ओलंपिक पहेली: बूझो तो जानें

 रविवार, 12 अगस्त, 2012 को 09:09 IST तक के समाचार
  • ओलंपिक्स

    रेस ट्रैक पर उल्टी दिशा में क्यों दौड़ते हैं धावक?

    एक ऐसी गलत धारणा बनी हुई है कि ओलंपिक खेलों में घड़ी की उल्टी दिशा की तरफ दौड़ने की परंपरा पुरातन ग्रीस से चली आ रही है, लेकिन ऐसा नहीं है.

    ग्रीस के इतिहास के बारे में जानकारी रखने वाले यूनिवर्सिटी ऑफ केंब्रिज के प्रोफेसर पॉल कार्टलेज के मुताबिक प्राचीन ग्रीस में ओलंपिक के दौरान धावकों के लिए बनाए गए रेस ट्रैक और घोड़ों के ट्रैक दोनों ही सीधे हुआ करते थे.

    प्राचीन ओलंपिक के दौरान 1896, 1906, 1900, 1904 तक रेस ट्रैक सीधे हुआ करते थे जिसे बाद में 1908 ओलंपिक के दौरान बायीं हाथ की तरफ कर दिया गया ताकि शाही परिवार इस कार्यक्रम का बेहतर नज़ारा देख सकें.

    बीसवीं सदी की शुरुआत में कई देशों ने अमरीका का अनुसरण करते हुए घड़ी की उल्टी दिशा में दौड़ना शुरु कर दिया था.

    जिसके बाद ओलंपिक कमेटी पर इसे प्रमाणिक करने का दबाव बढ़ता चला गया था.

    अंत में 1950 और 1954 के दौरान चार मिनट में एक मील की दूरी तय करने की रेस को उल्टी दिशा में दौड़ाया गया था.

    कई खिलाड़ियो का ये मानना है कि पृथ्वी के लगातार घूमते रहने के कारण, धावकों के लिए उल्टी दिशा में उत्तरी गोलाकार में तेज़ दौड़ना ज्यादा आसान हो जाता है.

  • ओलंपिक्स

    ओलंपिक में क्यों छाई है फ्रेंच भाषा ?

    ओलंपिक के उदघाटन कार्यक्रम के दौरान दिए गए सभी भाषण पहले फ्रेंच भाषा में दिए गए फिर अंग्रेज़ी में.

    आखिर ऐसा क्यों ? क्या इसलिए फ्रेंच भाषा को अभी भी राजनयिकों की भाषा कही जाती है. ऐसा माना जाता है कि कई सदियों तक दुनियाभर के राजनयिक फ्रेंच भाषा ही बोलते रहे हैं.

    फ्रेंच भाषा ओलंपिक आंदोलन की पहली भाषा है लेकिन आज फ्रेंच के साथ-साथ अंग्रेज़ी को भी ओलंपिक की आधिकारिक भाषा होना का गौरव हासिल है.

    आधिकारिक कार्यक्रमों की शुरुआत हमेशा फ्रेंच से होती है, जिसके बाद अंग्रेज़ी और मेज़बान देश की भाषा का प्रयोग होता है.

  • ओलंपिक्स

    नारंगी रंग में रंगे नीदरलैंड्स के प्रशंसक.

    ओलंपिक खेलों के दौरान एक देश ऐसा भी था जिसकी मौजूदगी बड़ी ही आसानी महसूस की जा सकती थी.

    ये देश था नीदरलैंड्स जिसके खिलाड़ी और प्रशंसक हर जगह सर से पांव तक नारंगी रंग में रंगे-पुते नज़र आ रहे थे.

    नारंगी रंग में डूबे ये प्रशंसकों सिर्फ ओलंपिक पार्क ही नहीं बल्कि पूरे लंदन शहर में हर जगह नज़र आ रहे थे.

    आमतौर पर जब नीदरलैंड में खेल का कोई आयोजन होता है तो वहां की सड़कें, गाड़ियां और दुकानें नारंगी रंग में रंगे होते हैं लेकिन यहां ये प्रशंसक खुद को नारंगी रंग में रंगे हुए थे.

