भोपाल गैस कांड: यूनियन कार्बाइड को राहत

भोपाल गैस त्रासदी
Image caption भारत में उस त्रासदी के बाद कई बार विरोध प्रदर्शन आयोजित करके दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की माँग होती रही है

भारत के भोपाल गैस त्रासदी मामले में मैनहैटन में संघीय अदालत ने यूनियन कार्बाइड कंपनी और उसके पूर्व अधिकारी वॉरेन एंडरसन को मलबे की सफ़ाई संबंधी सारी ज़िम्मेदारियों से बरी कर दिया है.

अदालत में याचिकाकर्ता जानकीबाई साहू और अन्य ने यूनियन कार्बाइड कंपनी के खिलाफ़ मुकदमा दायर किया था जिसमें कहा गया था कि भोपाल में 1984 में ज़हरीली गैस के रिसाव के बाद से पड़े हुए मलबे के कारण इलाके का पानी दूषित हो गया है.

लेकिन उनकी याचिका खारिज करते हुए जज जॉन कीनन ने फ़ैसले में कहा कि चूंकि यूनियन कार्बाइड कंपनी ने भारत में स्थित यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड नामक कंपनी में अपना हिस्सा बेच दिया था इसलिए अब उस पर भोपाल में गैस-रिसाव से प्रभावित इलाकों में सफ़ाई कराने की कोई ज़िम्मेदारी लागू नहीं होती है.

जज के फ़ैसले में कहा गया है, “दस्तावेज़ों से पता चलता है कि यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड नामक कंपनी ने यूनियन कार्बाइड कंपनी से मलबा साफ़ करने के बारे में पूछताछ की थी लेकिन ऐसा कोई सबूत नहीं है कि यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड को सफ़ाई कराने के मामलों में यूनियन कार्बाइड कंपनी की मंज़ूरी की ज़रूरत पड़ी हो. और ऐसा भी कोई सबूत नहीं मिलता है जिससे यह पता चलता हो कि यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड नामक कंपनी ने यूनियन कार्बाइड कंपनी की ओर से पेस्टीसाइड दवाइयां बनाने का काम किया हो, या फिर उसकी ओर से किसी व्यापारिक समझौते में शामिल हुई हो.”

यूनियन कार्बाइड कंपनी अब अमरीका की डाओ केमिकल्स कंपनी का हिस्सा है.

हिस्सेदारी

Image caption भोपाल पीड़ितों के वकील हिमांशु रंजन शर्मा का कहना है कि वहउच्च अदालत में अपील करेंगे

यूनियन कार्बाइड कंपनी ने 1994 में यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड नामक कंपनी में अपना हिस्सा बेच दिया था.

1984 में यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड कंपनी के ही भोपाल स्थित रसायन संयंत्र में गैस का रिसाव हुआ था और 1994 के बाद इस कंपनी का नाम बदलकर एवररेडी इंडिया लिमिटेड रखा गया था.

लेकिन इस मुकदमे में भोपाल पीड़ितों के वकील हिमांशु रंजन शर्मा का कहना है कि वह इस मामले में उच्च अदालत यानी द्वितीय सर्किट कोर्ट में अपील करेंगे.

वकील शर्मा कहते हैं, “हम अब अपील्स कोर्ट में मुकदमा ले जाएंगे. न्यूयॉर्क की डिस्ट्रिक्ट संघीय अदालत का यह मानना है कि यूनियन कार्बाइड और यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड कंपनी अलग-अलग कंपनियां हैं. इसलिए यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड कंपनी ने जो नुकसान किया है भोपाल में उसकी ज़िम्मेदार भी वही है. लेकिन हमारा यह कहना है कि अमरीकी यूनियन कार्बाइड कंपनी ने सारी तकनीक यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड कंपनी को दी थी इसलिए ज़हरीले मलबे से होने वाले नुकसान के मामले में भी उसकी पूरी ज़िम्मेदारी बनती है.”

अब इस अपील में करीब एक साल तक लग सकता है.

इस मामले से जुड़े आंदोलन के कार्यकर्ता अमरीकी अदालत के इस फ़ैसले से बेहद नाराज़ हैं. उनका कहना है कि सारे रिकार्ड बताते हैं कि यूनियन कार्बाइड कंपनी ही सफ़ाई कराने की ज़िम्मेदार है.

भोपाल गैस पीडितों को न्याय दिलाने के लिए जारी अंतरराष्ट्रीय स्तर की मुहिम आईसीजेबी के एक अमरीकी कार्यकर्ता ब्रायन मूनी ने अदालत के फ़ैसले का विरोध करते हुए कहा, “यह तो फ़ैसला ऐसा है जिससे लगता है कि गैस से पीड़ित लोगों के बारे में फ़िक्र नहीं है बल्कि गैस रिसाव के मलबे से प्रदूषण करने वाली कंपनी के बारे में अधिक चिंता है."

खुद पहले यूनियन कार्बाइड के वकील रह चुक मूनी ने कहा, "ऐसा नहीं है कि इस कंपनी ने बगैर जाने बूझे ज़हरीला मलबा पड़ा रहने दिया, बल्कि सब कुछ जानते बूझते हुए यूनियन कार्बाईड कंपनी ने ही यह मलबा बहाया और अब वह ज़िम्मेदारी कबूल नहीं कर रही.”

भारत के मध्य प्रदेश राज्य के भोपाल शहर में 28 साल पहले 3 दिसंबर 1984 में यूनियन कार्बाइड कंपनी के प्लांट से रिसने वाली ज़हरीली गैस की त्रासदी में भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक पाँच हज़ार से अधिक लोगों की मौत हुई थी, लेकिन अमरीकी मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार इस कांड में 20 हज़ार से अधिक लोग मारे गए थे.

इसके अलावा लाखों की संख्या में लोग ज़हरीली गैस के रिसाव के कारण और ज़हरीला मलबा बिखरे होने के कारण होने वाले प्रदूषण के चलते भी विभिन्न बीमारियों से पीड़ित हो रहे हैं.

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