क्या-क्या झेलना होगा टीम अन्ना को?

अन्ना
Image caption अन्ना हज़ारे पिछले साल अगस्त महीने में दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन किया था.

अन्ना हज़ारे और उनके साथ जुड़े नागरिक समाज के लोगों ने अपने आंदोलन की शुरुआत देश और समाज में पहले से स्थापित राजनीतिक व्यवस्था के विरोध से शुरु की थी, लेकिन अब ये लोग उसी राजनीतिक ढांचे का हिस्सा बनने जा रहे हैं.

इससे ये साबित होता है राजनीतिक व्यवस्था का विरोध करके, उसपर दबाव बनाकर, बदलाव या सुधार लाने की अन्ना टीम की जो रणनीति रही है वो कारगर साबित नहीं हुई.

अन्ना टीम का अगला कदम खुद राजनीति में उतरने का फैसला है. उनके मुताबिक वे खुद राजनीति करेंगे और परिवर्तन लाएंगे. लेकिन इससे जो दबाव बनाने की राजनीति करने की कोशिश हो रही थी उसका विकल्प पूरी तरह से खत्म हो गया.

राजनीति अपने आप एक अलग लड़ाई का मैदान है. जहां अलग किस्म की मजबूरियां, सीमाएं और संभावनाएं होती हैं. अगर सिविल सोसायटी के सदस्य राजनीति के अखाड़े में उतरते हैं तो उनके फैसलों पर भी इन बातों का असर होगा.

क्योंकि किसी भी संसदीय लोकतंत्र में एक राजनीतिक पार्टी की कितनी दुर्गति होती है ये किसी से छिपा नहीं है.

जनता का साथ और उनका वोट पाने के लिए कई तरह के समझौते करने होते हैं जो इनके विचारों और सिद्धातों से मेल नहीं खाती है.

ऐसी स्थिती में टीम अन्ना के लिए आगे का रास्ता आसान नहीं होगा.

मुश्किल रास्ता

जब टीम अन्ना के सदस्य सक्रिय राजनीति में नहीं हैं तब उन्हें हवाई किराए से लेकर इनकम टैक्स भरने तक के मुद्दे पर घेरा जाता है, इसलिए जब ये पूरी तरह से राजनीति में आ जाएंगे तब इन्हें क्या-क्या झेलना पड़ेगा इसका इन्हें अंदाज़ा नहीं है.

ऐसे में मुझे लगता है कि टीम अन्ना के पास ज्य़ादा विकल्प नहीं है. राजनीति में एक बार अगर ये चले जाते हैं तो इनके पास कोई विकल्प नहीं बचेगा और राजनीति के भीतर ये कितने सशक्त और सफल होते हैं ये देखना होगा.

अन्ना हज़ारे अगर किसी राजनीतिक का दल का भी गठन करते हैं तो भी वो पूरी तरह से शहरों पर क्रेंद्रित पार्टी होगी.

इनकी पार्टी का जनाधार वे लोग होंगे जो या तो नव-अभिजात्य वर्ग का हिस्सा हैं या वो मध्यम वर्ग होगा जो बाज़ार, वैश्वीकरण और उदारीकरण की उपज हैं.

और समाज का उपेक्षित, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग कभी भी इनसे जुड़ नहीं पाएगा.

हालांकि एक राजनीतिक दल का रुप लेने के बाद ये लोग खुद को एक धर्मनिरपेक्ष पार्टी की तरह दिखाने की कोशिश करेंगे लेकिन इनकी भाषा में अभी से भाजपा की भावना नज़र आने लगी है.

ऐसे में जब दो राजनीतिक दल एक भाषा बोलेंगे तो देश में एक अलग किस्म का राजनीतिक अभाव पैदा होगा.

कोई भी पार्टी जब आंदोलन का रास्ता छोड़कर संसदीय राजनीति का हिस्सा बनती है तो उसके धक्का देने की क्षमता कम हो जाती है. विनोद मिश्र के नेतृत्व वाली सीपीआईएमएल के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था.

इस तरह से ये लोग एक दुष्चक्र में फंस जाएंगे जहां तमाम विषमताएं इनका इंतज़ार कर रही हैं.

छद्म आंदोलन

जिस तरह से लेखिका और कार्यकर्ता अरुंधती रॉय का कहना है, ''अन्ना टीम उपर से काफी नैतिकता-वादी दिखने की कोशिश करती है लेकिन इसके पीछे एक भरा-पूरा तंत्र काम कर रहा है.''

अन्ना समूह को तमाम गैर-सरकारी संगठन, पूंजीवादी ताकतें, नया-नया उभरा हुआ अभिजात्य और मध्य वर्ग जिन्हें टैक्स भरना पड़ता है उनकी तरफ से आर्थिक मदद मिल रही है, जिससे इन्हें कभी भी पैसों की कमी नहीं होगी.

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Image caption इस साल 27 जुलाई से शुरु हुए अनशन के शुरुआती दिनों में लोगों की भीड़ में काफी कमी नज़र आई.

इन्हें दिक्कत तब आएगी जब बाज़ार-रूपी शेर इन्हें खत्म कर देगा क्योंकि बाज़ार ही वो ताकत है जिसने देश के सभी राजनैतिक दलों को शक्तिहीन कर रखा है.

देश में इस तरह के वोटरों, नेताओं और बुद्धिजीवियों का एक पूरा समूह है जो ये चाहता है कि हमारे देश में बाज़ार उन्मुख अर्थव्यवस्था आगे बढ़े. एक समय ऐसा भी आएगा कि कांग्रेस, भाजपा और अन्ना के लोग सभी इसके पक्ष में लड़ेंगे.

इस पूरी व्यवस्था का सीधा फायदा बीएसपी, एसपी, एआईएडीएमके, डीएमके और तृणमूल जैसी क्षेत्रीय पार्टियों को होगा जिनके वोटर अलग हैं और कांग्रेस, भाजपा और अन्ना की पार्टी तीनों ही एक वोट-बैंक पर सेंध लगाने की कोशश करेंगे.

इस आंदोलन का सच कुछ समय बाद खुलकर सामने आएगा जब लोगों को ये पता चलेगा कि ये आंदोलन किसी भी तरह से सिर्फ एक ईमानदार कोशिश नहीं है बल्कि ये कहीं ना कहीं अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश है.

ये सच है कि भ्रष्टाचार आज जनतंत्र का एक सर्वव्यापी तथ्य है. गांव की गरीब जनता भी इससे पीड़ित है, लेकिन जब कोई नेता भ्रष्टाचार को आधार बनाकर राजनीति करने करने की कोशिश करता है तब वहां सिर्फ एक संदेश नहीं बल्कि कई सारे रिश्ते और समीकरण काम करते हैं.

अन्ना और उनके सहयोगी जिस शहरी वर्ग से आते हैं ये उन्हीं लोगों को पसंद आते हैं, गांव की जनता इनसे खुद को जोड़कर नहीं देख पाती है.

अब तक इस समूह की भूमिका एक उत्प्रेरक की रही है लेकिन संसद में पहुंचने के बाद ये एक पक्षकार हो जाएंगे. संसद में ये इस बहस को मज़बूत ज़रूर कर सकते हैं, दबाव भी बना सकते हैं लेकिन सड़क के आंदोलन को नेतृत्व देने का काम कोई और व्यक्ति या समूह ही दे सकता है, अन्ना टीम के सदस्य नहीं.

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