  • ओलंपिक्स

    ब्रिटेन की टीम नाम का ग्रेट ब्रिटेन क्यों टीम यूके क्यों नहीं?

    लंदन ओलंपिक में ब्रिटेन के शानदार प्रदर्शन से पूरे देश में यूं तो जश्न का माहौल है लेकिन फिर भी यहां कुछ लोग ऐसे हैं जो ब्रिटेन की टीम की नामावली से खुश नहीं है.

    जीबी का मतलब ग्रेट ब्रिटेन होता है लेकिन इसमें उत्तरी आयरलैंड शामिल नहीं होता है.

    उत्तरी आयरलैंड के खेल मंत्री ग्रेगरी कैंपबेल ने साल 2009 में इस नाम को बदलने का प्रस्ताव रखा था लेकिन इसे नहीं माना गया.

    इस बार भी ओलंपिक खेलों के दौरान भी ब्रिटेन की टीम का नाम 'टीम जीबीएनआई' या 'टीम यूके' करने की सलाह दी गई थी जिसे ब्रिटिश ओलंपिक एसोसिएशन ने नकार दिया था.

  • ओलंपिक्स

    क्विक स्टांप

    ग्रेट ब्रिटेन का जो भी खिलाड़ी स्वर्ण पदक जीतता है. उनके शहर में उनके नाम पर एक पोस्टबॉक्स और एक स्टांप निकाला जाता है, जिसे सुनहरे रंग से पेंट कर दिया जाता है.

    इस बार जैसे ही नौका-चालक बेन-एंसिले ने जैसे ही नौकायान में स्वर्ण पदक जीता उसी वक्त उनके शहर में आठ शाही डाक डिजाइनर तैयार खड़े थे.

    वहां मौजूद फोटोग्राफरों ने फटाफट एंसिले की कुछ बेहतरीन तस्वीरें छांट कर इन डिजाइनरों को भेजी और उन लोगों ने तुरंत

    इन तस्वीरों को एडिट कर के स्टांप शीट पर चिपका दिया.

    इसके साथ ही वहां तैनात 90 शाही डाकपत्र ले जाने वाले ड्राइवरों ने अपनी गाड़ियों में रखकर इन्हें शहर के 500 से भी ज्यादा डाकघरों तक पहुंचाने का काम किया.

  • ओलंपिक्स

    ओलंपिक रिंग के शक्ल के टैटू.

    इस बार के ओलंपिक प्रतियोगिता के दौरान ओलंपिक रिंग की शक्ल के टैटू काफी लोकप्रिय रहे हैं.

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    इनकी लोकप्रियता का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि ये टैटू ना सिर्फ खिलाड़ियों के शरीर पर बल्कि खेल देखने आए दर्शकों के शरीर पर भी देखा जा सकता है.

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    खिलाड़ियों ने काले, हरे, लाल, गुलाबी हर रंग में ओलंपिक रिंग का टैटू अपने शरीर पर बनवा रखा था.

  • ओलंपिक्स

    मेडल चबाना

    क्या आप जानते हैं कि ओलंपिक खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाले खिलाड़ी फोटो खिंचवाने के समय अपने पदक को चबाते क्यों हैं ?

    ये ओलंपिक में की जाने वाली एक सालों पुरानी प्रथा है जिसके अनुसार खिलाड़ी इस भावभंगिमा का प्रदर्शन कर ये पता लगाने की कोशिश करते थे कि जो पदक उन्हें दिया गया है वो असल में सोने का है या नहीं.

    अगर पदक सचमुच में सोने का होगा तो दातों में हल्का से निशान छोड़ जाएगा.

    इस चलन की शुरुआत जस्ते या सीसे के नकली पदक के इस्तेमाल को रोकने के लिए शुरु हुआ था.

    एक स्वर्ण पदक में सोने की कुल मात्रा 1. 34% प्रतिशत होता है.

