बीबीसी संवाददाताओं की बुश हाउस की यादें

बुश हाउस की सीढ़ियों पर
Image caption तस्वीर में बीबीसी के कई संवाददाता. कुछ अभी भी बीबीसी में हैं और कुछ कई अन्य मीडिया संस्थानों में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत. तस्वीर 2006 की है

बीबीसी के दफ्तर बुश हाउस में कई बीबीसी संवाददाताओं ने काम किया. वो उनके लिए दफ्तर नहीं घर जैसा रहा है. आज जब बुश हाउस से बीबीसी का आखिरी प्रसारण है तो कई संवाददाता भावुक भी हैं. अब बीबीसी का दफ्तर लंदन के किसी दूसरे स्थान पर चला गया है. इन्हीं संवाददाताओं की जुबानी बीबीसी बुश हाउस की कहानी.

ब्रजेश उपाध्याय

कुछ महीनों पहले मुंबई में एक बड़े रेडियो स्टेशन के प्रमुख के साथ बैठा हुआ था जब ब्लैकबेरी पर ख़बर आई कि बुश हाउस को अलविदा कहने का वक्त आ गया है. मैने उनसे ये बात कही तो उनका कहना था कि हम तो अक्सर ही दफ़्तर बदलते रहते हैं, एक इमारत के लिए इतनी हायतौबा क्यों. मैं मुस्करा कर रह गया. वो समझ नहीं पाते. बुश हाउस इमारत नहीं एक सोच है. तोरा बोरा की पहाड़ियां हों या सोमालिया के जंगी मैदान, न्यू ऑरलींस की संगीत से गूंजती गलियां हों या तहरीर चौक पर उठती बदलाव की आंधी, दुनिया के हर कोने, हर नुक्कड़ से कभी रेडियो, तो कभी इंटरनेट के ज़रिए चौबीसों घंटे जुड़े रहने की ताक़त एक सोच में ही हो सकती है. स्ट्रैंड की सड़क से लंदन की खुशनुमा रातों की मौज लेकर गुज़रता हुआ जोड़ा जब सुबह के दो बजे बुश हाउस की किसी मंज़िल पर लाईट जलती हुआ देखता होगा तो उसे क्या पाता कि वहां नाईट शिफ़्ट पर आया प्रोड्यूसर दुनिया के एक कोने को किसी और कोने से जोड़ने की जुगत में लगा है. उसे क्या पता कि वहां रात भर ख़बरों की भागदौड़ के बाद सुस्ता रहा ख़ैबर का पठान अयोध्या के पंडित को अपनी रामकहानी सुना रहा है, या फिर बिहार के कोने से आया हुआ बांका ब्राज़ील से आई ब्यूटी को लुभाने में लगा है. पेरिस की सड़कों का रोमांस, मंटो की कहानियों का बेबाकपन, जकड़ी हुई सभ्यताओं से आज़ादी का एहसास, सीमाओं और पूर्वाग्रहों से रहित दुनिया ये सब एक छत के नीचे--- एक सोच ही हो सकती है. बुश हाउस वही सोच है.

विनोद वर्मा

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जैसा धर्मावलंबियों के लिए मक्का, मानसरोवर, वैटिकन और यरुशलम का महत्व होता होगा, वैसा ही मेरे लिए बुश हाउस का था. दुनिया भर में स्वतंत्र पत्रकारिता का परचम लहराने वाले एक संस्थान का मुख्यालय.

जनवरी, 2003 में वहाँ पहली बार जाने का मौक़ा मिला. अपनी राजनीतिक ट्रेनिंग और स्वतंत्र विचारधारा की वजह से एक सवाल फिर भी ज़हन में घूम रहा था. आशंका की तरह. पत्रकारीय स्वतंत्रता वास्तव में कितनी स्वतंत्र होती होगी? कहीं तो ब्रिटेन अपना हित-अहित देखता ही होगा?

