अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में 300 अरब रुपए का खर्च!

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एक अनुमान के मुताबिक इस साल नबंवर में होने वाले अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव में लगभग 300 अरब रुपए खर्च होंगे.

एक शोध संस्था 'सेंटर फॉर रिस्पॉंसिव पॉलिटिक्स' ने अपने नए आंकड़ों में कहा है कि इस चुनाव में 5.8 अरब डॉलर का खर्च आएगा जो कि अफ्रीकी देश मलावी के सकल घरेलू उत्पाद से भी ज्यादा है.

सवाल ये है कि आखिर इतना खर्च क्यों?

आलू चिप्स पर चुनाव से ज्यादा खर्च

अगर ब्रिटेन के चुनावी खर्चे से तुलना की जाए तो वहां दो साल पहले के आम चुनाव में सिर्फ 4.9 करोड़ डॉलर खर्च हुए थे जो कि अमरीकी खर्चे से 120 गुना कम है.

अमरीकी चुनाव आयोग के पूर्व अध्यक्ष माइकल टोनर का कहना है, "मुझे नहीं लगता कि ज्यादा खर्च होता है. अमरीका की राजनीति के लिए ये बहुत अच्छी बात है. ये एक मजबूत चुनावी दंगल का सूचक है, यहां के चुनाव में बहुत कुछ दांव पर लगा रहता है."

Image caption आलू चिप्स पर पिछला साल 7 अरब डॉलर खर्च हुए

टोनर कहते हैं कि अगर अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका के सालाना खर्चे से तुलना की जाए तो चुनाव का खर्चा बहुत कम है.

टोनर कहते हैं, "अमरीका वासियों ने पिछले साल आलू चिप्स पर लगभग 7 अरब डॉलर खर्च कर दिए. क्या आज़ाद दुनिया के नेता को ये हक नहीं कि वो चुनाव पर इतना भी खर्च कर सके?"

टीवी पर चुनावी अभियान

अमरीका के चुनाव में खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा टीवी पर दिखाए जाने वाले चुनावी अभियान पर खर्च होता है. ये लगभग पूरे व्यय का आधा हिस्सा होता है. थोड़ा खर्च ऑनलाइन विज्ञापनों पर भी होता है.

लेकिन इन चुनावी अभियानों को लेकर लोगों में असंतोष भी रहता है क्योंकि ये बेहद ज़्यादा दिखाया जाता है.

चुनाव में वोट देने वाली एक महिला लोएज़ेल कहती हैं, "जब भी चुनावी अभियान आता है मैं चैनल बदल देती हूं. वो जो कहते हैं उससे मेरे सामान्य ज्ञान में कोई इज़ाफा़ नहीं होता, वो तो बस एक दूसरे की निंदा करने में लगे रहते है्."

वो आगे कहती हैं, "मुझे तो इन चुनावी महीनों से डर लगता है."

खर्च पर लगाम

माइकल टोनर कहते हैं कि खर्च पर लगाम लगाने के लिए संवैधानिक संशोधन की ज़रूरत पड़ सकती है और इसकी संभावना बहुत कम है.

चुनावी अभियान के खर्च को एक सीमा में रखने के लिए सरकार की ओर से 'जन वित्त प्रणाली' लागू की गई है, लेकिन इस बार दोनों ही उम्मीदवारों ने खुद को उस बंधन से दूर रखा है.

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Image caption ओबामा ने 2008 के चुनाव में खर्च की सीमा मानने से इंकार किया था.

वर्ष 2008 के चुनाव में ओबामा पहले प्रत्याशी थे जिन्होंने इस प्रणाली से बाहर रहने का विकल्प चुना था. उनकी जीत में बड़ा हाथ उनके अभियान पर बेहिसाब पैसा बहाना भी माना जाता है.

खर्च की सीमा नहीं होने से उम्मीदवारों का ध्यान पैसा इकट्ठा करने के लिए 'फंड रेज़िंग' कार्यक्रमों पर ज्यादा टिका रहता है जिसकी वजह से आर्थिक रूप से कम संपन्न वोटरों के लिए उनेक पास ज्यादा वक्त नहीं होता है.

असर

लेकिन कई सामाजिक विश्लेषक मानते हैं कि वोटरों के फैसले को चुनावी अभियान से बदलने में बहुत कम सफलता मिलती है. मतदाता बड़े मुद्दों के बल पर अपना फैसला सुनाता है, जैसे कि अर्थव्यवस्था की हालत एक बड़ा कारक है.

लेकिन आने वाले चुनाव में एक छोटा बदलाव भी हार-जीत का अंतर साबित कर सकता है.

एनबर्ग पब्लिक पॉलिसी सेंटर की कैथलीन हल जेम्स कहती हैं, "विज्ञापनों से उन लोगों को लुभाने की कोशिश की जाती है जिन्होंने मन नहीं बनाया है कि किसको वोट देंगे. लेकिन पैसा सचमुच बहुत ज़रूरी है. अगर आप पैसा खर्च नहीं करेंगे तो मान लीजिए कि आप चुनावी दंगल से बाहर हो गए हैं."

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