ब्रिटेन में कालों का लंबा इतिहास

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Image caption हेनरी सप्तम और हेनरी अष्टम के बिगुल वादकों में एक काला बिगुल वादक भी था

ब्रिटेन की सड़कों पर चलते हुए आपको दुनिया के अलग अलग देशों से आए अलग अलग नस्लों के लोग सड़कों पर घूमते मिल जायेगें.

आम धारणा है कि ब्रिटेन में अश्वेत नीग्रो लोग कैरेबियाई देशों से 1948 के बाद आए, बांग्लादेशी 1971 की लड़ाई के बाद आए और युगांडा के एशियाई 1972 में तानाशाह ईदी अमीन द्वारा देश निकाला दे देने के बाद ब्रिटेन आए. पर शोध से पता लगता है कि ब्रिटेन में दुनिया भर की अलग अलग नस्लों से लोग शताब्दियों से रह रहे हैं.

सत्रहवीं शताब्दी में शेक्सपीयर के ज़माने में भी ब्रिटेन की सड़कों पर घूमते हुए आपको बंगाली या काले लोग मिल सकते थे.

पर उनकी तादाद आज जितनी नहीं थी. जिन लोगों ने पहले कभी अश्वेत को नहीं देखा था उनमे से कई इन्हें देख कर आकर्षित होते थे, कई चिढ़ते थे.

पुराना दौर

पर काले या एशियाई मूल के लोग उस दौर में ब्रिटेन में गुलाम नहीं थे , हाँ वो समाज के सबसे ऊँचे तबकों में भी शामिल नहीं थे.

उस ज़माने में यह लोग ज़्यादातर घरों में नौकरियां करते थे या संगीतकार, कलाकार होते थे.

ब्रिटेन में रोमन काल में भी काले लोग होते थे लेकिन एक बहुत बड़ी तब्दीली आई 17वीं शतब्दी में महारानी एलिजाबेथ प्रथम के दौर में.

महारानी एलिजाबेथ के ज़माने के ब्रिटेन के पुराने अभिलेखों में झाँकने पर बहुत से काले लोगों की दास्तानें मिलती हैं.

शेक्सपीयर के कम से कम दो नाटकों में अहम् काले किरदार हैं. इस बात से जाहिर होता है कि उस ज़माने के लंदन में काले लोग समाज का हिस्सा थे.

अध्ययन से पता लगता है कि उस ज़माने में ज़्यादातर काले घरों में नौकरियां कर के या लोगों का मनोरंजन कर के अपना जीवन व्यतीत करते थे.

लंदन में काले लोगों के तादाद कुछ नहीं तो सैंकड़ों में तो रही ही होगी.

उदहारण के तौर पर पादरियों के रिकॉर्ड जाचने से पता लगता है कि साल 1599 में परसेंट ओलाव हार्ट स्ट्रीट पर जोहन कर्त्में नाम के एक सज्जन का ज़िक्र मिलता है जिन्होंने एक काली महिला जो की नौकर थी उसके साथ शादी कर ली.

कुछ समय बाद एक 'काले ईसाई' जेम्स कर ने मार्गरेट पर्सन नाम की एक श्वेत महिला के साथ ब्याह रचा लिया.

कालों की जिंदगी

लंदन के चर्चों के इतिहास को देखने से पता लगता है कि 16वीं शताब्दी में भी कई काले लोग शहर के अलग अलग इलाकों में बसते थे.

कुछ कागजातों पर नज़र डालने से पता लगा कि कुछ कालों को नौकर होने के बावजूद बहुत ही सम्मान के साथ बड़े अमीर लोगों की तरफ़ दफनाया गया और ख़र्च उनके मालिकों ने उठाया.

पर ऐसा नहीं था कि हर काले की जिंदगी लंदन में आसान थी.

कई काली महिलायें कई और श्वेत महिलाओं के साथ वैश्यालय में काम करने को मजबूर थीं.

यूँ तो काले लोगों के लंदन में रहने पर ब्रितानी सरकार को कोई आपत्ती नहीं थी लेकिन साल 1600 में उनकी संख्या में अचानक इजाफा होने के बाद हालात बदल गए.

दरअसल स्पेन से लड़ाई के बाद ब्रिटेन ने हमला कर के बहुत से स्पेन के जहाज़ों पर बंदी काले गुलामों को मुक्त कराया और उनमे से बहुत से ब्रिटेन आ गए.

अट्ठारहवीं शताब्दी में इन काले लोगों के साथ बहुत बड़ी संख्या में पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) के लोग भी जुड़ गए.

इतिहासकारों को अब तक कोई एशियाई लोगों के द्वारा लिखा हुआ वृतांत नहीं मिला है.

लेकिन यह तय है कि ब्रिटेन के इतिहास में काले और एशियाई लोगों की भूमिका कोई नई नहीं है.

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