अभी मैंने कुछ देखना समझना शुरु ही किया था कि 19 मार्च को अमरीका ने इराक़ पर हमला बोल दिया. ब्रिटेन इसमें साझीदार था. मुझे लगा कि अब मेरे सवाल का जवाब मिल सकता है.

सुबह न्यूज़ रुम में होने वाली बैठकों का एक बड़ा हिस्सा इराक़ युद्ध पर केंद्रित होने लगा. दक्षिण एशिया के सभी भाषाई सेवा के प्रमुख उस बैठक में होते और विशेष रुप से उपस्थित होते एशिया-प्रशांत के प्रमुख बेरी लैंग्रिज.

बीबीसी के संवाददाता युद्ध भूमि में ब्रितानी सेना के साथ थे और लगातार ख़बरें भेज रहे थे. एम्बेडेड जर्नलिस्ट. अभी यु्द्ध को दो हफ़्ते भी नहीं बीते होंगे कि एक दिन बैठक में बीबीसी सिंहला सेवा और उर्दू सेवा के प्रमुखों ने सवाल उठाया कि बीबीसी के संवाददाताओं की ख़बरें एकतरफ़ा प्रतीत हो रही हैं. एपी, एफ़पी और रॉयटर्स की कॉपियाँ कुछ और कह रही हैं.

मैं ध्यान से सुन रहा था. बेरी लैंग्रिज ने कहा, "आप सब अनुभवी पत्रकार हैं और निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं. यह क़तई ज़रुरी नहीं कि हम बीबीसी की संवाददाताओं की ख़बरों का ही उपयोग करें. अगर आपको लगता है कि वे एकतरफ़ा हैं तो दूसरे स्रोतों से मिल रही ख़बरों का प्रयोग कीजिए."

उन्होंने अपनी ओर से बस इतना ही कहा, "सिर्फ़ इतना ख़याल रखिएगा कि बीबीसी की नीति के मुताबिक़ हर ख़बर को हम दो स्रोतों से जाँच ज़रुर लें."

यह मेरे लिए एक तरह से अप्रत्याशित था. इस अनुभव ने मेरी आशंकाओं को काफ़ी हद तक मिटा दिया.

बुश हाउस भले अब बीबीसी का दफ़्तर न रह जाए लेकिन मेरी पत्रकारिता करते तक वह मेरे लिए हमेशा आबाद रहेगा, प्रकाश स्तंभ की तरह सचेत करता हुआ. और सवाल उठाता हुआ कि भारत का अपना बुश हाउस कब बनेगा?

पंकज प्रियदर्शी

बात फरवरी 2003 की है, जब कड़कड़ाती सर्दी में मैंने लंदन में कदम रखा था. मौसम ऐसा था जैसे सब कुछ जम जाए. लेकिन नहीं जमा था, तो बुश हाउस में दाखिल होने का उत्साह.

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तीन फरवरी की सुबह जैसे ही बुश हाउस में कदम रखा, लगा लंबे समय का मेरा सपना पूरा हो गया है. बीबीसी हिंदी सेवा रेडियो पर सुनते-सुनते बुश हाउस दिलो-दिमाग में ऐसा रम गया था, सामने से उसे देखने और उसका अहसास करना एक अनोखा अनुभव था.

फिर बुश हाउस में छह साल बिताने को मिले. एक-एक क्षण यादगार. ट्रेनिंग से लेकर अलग-अलग मुल्कों के लोगों से मिलने-जुलने का मौका बुश हाउस ने दिया. लगता था एक पूरी सभ्यता एक छत के नीचे आ गई हो. बीबीसी विश्व सेवा का मुख्यालय बुश हाउस ऐसी जगह थी, जहाँ हर तरह के लोगों से मिलने के अलावा बहुत कुछ सीखने को मिला.

बुश हाउस में कई ऐसे मित्र बनें, जिनसे खूब आत्मीयता मिली. नेपाली सेवा, ऊर्दू सेवा, तमिल और सिंहला सेवा और बंगला सेवा के लोगों के साथ कैसे समय गुजर जाता था, पता ही नहीं चलता था.

