यमन में भूख से बिलखते बच्चे

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Image caption यमन में रोज़ाना एक करोड़ लोग भूखे सोने को मजबूर हैं.

अरब देशों में सबसे ग़रीब माने जाने वाले यमन में लाखों लोग भूखे सोने को मजबूर हो रहे हैं. इस कारण संयुक्त राष्ट्र संघ और कई मानवाधिकार संगठन यमन को मदद देने के लिए अपील करने की तैयारी कर रहे हैं.

यमन के हुदैयदा शहर में पांच में से तीन बच्चे कुपोषण का शिकार हैं.

यहां की एक महिला समीरा अपने बेटे के बारे में बताते हुए रो पड़ती है. दरअसल दो हफ्ते पहले समीरा के चार साल के बेटे तलाल की मौत हो गई. उसका वज़न सिर्फ चार किलो था.

समीरा को अपनी बाकी संतानों की सेहत का डर लगा रहता है. बच्चे रोटी दूध में या पानी में डुबा कर खा रहे हैं जिसकी वजह से वो बेहद कमज़ोर हो गए हैं. समीरा को डर है कि उसकी बेटी इतनी कमजोर हो गई है कि कहीं खांसी से ही न मर जाए.

बच्चों की खराब सेहत से सिर्फ समीरा ही नहीं जूझ रही है. समीरा की पड़ोसन फातमा के दो बच्चों की मौत हो चुकी है.

फातमा के बाकी बच्चे उसके साथ है. दो साल का लड़का इतना कमज़ोर है कि वो बैठ नहीं सकता. गोद में छोटी बच्ची है जिसका चेहरा सिर्फ हड्डियों से भरा है और इतनी झुर्रियां है कि वो बच्ची की बजाए एक बूढ़ी औरत नज़र आती है.

संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि दुनिया में खाद्य पदार्थ के बढ़ते दाम, घरेलू राजनैतिक संकट और कमज़ोर सरकार मुख्य वजह हैं जिनके कारण यमन में रोजाना एक करोड़ लोग भूखे सोने को मजबूर है.

मदद की कमी

यमन में कुपोषण के इलाज के लिए सहायता करने वाली संस्थाएं प्लंपनट नाम का पेस्ट बांट रहे हैं. लेकिन ये भी जरूरत के मुताबिक कम पड़ने लगी है.

हुदैदा शहर के एक स्वास्थ्य केंद्र में भी डॉक्टर दवाईयों की कमी महसूस कर रहे हैं.

डॉक्टर ज़ारेग़ी एक दिन में लगभग तीस बच्चों को देखते हैं. उनका कहना है, "ज़रूरत के हिसाब से दवा, स्टाफ और दूसरे संसाधनों की बड़ी कमी है. बड़ी संख्या में बच्चों को इलाज की ज़रूरत है लेकिन हम उनका ख्याल नहीं रख पा रहे. जैसे इस बच्चे को देखिए.. ये मर सकता है."

बाज़ार में खाने की चीज़ों की कमी नहीं है लेकिन यहां पर लोगों के पास पर्याप्त पैसा नहीं है. इसी वजह से सहायता देने वाली संस्था ऑक्सफैम ने जरूरतमंद लोगों को पैसा देने का फैसला लिया है.

डर

अलजूबरीशा नाम के एक सूदूर गांव में तपती गर्मी के बीच कई लोग एक लंबी कतार लगाए मिलने वाली छोटी रकम का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं. लेकिन यमन के लिए मदद इकट्ठा करने में सभी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को दिक्कतें आ रही है. ऑक्सफै़म भी अपने निर्धारित लक्ष्य के सिर्फ़ दस प्रतिशत लोगों को मदद दे पा रही है

ऑक्सफ़ैम की एक अधिकारी कैरौलीन ग्लक कहती हैं, "मुझे डर है हम हर किसी की मदद नहीं कर सकते. लोग हमसे उम्मीद लगाए बैठे हैं, ये उनके लिए दिल तोड़ देने जैसी बात है लेकिन हम कुछ नहीं कर सकते. शायद भविष्य में हम ज्यादा लोगों की मदद कर पाएं."

यमन में जरूरत ज्यादा है और मदद कम. डर है कि जब तक मदद पंहुचे तब तक हज़ारों बच्चों बहुत देर न हो जाए.

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