ओलंपिक: कहीं तारीफ तो कहीं बुराई

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Image caption लंदन में तीसरी बार ओलंपिक खेलों का आयोजन हुआ

लंदन ओलंपिक में दुनिया भर के 204 देशों ने भाग लिया, इसलिए इसे सही मानो में एक वैश्विक घटना कहा जा सकता है.

लेकिन दुनिया भर से आए मीडिया के मेहमानों का दुनिया के सबसे बड़े खेल आयोजन के बारे में क्या नज़रिया है और उनकी नज़र में लंदन की क्या छवि उभर कर सामने आई है ?

'रोमांटिक महानगर'

रूस अगले साल सोची में शीत ओलंपिक खेलों की मेज़बानी कर रहा है और वामपंथी दैनिक ट्रूड का संवाददाता 'रोमांटिक महानगर' लंदन से ज्यादा प्रभावित हुआ है न कि इसके खाने के स्तर से.

बेशक लंदन बहुत फ़ैशनेबल नगर है लेकिन यहाँ के आम लोग खाने को अधिक महत्व नहीं देते. वह अपने बच्चों को चिप्स,पीत्ज़ा,टोस्ट और सेंडविच खिलाते हैं और खुद भी खराब स्वाद वाली मछली और यही चीजे खाते हैं.

वो कहते हैं कि अगर वहाँ पर भारतीय और चीनी खाना नहीं मिलता तो न जाने यहाँ के लोगों का क्या होता.

'लंदन एक बेहतरीन जगह'

इसराइल के ओरी ओज़ान कहते हैं, "एक सप्ताह का समय जब से मैं लंदन में हूँ, ब्रितानियों के मोह पाश में पड़ने के लिए काफी है."

वो बताते हैं कि यहाँ आने से पहले उनकी धारणा थी कि यहाँ लोग अहंकारी, चिढ़ पैदा करने वाले और भोले हैं.

लेकिन उनकी राय बाद में बदल गई है. वे कहते हैं, "सिर्फ उनके भोले होने के बारे में ही मेरी राय सही निकली और इसका मुझे इसका फ़ायदा भी हुआ और मुझे खेलों में बेहतर सीटें पाने में मदद मिली."

उनका मानना है कि खेलों के लिए काम कर रहे हज़ारों स्वयंसेवक शिष्ट और शालीन थे.

ओरी कहते हैं कि स्टेडियम में सब कुछ व्यवस्थित था खेलों के लिए उनका प्रेम साफ दिखाई देता है और खेलों में जितना उन्होंने निवेश किया है उसके परिणाम भी आए हैं.

खाली शहर?

कई विदेशी पर्यवेक्षकों की तरह भारत के इकॉनॉमिक टाइम्स को इस बात पर आश्चर्य है यहाँ से लोग चले कहाँ चले गए?

अख़बार लिखता है, "खाली सड़कें, खाली रेस्तरॉं, शाँतिपूर्ण हवाई अड्डे देख कर यह लगता ही नहीं था कि यहीं पर दुनिया का सबसे बड़ा खेल आयोजन हो रहा है. नि:संदेह खेलों को करोड़ों दर्शक टेलीविजन पर देख रहे हैं लेकिन इससे यह धारणा जरूर टूटी है कि ओलंपिक की मेज़बानी करने से पर्यटन को बढ़ावा मिलता है."

वहीं इंडियन एक्सप्रेस का कहना है कि ‘लंदन वासियों की मुस्कान ही थमने का नाम नहीं ले रही. सूरज जम कर चमक रहा है. टीम ग्रेट ब्रिटेन को तो इतने पदक मिल गए हैं जितने शायद पहले कभी नहीं मिले. लेकिन उन्हें ज्यादा खुशी हुई क्रिकेट के प्रतिद्वंदी ऑस्ट्रेलिया के नीचे जाने पर.

चीन की नाराज़गी

चीन को अपने प्रदर्शन पर खुश होना चाहिए लेकिन जिस तरह से उसके युवा तैराक ये शिवेन के मामले को ब्रिटिश मीडिया ने तूल दिया, चीनी अखबारों ने उसे पसंद नहीं किया.

वैसे चीनी मीडिया को यह बात पसंद आई कि ब्रिटिश जनता ने आमतौर से उनके एथलीटों का समर्थन किया है चाहे उन्होंने स्वर्ण पदक जीता हो या न जीता हो.

कुछ चीनी आलोचकों ने कहा है कि हाल के समय में यह सबसे बुरी तरह आयोजित किए गए खेल थे.

लिउ शिह चुंग ने ताइवान टाइम्स में लिखा, "ब्रिटेन पहले की तरह ताकतवर और समृद्ध भले ही न रहा हो लेकिन उसने ओलंपिक खेलों के जरिए अपने आदर्शों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित जरूर किया है. लंदन के खेल ब्रिटेन के लिए एक बड़ी राजनीतिक और विदेश नीति की उपलब्धियाँ हैं."

सबसे ग्रीन ओलंपिक

ईरान की छात्र समाचार एजेंसी का कहना है कि लंदन खेल पिछले ओलंपिक खेलों की तुलना में सबसे अधिक ‘ग्रीन’ खेल हैं क्यों कि यहाँ पर पर्यावरण के अनुकूल उपकरणों का इस्तेमाल किया किया गया है.

रूस की पोल वॉल्टर और कास्य पदक विजेता येलेना इसिनबायेवा ने आरबीके टीवी को बताया कि ब्रिटेन के लोग ओलंपिक खेलों में रुचि ही नहीं ले रहे थे.

उन्होंने कहा, "अगर आप ओलंपिक गाँव से बाहर निकलें तो आपको आभास होगा जैसे कुछ हो ही नहीं रहा. बहुत से लोगों को यह अंदाजा ही नहीं हैं कि ओलंपिक खेलों का मतलब क्या है और यह उनके शहर में हो भी रहे हैं या नहीं. वहाँ पर उल्लास की कोई भावना नहीं दिखाई देती."

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