कैंटीन और बीबीसी क्लब में विभिन्न सेवाओं के लोग अपने यहाँ की ऐसी-ऐसी बातें सुनाते और समझाते थे, जो कहीं और नहीं सीखी जा सकती. बुश हाउस मेरे लिए सिर्फ एक इमारत नहीं थी, बल्कि एक जीवंत जगह थी और मुझे गर्व है कि मैं इस जीवंत जगह का हिस्सा बना.

मुकेश शर्मा

मैं और विनोद जी साथ-साथ लंदन पहुँचे थे और हमारे साथ थे हमारे पूर्व सहयोगी कुर्बान अली भी. वही हमें बुश हाउस लेकर गए. मेट्रो हाउस से आगे बढ़ने पर कुछ दूर से ही बुश हाउस दिखने लगता था. ये कहना गलत नहीं होगा कि इमारत काफी भव्य है और बीबीसी वर्ल्ड सर्विस जैसी ऐतिहासिक सेवा का मुख्यालय ऐसी जगह ही हो सकता था.

गेट पर ऊपर देखा तो पत्थर पर खुदा हुआ था- ‘टु द फ्रेंडशिप ऑफ इंग्लिश स्पीकिंग पीपल्स’. इमारत वैसे अपने आप में किसी भूलभुलैया से कम नहीं थी.

वहाँ किसी दूसरे ब्लॉक में अगर स्टूडियो या किसी दफ्तर में जाना हो तो पहले किसी वरिष्ठ सहयोगी से वहाँ तक पहुँचने का रास्ता समझना पड़ता था. अपने आप में छोटी सी दुनिया थी क्योंकि 40 से ज्यादा भाषा में काम करने वाले दुनिया भर से आए पत्रकारों का दफ्तर वही था. लंदन से भारत लौटने के बाद मेरी यादों में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस शायद हमेशा बुश हाउस में ही रहेगा.

रुपा झा

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बुश हाउस में पहला दिन 15 जून 2001..पहली बार लंदन की यात्रा, पहली पक्की नौकरी और पहली पहली बार बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के हेडक्वाटर्स में जाना.

आप समझ सकते हैं क्या बीत रही होगी. हाथ पांव ठंडे हो रहे थे. पर पता नहीं चला कब एक भव्य सी इमारत के सामने हम खड़े थे. जहां बुश के हिज्जे में 'यू', 'वी' के आकार में लिखा हुआ था. फिर सवाल ये कौंधा, बीबीसी के दफ्तर का नाम बुश हाउस क्यों है भाई. उस वक्त जार्ज बुश के जलवे भी थे लगा शायद कोई रिश्ता रहा हो.

बहरहाल....वो दिन था और उसके बाद जब भी बुश हाउस के बाहर खड़े हुए, वी के अंदाज में यू लिखा हुआ पढ़कर हमेशा एक ख्याल दौड़ता क्या यार अंग्रेजों का हाथ अंग्रेजी में तंग कैसे....अब ऐसा क्यों था वगैरह वगैरह रहने दीजिए..'वी' के अंदाज में 'यू' का तिलस्म टूटना नहीं चाहिए.

बुश हाउस में उन दिनों तीस से ज्यादा भाषाओं में काम होता था. सब एक ही छत के नीचे. और मेरी 'बुश हाउस यादों' में सबसे गहरा रंग सांतवे माले का है जहां दक्षिण एशिया भाषाओं का विभाग था ओपन प्लैन स्टाईल में. हिंदी, उर्दू, नेपाली, बांग्ला, सिंहला, तमिल.... इतना बड़ा फ्लोर ..और जिस तरफ भी नजर दौड़ाओं दोस्त ही मिलते.. मुस्कुराते हुए, टांग खींचते और फिर एक दूसरे के लंच बॉक्स में सेंध लगातें. नाईट शिफ्टों में चाय की चुस्कियां और फिर तेज स्वर में एक से एक बॉलीवुड के हॉट नम्बर...उर्दू और हिंदी के रात्रि सेवा के साथियों की चांदी थी. खुला माहौल और खुले लोग..

