ती ही चली गई.

अपने जनकार्यों की बदौलत ब्रदरहुड ने अस्पताल, स्कूल और जन कल्याण के संस्थान खोले जिससे उन लोगों को बहुत फायदा हुआ जिन्हें सरकार से कुछ भी नहीं मिल रहा था.

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