आतंकवाद: सुरक्षा बढ़ाने के बजाए समाज को और आजादी

पिछले साल 22 जुलाई को नॉर्वे के यूटोया द्वीप में नवयुवकों और युवतियों पर एंडर्स ब्रेविक ने अंधाधुंध गोलीबारी की थी जिसमें 77 लोग मारे गए थे.

ब्रेविक की अदालती सुनवाई अब खत्म हो चुकी है और अगस्त में अदालत बताएगी कि उन्हें लंबे कारावास की सज़ा सुनाई जाए या फिर मनोरोग केंद्र में इलाज के लिए रखा जाए.

लेकिन जिस तरह नॉर्वे ने इस आतंकवादी हमले का सामना किया वो दुनिया के दूसरे देशों से काफी अलग रहा है. सुरक्षा के इंतजाम बढ़ाने के बजाय नॉर्वे ने समाज को और आजादी देने पर ज़ोर दिया.

पिछले साल के हमले के बाद पूरा देश शोक में डूब गया था. राजधानी ओस्लो में एक सरकारी दफ्तर के बाहर कार बम के फटने से आठ और लोगों की मौत हो गई थी. ये नॉर्वे के लिए 9/11 जैसा था.

लेकिन उन शुरुआती दिनों में भी प्रधानमंत्री जेंस स्टोल्टनबर्ग ने कहा कि वो इस आतंकवादी हमले से दूसरे देशों से बिल्कुल अलग तरह से निपटेंगे.

'सफलता'

उन्होंने कहा था, "मैं ये निश्चित करूंगा की हम ऐसा कुछ भी नहीं करेंगे जिससे हमारे खुलेपन, लोकतंत्र और सहभागीदारिता की मूल भावना बदल जाए."

आज एक साल बाद लगता है कि प्रधानमंत्री इस कार्य में सफल रहे हैं

ओस्लो की सड़कों पर अतिरिक्त सुरक्षा के कोई निशान नहीं है. निगरानी के लिए सीसीटीवी कैमरे आज भी कम दिखते हैं. यहां तक कि संसद भवन का मुख्य द्वार भी खुला है और वहां कोई चौकीदार नहीं है, ये आश्चर्य की बात है.

संसद भवन के अंदर लेबर पार्टी की सदस्य लीसा क्रिस्टोफरसेन मिली, जो कहती है कि नॉर्वे के निवासी अपने मूल अधिकार और आजादी का बलिदान नहीं करेंगें.

वो कहती हैं, "लोग उस तरह के कानून नही चाहते हैं जो उनकी आजादी को कम करे. वो सुरक्षा और निगरानी के ऐसे अतिरिक्त नियम और कानून नहीं चाहते जिससे उनके अधिकार कम हो. जैसे अगर संसद भवन में घुसने की ही बात करूं तो आज भी अंदर आना आसान है मैं उम्मीद करती हूं कि आगे भी ऐसा ही रहेगा."

लेकिन एंडर्स ब्रेविक की सुनवाई के दौरान ही आतंकवाद के प्रति नॉर्वे का खास रुख पूरी तरह से उजागर हो गया था.

समर्थन

अदालत में मारे गए लोगों के परिजनों के अलावा पूरी दुनिया की मीडिया मौजूद थी.

मीडिया ने ब्रेविक की हर बात लोगों को बताई. ब्रेविक को कई दिनों तक बोलने का मौका मिला जिसमें उन्होंने नव-नाज़ीवाद और मुसलमानों के विरुद्ध अपनी विचारधारा रखी.

ब्रेविक ऐसा ही करना चाहते थे जिससे कि उनकी विचारधारा फैले. लेकिन इसके बावजूद हमले में अपनी बेटी खो चुकी एंड्रीन कहती हैं कि ये खुलापन सही था. ऐसा मानने वाली एंड्रीन अकेली नहीं है.

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Image caption हमले में 77 लोग मारे गए थे

क्रिस्टीन बोलैंड की बेटी भी हमले में घायल हुई थी. क्रिस्टीन कहती हैं, "ये बहुत जरूरी था कि जो भी हो वो कानून के मुताबिक हो. हम एक लोकतंत्र में रहते हैं, हमें अपने मूल्यों की रक्षा करनी है. इसलिए हमने मांग रखी कि सुनवाई अच्छे तरीके से हो, नियम और कानून का सम्मान किया जाए और उसे उस तरह पूरा किया जाए जो न्यायसंगत हो."

नॉर्वे के कुछ लोग ब्रेविक को बोलने का ये मौका देने पर नाराज़ भी थे.

लेकिन एक प्रमुख वकील कैटो शियोज़ का कहना है कि इसके बावजूद ब्रेविक अपनी विचारधारा से लोगों को प्रभावित नहीं कर सके.

वो कहते हैं, "ब्रेविक ने उग्र दक्षिणपंथी विचारधारा का नुकसान ज्यादा किया है और फायदा कम. उनकी बातों का समर्थन नॉर्वे में पहले से कम हुआ है."

तो क्या नॉर्वे ने आतंकवाद से निपटने के लिए नए आयाम गढ़े है? एक ऐसा तरीका जो अमरीका जैसे देशों के बिल्कुल विपरीत है जहां सुरक्षा के कड़े से कड़े इंतजाम किए गए हैं और यहां तक कि यातना देना भी एक तरह से मान्य हो गया है?

यान एगलेंट नॉर्वे की सरकार में बड़ी भूमिका निभा चुके हैं और फिलहाल मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच के उपाध्यक्ष हैं. उनका कहना है, " आतंकवाद से लड़ने का एकमात्र तरीका है कि हम दिखाए कि हम उनसे बेहतर हैं. आतंकवादियों का काम भय और आतंक फैलाना है जिससे हम अपने आदर्शों को भूल जाएं. लेकिन ऐसा नहीं करके हम उन्हें जीतने नहीं देंगे."

ऐसा लगता है कि नियम और कानून को अच्छी तरह मानकर और ब्रेविक को उनके पूरे अधिकार देकर नॉर्वे ने ब्रेविक के महत्व को कम करने में सफलता पाई है.

ये भी एक तथ्य है कि ज्यादा बड़े स्तर पर आतंकवाद का सामना कर रहा है जबकि ब्रेविक ने अकेले जंग छेड़ी थी.

लेकिन इसके बावजूद नॉ़र्वे ने दुनिया के दूसरे देशों को सोचने पर मजबूर ज़रूर किया है.

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