  • ओलंपिक्स

    गुलाबी रंग की धूम

    इस बार के ओलंपिक आयोजनों में गुलाबी रंग हर तरफ छाया रहा है.

    हालांकि कई खिलाड़ियों ने ब्लू, हरा और नारंगी रंग का भी इस्तेमाल किया है लेकिन इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि इस बार ओलंपिक का रंग गुलाबी था.

    इस आयोजन के दौरान ज़मीन पर खेले जाने वाला खेल जिमनास्ट हो या आसमान में खेले जाने वाला स्कीट शूटिंग हो, रंग हर तरफ गुलाबी ही था.

    गुलाबी रंग को दोस्ती, गर्मजोशी और सदभावना का रंग माना जाता है.

    ये सभी जानते हैं कि गुलाबी रंग का असर हमारी मानसिक अवस्था पर होता है, अगर ज्यादा समय तक किसी इस रंग के बीच रखा जाए तो वो शांत हो जाता है.

  • ओलंपिक्स

    कैमरे के सामने 'एक्शन'

    ओलंपिक में भाग लेने आए खिलाड़ी और एथलीट काफी दबाव में है. लेकिन जैसे ही खेल खत्म होता और खिलाड़ी रेस ट्रैक से बाहर होते हैं, वे कैमरा के सामने पोज़ देने से नहीं चूकते.

    रविवार को पुरुषों के 100 मीटर के फाइनल मुकाबले में जमैका के असाफा पॉवल ने कैमरे को तिरछी नज़र से देखते हुए आकर्षक पोज़ दिया तो जस्टिन गैटलिन ने मैदान में बैठे दर्शकों के सल्यूट किया.

    योहान ब्लेक ने कैमरे के सामने अपने पूरे शरीर को हिलाया तो उसैन बोल्ट अपने दोनों कानों को उंगलियों से बंदकर नृत्य किया और फिर बंदूक तानने के अपने चिरपरिचित अंदाज़ में नज़र आए.

  • ओलंपिक्स

    देशभक्ति से भरे नेल आर्ट

    लंदन ओलंपिक में युवा लड़कियों के बीच बिंदास नेल आर्ट काफी लोकप्रिय हो रहा है.

    2012 के इस आयोजन में युवा महिला खिलाड़ियों के बीच चाहे वो तैराक हों, निशानेबाज़ हो, टेनिस या वॉलीबॉल खिलाड़ी

    इन सभी को इन नेल पेंट का बिंदास तरीके से इस्तेमाल करते हुए देखा गया है.

    कई खिलाड़ियों के नेल पेंट में उनके देश के झंडों का भी चित्र बना हुआ है.

    कई महिला खिलाडि़यों ने माना कि एक दूसरे की नेल पेंट को देखकर उनके मन में ऐसा करने की इच्छा जगी और उन्होंने भी बाद में इसे आज़माया.

  • ओलंपिक्स

    टेप की जीत

    हमने अक्सर खिलाड़ियों के शरीर में रंगीन टेप लगे हुए देखे हैं लेकिन जर्मनी की वॉलीबॉल खिलाड़ी कैटरिन हॉल्टविक ने अपने शरीर पर जिस दरियादिली से इन टेपों का इस्तेमाल किया था उससे सभी का ध्यान उनकी ओर आकर्षित हुआ.

    कैटरिन ने चेक गणराज्य के खिलाफ़ खेले गए अपने पहले मैच के दौरान अपने पेट के उपर पिरोज़ा रंग की आठ पट्टियां बांध रखीं थी.

    जबकि उनकी साथी सेम्मलर ने अपनी बायीं कूल्हों पर हल्की गुलाबी रंग की पट्टियां बांध रखी थी.

    ऐसा माना जाता है कि जापान में निर्मित इन टेपों से खेल के दौरान लगी चोट ठीक होती है.

    इनसे खिलाड़यों की मांसपेशियों और जोड़ों को भी सहारा मिलता है और खिलाड़ी बिना दर्द के अपना स्वाभाविक खेल दिखा पाते हैं.

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