बुश हाउस के ऐतिहासिक मह्तव की व्याख्या तो होती ही रहेगी लेकिन मेरे लिए बुश हाउस जहां दो अंतरालो में लगभग चार साल गुजारने का मौका मिला, एक ऐसा 'हाउस' था जो दरअसल हमारे लिए 'अपने घर' जैसा था.

सुशील झा

एक साल छह महीने और तीन दिन. इतना ही समय बिताया था मैंने बुश हाउस में. सातवें माले पर जब पहली बार हिंदी सेवा के दफ्तर में पहुंचा तो डरा और सहमा भी था.

न्यूज़रुम की मीटिंग में बड़े अधिकारी थे लेकिन मेरे जैसे लोग जो अनुभव में बहुत कम थे उनसे भी राय मांगी जाती. प्रोत्साहित किया जाता. ट्रेनिंग में जो दोस्ती हुई वो नौ वर्ष के बाद आज भी बरकरार है.

मुझे अभी भी याद है. लिफ्ट में किसी ने पूछा. तो बताइए कोई बड़ी स्टोरी आपके यहां कि मैंने रेडियोधर्मी विकिरणों का ज़िक्र किया था. मुझे पता नहीं वो बड़े अधिकारी हैं. तीन महीने बाद मुझसे कहा गया इस आइडिया पर काम कीजिए. ये बुश हाउस में ही संभव था.बड़े आइडिया पर फैसला लिफ्ट में लिया जाता था. खबर होनी चाहिए मौका ज़रुर मिलेगा.

ब्राजी़ल, तुर्की, यूक्रेन और सोमालिया और पाकिस्तान के जो साथी बुश हाउस में काम करने के दौरान दोस्त बने थे. वो आज भी हैं. कुछ ने पत्रकारिता छोड़ दी लेकिन कल ही रात किसी ने फोन किया और कहा यार आज मन अच्छा नहीं लग रहा है बुश हाउस जाऊंगा. मेरे मुंह से इतना ही निकला...वहां खड़े होकर मुझे भी याद करना.

वंदना

मुझे याद है वहाँ का पहला दिन... बुश हाउस के अंदर कदम रखने से पहले ही इतिहास में डूबी इसकी विशालकाय इमारत ने मेरे कदम रोक लिए थे.

कहने को तो हम बुश हाउस में बीबीसी हिंदी सेवा के लिए काम करते थे लेकिन वहाँ रहते हुए यही लगता है कि आप ‘मिनी वर्ल्ड’ या ‘मिनी संयुक्त राष्ट्र’ में हों.

एशिया, अफ्रीका, लातिन अमरीका ...न जाने कहाँ कहाँ की भाषाओं- संस्कृतियों का घालमेल होता है वहाँ.

एक बार लिफ्ट में आते हुए हम हिंदी में हँसी ठठोला कर रहे थे..सामने बीबीसी में ही काम करने वाले कोई यूरोपीय खड़ा था. उसने ठेठ हिंदी में जवाब दिया. एक मिनट के लिए मेरा मुँह खुला का खुला रह गया..उसने कहा बुश हाउस में रहते रहते वो इतनी हिंदी तो सीख ही गया है.

वहाँ की दोस्तियाँ भी गजब होती थी. जब मैं लंदन में नई थी तो खाना बनाने की दिक्कत थी. रवांडा की मेरी एक दोस्त ने पता नहीं कब देख लिया कि रोटी बनाने के लिए मुझे बेलन की जरूरत है और उसने मुझे बेलन गिफ्ट किया...बहुत ही प्यारी भेंट थी वो.

लंदन में घिरे काले बादलों के बीच बुश हाउस से पास की थेम्स नदी तक की सैर दिन की थकान के बाद मन को तरो ताजा कर जाती थी.

अब दिल्ली कार्यालय के बाहर मॉनसून की बारिश की बूँदों के बीच खड़े होकर मन आज भी बुश हाउस की यादों से सराबोर है.....अलविदा.